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जयसंहिता

संज्ञाओं की युद्धभूमि

यदि आप का इतिहास 11वीं शताब्दी या 15वीं शताब्दी तक जाता है तो नैसर्गिक नाम देने के सरकारी प्रक्रिया इतिहास के साथ खिलवाड़ लगेगी लेकिन यदि आपका इतिहास बोध इससे और आगे जाता है तो यह इतिहास के साथ किए गए खिलवाड़ को ठीक करने जैसा होगा। मामला दृष्टि का है, कोई 11 शताब्दी के बाद के घटनाक्रम को ही इतिहास मानता है तो खुद ही इतिहास के साथ खिलवाड़ कर रहा है

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संज्ञाएं पहचान का आधार होती हैं। संज्ञाशून्य होना पहचानविहीन होने जैसा है। इसीलिए, पहचान गढ़ने का कोई भी काम किसी संज्ञा से प्रारम्भ होता है। यदि किसी व्यक्ति या समाज से उसकी संज्ञाए छीन ली जाएं तो उसके सामने पहचान का संकट खडा हो जाता है। यही खासियत उन्हें सांस्कृतिक और साभ्यतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना देती है। हर आक्रांता देर-सवेर उन संज्ञाओं का नाम बदलना चाहता है, जिनसे आक्रांत समाज की पहचान जुड़ी हुई होती है।
संज्ञाएं किसी समाज की वास्तविक पहचान को न केवल उसकी स्मृति में न केवल बनाए रखती हैं बल्कि उस पहचान को फिर से स्थापित करने हेतु संघर्ष करने के लिए प्रेरित भी करती है। इसीकारण ये आक्रांताओं के सामने चुनौती बन जाती है। इसलिए संज्ञाहरण या संज्ञापरिवर्तन करके साम्राज्यवादी शक्तियां अपने साम्राज्य को स्थायी बनाने का बंदोबस्त करती रही हैं। आक्रांताओं द्वारा संज्ञाओं के साथ खिलवाड़ इसलिए भी किया जाता है क्योंकि यह पराधीन समाज को नीचा दिखाने का अवसर भी प्रदान करता है।
दूसरी तरफ संस्कृति के प्रति संवेदनशील लोग नई संज्ञाओं को संरक्षित रखने की कोशिश करते हैं या आरोपित संज्ञाओं के स्थान पर मूल संज्ञाओं की वापसी के लिए संघर्ष करते हैं। एक सांस्कृतिक व्यक्ति भली प्रकार से यह जानता है कि संज्ञाओं के संरक्षण का मतलब अपनी सभ्यता-संस्कृति के गुणसूत्रों की रक्षा करना है। संज्ञा बीज है। यदि वह अक्षुण्ण बनी रहती है तो सांस्कृतिक प्रवाह भी कमोबेश बना रहता है। संज्ञा प्रेरणा और स्वप्न है। उसमें बदलाव का मतलब किसी सभ्यता के स्वप्नों और प्रेरणाओं पर कब्जा करना है।
एक सभ्यता के रूप में लगभग तेरह सौ वर्षों से राजनीतिक और सांस्कृतिक संघर्षों के साथ भारत संज्ञाओं के मोर्चे पर युद्धरत है। सत्ता हथियाने के बाद होने वाले नरसंहारों, मन्दिरों, लूट-पाट, बलात्कार शिक्षा में बदलाव जैसे बिंदुओं की चर्चा तो कमोबेश होती रही है, लेकिन भारत ने खुद को पहचान देने वाली संज्ञाओं के लिए कैसे संघर्ष किया है, इस पर चर्चा अभी न के बराबर हुई है। हाल में इलाहाबाद और फैजाबाद का ‘पुर्ननामकरण संस्कार‘ होने के बाद नाम और नामकरण को लेकर भारतीय मीडिया में यकायक चर्चाओं की बाढ़ आ गई। भारत के सांस्कृतिक अभिकेन्द्रों में शामिल रहे प्रयाग और अयोध्या को उनकी मूलसंज्ञा से सम्बोधित किए जाने के बाद भारतीय मीडिया में इस मुद्दे को लेकर जिस तरह की छिछली चर्चाएं की गई और सतही दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया, उससे यह जरूरी हो गया कि संज्ञाओं से सम्बंधित परम्परागत भारतीय दृष्टिकोण से परिचित हुआ जाए।
उत्तर प्रदेश में परम्परागत संज्ञात्मक चेतना की कुछ स्थानों पर हुई अभिव्यक्ति के बाद मीडिया में जो बहस चली या चलाई गई, वह मुख्यतः चार तर्को के आधार पर गढ़ी गई। पहली यह कि नाम में क्या रखा है, किसी का कुछ भी नाम रखा जा सकता है। दूसरा तर्क यह गढ़ा गया कि लोगों के विकास और मूलभूत जरूरतों को पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए। नाम बदलने से वस्तुस्थिति थोड़ी ही बदल जाती है। तीसरे तर्क का सहारा कुछ मौलानानुमा लोगों ने लिया और यह कहा कि यदि नामकरण करना ही है तो नए शहरों को बसाकर उनका नामकरण कर दिया जाए। और यह भी कि नामकरण इतिहास के साथ खिलवाड़ है।
इन चार तर्कों को यदि भारतीय परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि लोदी मीडिया के ये तीनों तर्क न केवल भोथरे हैं बल्कि उनकी सांस्कृतिक निरक्षरता के द्योतक भी हैं। भारत में गुणधर्म के आधार पर नामकरण करने की परम्परा रहा है। चर्चा में रहे अयोध्या या प्रयाग के नामकरण का उनकी विशेषताओं और इतिहास से गहरा सम्बंध है। अयोध्या का मतलब जो योध्य नही हैं, जिसे युद्ध में जीता नहीं जा सकता। प्रयाग के नामकरण का सम्बंध भी ब्रह्मा के प्रथम यज्ञ से है। केवल अयोध्या या प्रयाग का ही नहीं, व्यक्तियों या स्थानों का नामकरण उनके गुणधर्मों के निश्चित करने की भारत में परम्परा रही हैं। संज्ञाओं को लेकर इस अतिशय संवेदनशीलता के कारण ही भारत में निरुक्त जैसा एक पूर्ण शास्त्र अस्तित्व में आया और नामकरण को सोलह संस्कारों में शामिल किया गया। अब जिन्हें टॉम, डिक, हैरी में से कुछ भी चुन लेने की आदत है, वह निश्चित नाम के आग्रह और नामों के अवदान को स्वीकार कर पाएं, यह मुश्किल है। भारत में नामों की कितनी महत्ता है कि इसका अंदाजा इसी बात लगाया जा सकता है कि भारतीयों ने कुछ अर्थों में नाम को राम से भी बड़ा मान लिया। तुलसीदास जी रामनाम को ही सर्वोत्तम तीर्थ बताते हुए कहते हैं कि-
कासी बिधि बसि तनु तजें, हठि तनु तजें प्रयाग।
तुलसी जो फल सो सुलभ राम-नाम अनुराग।।
यानी विधिपूर्वक काशी में रहकर शरीर त्यागने से और प्रयाग में हठपूर्वक शरीर त्यागने से जो मोक्ष रूपी फल मिलता है, वह राम नाम में अनुराग होने से मिल जाता है। तुलसीदास जी ने राम चरित मानस में नाम की विस्तृत महिमा गाई है। वह ‘को बड़ छोट कहत अपराधू, सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू’ कहकर रूप और नाम की तुलना से बचते हैं लेकिन आगे जाकर रूप को नाम के अधीन बताने में भी नहीं हिचकते हैं-देखिअहिं रूप नाम अधीना। रूप ग्यान नहिं नाम विहीना। उनके अनुसार नाम में अनुराग रखने वाले भक्तों को हमेशा मंगल ही होता है-भाय कुभाय अनख आलसहूं। नाम जपत मंगल दिसि दसहूं।
नाम-महिमा का यह चिंतन, अक्षर को अविनाशी और शब्द को ब्रह्म मानने वाली वृहद दार्शनिक रूप का प्रतिफल है। इसीकारण, भारतीय परम्परा अष्टोत्तरशतनामावली, सहस्रनामावली जैसी परम्पराओं का विकास हुआ। प्रयाग और अयोध्या के नामकरण को इस परिप्रेक्ष्य में देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह भारतीय जनमानस को उसकी वास्तविक स्मृतियों से जोड़ने वाला आवश्यक सांस्कृतिक कर्म है।
इतिहासकार होने का दावा करने वाली एक टोली ने यह तर्क गढ़ा की नाम में बदलाव इतिहास के साथ किया जाने वाला खिलवाड़ है। भारतीयता को लेकर हमेशा अरण्यरोदन करने वाली एक मंडली ने नामकरण को फिजूलखर्ची साबित करने की कोशिश की।
स्पष्ट है नामकरण को लेकर भारतीय परम्परा बहुत सजग और सुव्यवस्थित रही है। इसमें किसी का भी, कुछ भी नाम रख देने वाले चिंतन के लिए स्पेस न के बराबर रहा है। नामकरण से सम्बंधित परम्परागत बोध के छीजने के बावजूद आज भी एक सामान्य भारतीय परिवार में जन्मे नवजात का नामकरण उसकी जन्मकुंडली के आधार पर संभावित गुणों और विशेषताओं का ध्यान में रखकर किया जाता है। ऐसे में कम से कम भारतीय संदर्भों में तो यह तर्क हास्यास्पद ही कहा जाएगा कि नाम में क्या रखा है ? या किसी का कुछ भी नाम रखा जा सकता है।
दूसरा तर्क यह है दिया गया कि नाम बदलने से वस्तुस्थित थोड़ी ही बदलती है। हां, यह सच है कि नाम बदलने से तुरंत वस्तुस्थिति में तो कोई बदलाव नहीं आता लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इससे हमारी चेतना की प्रक्रिया और बोधात्मक स्वरूप में तुरंत ही बदलाव आ जाता है। यह बोधात्मक बदलाव देर-सवेर वस्तुस्थिति में बदलाव का कारण बनता है। नामकरण, विकास की प्रक्रिया और सांस्कृतिक बोध में सम्बंध स्थापित कर वस्तुस्थिति में बदलाव का मजबूत और दूरगामी आधार सृजित करता है। विकास की दिशा यदि सांस्कृतिक-बोध से शून्य है तो ऐसा विकास न स्थायी होता है और न ही शुभ। ऐसा विकास अंततः रावण की लंका बनाता है, जो सोने की होते हुए अनाचार का पर्याय बनती है। इसलिए विकास और सांस्कृतिक बोध को साथ लाने का कार्य उचित नामकरण करने या मूल नामों को पुनः स्थापित करने से प्रारंभ होता है। नामकरण तुरंत बदलाव नहीं पैदा करता लेकिन यह ऐसा बोध पैदा करता है, जिससे बदलाव की संभावनाएं पैदा होती हैं।
जहां तक नए शहरों को बसाकर उनका नामकरण करने की बात है तो आदर्श स्थिति में ऐसा ही होना चाहिए। लेकिन यह तर्क उन शहरों के संदर्भ में अपने-आप प्रासंगिक हो जाता है, जिनके प्राचीन नामों को आक्रांताओं ने जबरन बदल दिया। अयोध्या या प्रयाग प्राचीन नगर थे, इन नगरों से ही आस-पास के क्षेत्रों की पहचान होती थी। इन नगरों को आक्रमणकारियों ने तो नहीं बसाया था। धार्मिक-सांस्कृतिक कारणों इन पुराने शहरों को नए नाम दे दिए गये थे। इसलिए सांस्कृतिक दृष्टि से बर्बर लोगों ने बिना शहर बसाए नए नामकरण करने की जो भूल की थी, उसका परिमार्जन किया जाना आवश्यक हो जाता है। अयोध्या और प्रयाग को उनका मूल सम्बोधन पुनः प्रदान कर ऐसा ही आवश्यक परिमार्जन किया गया है।
इतिहास के साथ खिलवाड़ करने की बात तो पूरी तरह देशबोध और कालबोध से जुड़ी बोध है। यदि आप का इतिहास 11वीं शताब्दी या 15वीं शताब्दी तक जाता है तो नैसर्गिक नाम देने के सरकारी प्रक्रिया इतिहास के साथ खिलवाड़ लगेगी लेकिन यदि आपका इतिहास बोध इससे और आगे जाता है तो यह इतिहास के साथ किए गए खिलवाड़ को ठीक करने जैसा होगा। मामला दृष्टि का है, कोई 11 शताब्दी के बाद के घटनाक्रम को ही इतिहास मानता है तो खुद ही इतिहास के साथ खिलवाड़ कर रहा है।
फिजूलखर्ची के संदर्भों में तो यही कहा जा सकता है कि अर्थ का सबसे अच्छा निवेश बोध, ज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में ही हो सकता है। इन क्षेत्रों में किया गया निवेश अंततः आर्थिक दृष्टि से भी लाभकारी साबित होता है। नैसर्गिक नाम की वापसी बोध में बदलाव के लिए बहुत जरूरी है और इसमें होने वाले आर्थिक खर्चे को आवश्यक निवेश मानकर स्वीकार किया जाना चाहिए। यहां इस तथ्य को भी ध्यान रखना चाहिए कि लालबुझक्कणों की एक टोली आर्थिक खर्चे का तर्क तभी देती है जब देश कुछ मूलभूत और महत्वपूर्ण हासिल करने की दिशा में अग्रसर होता है। पोखरण के समय भी खर्चे का रोना-रोया गया था, मंगलयान के समय भी और अयोध्या और प्रयाग के नामों को लेकर रोजी-रोटी की दुहाइयां दी जा रही है। रोजी-रोटी का प्रश्न महत्वपूर्ण है। लेकिन हमेशा सांस्कृतिक भाव-बोध या मूलभूत शोध के विरोध में जाकर ही रोजी-रोटी का प्रश्न उठाना शातिराना हरकत ही कही जाएगी।
जो यह मानते हैं कि सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष अब भी चल रहा है , उनके लिए नैसर्गिक नामों की वापसी एक आवश्यक कदम और महत्वपूर्ण उपलब्धि की तरह है। अकादमिक षड्यंत्रों और मीडियाई छल से परे जाकर आम जनमानस को टंटोले तो कृत्रिम नामों का हटना उनके लिए यह अरसे से कलजे पर रखे हुए पत्थर और सम्मान पर लगे हुए कलंक के हटने जैसा है। भारतीय जनमन का ईमानदारी से टंटोलें तो वहां पर यही स्थायी भाव मिलेगा।

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ऑपरेशन सिंदूर को स्थगित करने से उपजी राष्ट्रीय व्यग्रता का स्वागत कीजिए!

यदि अभी ऑपरेशन सिंदूर को स्थगित करने से भारतीय जनमानस में व्यग्रता दिख रही है और वह बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करने की बात कर रही है तो इसे सकारात्मक ढंग से ही लिया जाना चाहिए। यह व्यग्रता आतंकवाद से होने वाले दूरगामी संघर्ष में राष्ट्रीय संकल्प को मजबूती ही देगी।

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‘आकाश’ में अपने प्रभुत्व को देख भारतीय आकांक्षाएं भी आसमान पर पहुँच गई थी, इसलिए सिंधु जल संधि को स्थगित करने और ब्रह्मोस के हमलों के बाद भी यदि लोगों को लगता है की भारत को अभी नहीं रुकना चाहिए था, तो इसका स्वागत किया ही जाना चाहिए। आतंकवाद से लंबी लड़ाई में यह व्यग्रता महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

संभवतः यह भारतीयों के लिए पहला अनुभव था जब भारत-पाक के बीच लड़े जा रहे युद्ध की तपिश जमीन तक नहीं पहुँच रही थी। अधिकांश ड्रोन और मिसाइल्स हमलों को भारतीय मिसाइल सुरक्षा प्रणाली आसमान में निष्प्रभावी बना दे रही थी । रात में पाकिस्तानी हमलों के निष्प्रभावी बनाए जाने के कवरेज ने आम भारतीयों में न केवल अपने सुरक्षा प्रतिष्ठान के बारे में गजब का आत्मविश्वास पैदा किया बल्कि इस संघर्ष के निष्कर्ष को लेकर उनकी आकांक्षाओं को भी आसमान पर पहुँचा दिया। भारतीय मिसाइल सुरक्षा प्रणाली द्वारा हत्फ श्रेणी की मिसाइल को सिरसा के नजदीक मार गिराए जाने के बाद यह भाव और भी मजबूत हुआ कि भारत के पास अभेद्य सुरक्षा कवच है।   

इन आकांक्षाओं को तब और भी पंख लग गए जब भारतीय वायुसेना के हमलों के दौरान पाकिस्तानी मिसाइल सुरक्षा प्रणाली एकदम से पंगु दिखी। भारत पाकिस्तान के किसी भी कोने में स्थित अपने लक्ष्यों को मनमाफिक ढंग से ‘टारगेट’ कर रहा था और  उसका कहीं पर कोई प्रतिरोध नहीं नजर आ रहा था।

इसमें रावलपिंडी स्थित नूरखान हवाई अड्डे और चकवाल में स्थित मुरीद हवाई अड्डे पर भारतीय हमले ने तो जैसे पाकिस्तान के हवाई सुरक्षा तंत्र की रीढ़ ही तोड़ दी। नूरखान हवाई अड्डे पर हवाई हमले ने पाकिस्तान सैन्य प्रतिष्ठान की प्रतिष्ठा को ही जमींदोज कर दिया। नूरखान हवाई अड्डा पाकिस्तान की वायवीय आवागमन के लिए ‘नर्व सेंटर’ की तरह काम करता रहा है। यहीं पर उसका मुख्य रडार प्रणाली भी स्थापित था । इसी तरह, मुरीद हवाई अड्डे पाकिस्तान का ड्रोन वॉरफेयर का मुख्यालय स्थित है। भारत ने इन्हें निशान बनाकर दोनों देशों की क्षमताओं और आत्मविश्वास के अंतर को दुनिया के सामने ल दिया।

इस परिस्थिति में भारतीय आकांक्षाओं का बढ़ जाने सहज ही था। जिस तरह से रावलपिंडी स्थित हवाई अड्डे को निशाना बनाया गया, उससे भी यह संदेश गया कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का लक्ष्य अब केवल आतंकी अवसंरचना को ध्वस्त करने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि संभवतः यह पीओजेके को अपने साथ लेने अथवा बलूचिस्तान को एक अलग राष्ट्र के रूप में स्थापित करने तक विस्तृत हो गया है।

ऐसी स्थिति में जब यकायक युद्ध विराम की खबर आई तो ऐसा लगा जैसे दशकों से देखा जाने वाला एक स्वप्न अधूरा रह गया। भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से जो बड़े लक्ष्य प्राप्त किए, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई मे जो कठोरता दिखाई गई, पाकिस्तान की वास्तविक युद्धक क्षमता की जिस तरह से कलई खुली, चीनी हथियारों की जिस तरह से भद्द पिटी और भारतीय हथियारों ने अपनी  मारकता और सटीकता से जिस तरह विश्व आश्चर्य चकित किया, सभी कुछ नेपथ्य में चल गया।

स्थिति तब और अजीब हो गई जब ऑपरेशन सिंदूर की तुलना 1971 के भारत-पाक युद्ध से की जाने लगी, जबकि ऑपरेशन सिंदूर को घोषित लक्ष्य आतंकी अवसंरचना पर प्रहार करना भर था। तब पाकिस्तान ने भारत के 10 से अधिक सैन्य हवाई अड्डों पर हमला कर दिया था, और तत्कालीन भारतीय नेतृत्व ने इसे युद्ध की कार्रवाई मानते हुए जवाबी कारवाई की थी। इसके उलट इस बार भारत ने पाकिस्तान के 10 से अधिक सैन्य हवाई अड्डों पर हमले कार्रवाई की, और पाकिस्तान जवाब देने की हिम्मत भी जुटा सका। इसके बजाय वह युद्ध-विराम पर सहमत हो गया। 1971 में भारत ने एक पूर्ण युद्ध लड़ा था, जबकि ऑपरेशन सिंदूर एक आतंकी घटना के बाद एक प्रभावी जवाबी कार्रवाई भर थी । तब दोनों देशों के पास नाभिकीय हथियार नहीं था, जबकि अब दोनों देशों के पास नाभिकीय हथियार हैं। और भारत ने पाकिस्तान के नाभिकीय हथियार के उपयोग करने के धमकी को दरकिनार कर जवाबी कारवाई की।

इसलिए दोनों संघर्षों के लक्ष्य और विस्तार में जमीन-आसमान का अंतर था। और इनके बीच तुलना संभव ही नहीं थी। यदि ऑपरेशन सिंदूर की उपलब्धियों का आकलन 26/11 के मुंबई हमलों के संदर्भ में किया जाए तो सार्थक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं, क्योंकि दोनों की पृष्ठभूमि में आतंकी घटनाएँ थीं। तब भारत की तरफ से कोई जवाबी कार्रवाई नहीं की गई थी, और इस बार सिंधु जल संधि को स्थगित करने जैसे निर्णायक कदम उठाने के बाद ब्रह्मोस 9 आतंकी ठिकानों को ठिकाने लगा दिया। जब पाकिस्तानी सेना ने राष्ट्रीय संप्रभुता के नाम पर इसका जवाब देने की कोशिश की तो उसके 10 सैन्य हवाई अड्डों और हवाई सुरक्षा तंत्र को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया। युद्ध-विराम के समय यह पूर्व शर्त रख दी गई कि अब से कोई भी आतंकी हमला युद्ध की कार्रवाई जाएगा। इस तरह ऑपरेशन सिंदूर तात्कालिक रूप से भौतिक और मनोवैज्ञानिक लक्ष्यों को तो प्राप्त करने में सफल रहा ही, आतंकवाद पर दूरगामी प्रहार की पृष्ठभूमि भी तैयार कर दी। इस संदर्भ में यह बिन्दु को भी अवश्य याद रखा जाना चाहिए कि एक सैन्य कार्रवाई से आतंकवाद को कहीं भी निर्मूल नहीं किया जा सका है। सैन्य कार्रवाई तात्कालिक दबाव तो बना सकती है, लेकिन आतंकवाद को पूरी तरह से खत्म करने के लिए उस मजहबी विचारधारा को खत्म करना जरूरी है, जो घृणा और हिंसा के बीज बोती है।

 इसलिए यदि अभी युद्ध-विराम को लेकर भारतीय जनमानस में व्यग्रता दिख रही है और वह बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करने की बात कर रही है तो इसे सकारात्मक ढंग से ही लिया जाना चाहिए। यह व्यग्रता आतंकवाद से होने वाले दूरगामी संघर्ष में राष्ट्रीय संकल्प को मजबूती ही देगी। हां, उन लोगों के बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है, जो एक दिन शांति एवं मानवता और दूसरे दिन युद्ध और राष्ट्रीयता की बात करने लगते हैं।    

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जयसंहिता

हाइब्रिड वॉरफेयर में स्वभाषा सुरक्षा की नई छतरी भी बन गई है

हाइब्रिड वॉरफेयर में दुश्मन को उसकी भाषा में समझाना एक प्रभावी नीति है, लेकिन अपने नागरिकों और मित्रों को उनकी ‘अपनी भाषा’ में समझाना विजय की मूलभूत रणनीति बन गई है ।

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ऑपरेशन सिंदूर भारतीय सशस्त्र बलों और भारतीय हथियारों की सफलता का नया प्रतिमान बन कर उभरा है। इस सफलता के कई रणनीतिक और तथा तकनीकी आयामों ने देश-दुनिया का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया, लेकिन रणनीतिक संचार के मोर्चे पर जिस प्रभावी और मारक ढंग से संदेशों का सम्प्रेषण किया गया, वह विशेष रूप से उल्लेखनीय है ।

रणनीतिक संचार के मोर्चे पर मिली सफलता इसलिए उल्लेखनीय हो जाती है क्योंकि पिछले कुछ युद्धों के बाद यह धारणा बन गई थी कि भारत युद्ध अथवा संघर्ष तो जीत जाता  है, लेकिन देश-दुनिया तक उसकी सटीक ‘मेसेजिंग’ करने में विफल हो जाता है। इसके कारण विजय के बाद भी एक संशय की स्थिति बन जाती है। संशय की यह स्थिति भारत के आत्मबल और वैश्विक स्वीकृति को बुरी तरह से प्रभावित करती रही है।

‘बालाकोट एयरस्ट्राइक’ के बाद यह बात विशेष रूप से रेखांकित की गई थी कि भारत ने एक झटके में पकिस्तान की नाभिकीय छतरी को पूरी छिन्न-भिन्न कर दिया । यह पिछले दो दशकों में भारत द्वारा प्राप्त किया गया सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक लक्ष्य था। यह पाकिस्तान के प्रति भारतीय नागरिकों में नए सिरे से धारणा बनाने और नाभिकीय भयदोहन से बाहर निकालने का यह स्वर्णिम अवसर था।

दुर्भाग्यवश, भारत में विमर्श यह बना दिया गया कि हवाई  हमले में आतंकवादियों को कुछ नुकसान हुआ भी है कि नहीं? और यह  भी कि कितनी संख्या में आतंकवादी मारे गए हैं? तब प्रश्न उठाने वालों ने इस बात का ध्यान नहीं रखा कि धारणा के युद्ध में संख्या के साथ मनोवैज्ञानिक बदलावों का अधिक महत्व होता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत संख्या के रणनीतिक जाल में नहीं उलझा। अपने इस बहुचर्चित बयान कि हमारा काम दुश्मनों को नुकसान पहुंचाना है, शवों को गिनना नहीं के जरिए एयर मार्शल एके भारती ने यह स्पष्ट संकेत दिए कि इसबार सशस्त्र बल संख्या के भूलभुलैया में रणनीतिक और धारणा के मोर्चे पर अर्जित की गई उपलब्धियों को गंवाना नहीं चाहते।

इस ऑपरेशन के दौरान सशस्त्र बलों की प्रभावी और मारक‘संचार रणनीति’ की झलक सशस्त्र बल की प्रेस ब्रीफिंग में भी स्पष्ट रूप से दिखी। बैसरन में धर्म पूंछकर एवं केवल पुरुषों को निर्मम ढंग से निशाना बनाकर आतंकवादियों ने भारतीय सैन्य और सत्ता प्रतिष्ठान को कुछ निश्चित ‘रणनीतिक’ संदेश भेजे थे। ऑपरेशन सिंदूर के बाद दो महिला सैन्य अधिकारियों द्वारा प्रेस ब्रीफ़ करने के निर्णय को इस पृष्ठभूमि में देखने पर रणनीतिक संचार की दृष्टि से इसकी उत्कृष्टता का अनुमान बेहतर ढंग से लगाया जा सकता है । इस एक प्रेस ब्रीफिंग ने अनेकों लक्षित समूहों को संदेश दिया। सबसे रोचक संदेश पाकिस्तानी सेना और वहाँ की महिलाओं के लिए था। यह महिलाओं को कमजोर रखने और मानने की पाकिस्तानी और आतंकी मानसिकता पर आक्रमण से काम नहीं था।

इस प्रेस ब्रीफिंग की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता इसका भाषाई संयोजन था । प्रेस ब्रीफिंग  में कर्नल सोफिया कुरैशी ने ऑपरेशन सिंदूर से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी पहले हिंदी में दी। समानांतर रूप से विंग कमांडर व्योमिका सिंह ने अंग्रेजी में भी सूचनाएँ साझा की। जिस देश में हाल के वर्षों तक रक्षा, विदेश और वित्त संबंधी चिंतन और विमर्श पर अंग्रेजी का एकाधिकार माना जाता रहा हो, जिस देश में लगभग एक दशक पहले तक रक्षा और विदेश मंत्रालय में भारतीय भाषाओं के पत्रकारों और उनके प्रश्नों की पहुँच नगण्य रही हो,  वहाँ पर इतनी महत्वपूर्ण प्रेस ब्रीफ़ की शुरुआत हिंदी में करना कइयों को आश्चर्य में डाल सकता है।

इसे यदि रणनीतिक संचार की दृष्टि से देखें तो यह भाषा प्रेम अथवा भाषाई पहचान को रेखांकित करने भर का मामला नहीं था, बल्कि यह संदेशों को अधिक प्रभाव और सहजता के साथ प्रेषित कर कुछ रणनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश की गई थी। यह अपने संदेशों को पहले ही झटके में धरातल तक पहुंचाने और धारणा-निर्माण के क्षेत्र में खुद को आगे रखने की सोची समझी रणनीति थे। यह प्रेस ब्रीफिंग इस बात की स्वीकारोक्ति थी कि परिवेश की भाषा सर्वाधिक व्यापकता और सहजता के साथ संदेशों को सामान्य नागरिक तक पहुँचाती है। 

बाद में एयर मार्शल ए. के. भारती ने भारतीय रणनीति को समझाने के लिए रामचरित मानस की जिस चौपाई का उपयोग किया, वह भी परिवेश की भाषा के सामर्थ्य के उपयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इस चौपाई का उपयोग सदियों से भारतीय जनमानस उद्दंड को ‘सही रास्ते पर लाने की नीति’ के एक सशक्त मुहावरे के रूप में करता रहा है ।  विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति ।। में निहित संदेश इतने स्पष्ट, सटीक हैं और पहुँच इतनी विस्तृत है कि इसके उपयोग के बाद इसको आगे व्याख्यायित करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। इस चौपाई के उपयोग ने रणनीतिक चिंतकों और सामान्य भारतीयों के बीच एक संवादसेतु का निर्माण कर दिया, एक ही झटके में दूरदराज के गाँव तक भारतीय सैन्य प्रतिष्ठान की नीति और विजय की कथा को पहुँचा दिया।

प्रश्न यह उठता है युद्ध में ‘अपनी भाषा’ इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो गई है? और यह भी कि क्या भारत के अतिरिक अन्य देशों ने भी हाल के दिनों में युद्ध और सुरक्षा के मोर्चे पर परिवेश की भाषाओं को प्राथमिकता देना प्रारंभ किया है। इसका उत्तर युद्ध की प्रकृति और स्वरूप में आए बदलावों में छिपा है। और इसी के कारण वैश्विक स्तर पर परिवेश की भाषाओं में रणनीतिक और सैन्य सूचनाएँ देने का प्रचलन बढ़ा है। 

समसामयिक युद्धशैली में, जिसे हाइब्रिड वॉरफेयर कहा जाता है, युद्ध के एक बड़ा हिस्सा धारणा के मोर्चे पर लड़ा जा रहा है, और इस तरह के युद्ध में अपने नागरिकों की धारणा सबसे महत्वपूर्ण होती है। वैश्विक धारणाएँ आपके प्रतिकूल हों तो उनका प्रबंधन किया भी जा सकता है, लेकिन यदि घरेलू मोर्चे पर ही युद्ध के बारे में धारणाएँ प्रतिकूल हो जाएँ तो नीति-निर्णयन की प्रक्रिया और सैन्य मनोबल दोनों बुरी तरह अपंग हो जाती हैं। घरेलू मोर्चे के अतिरिक्त अन्य देशों से भी वैधता और समर्थन प्राप्त करने के लिए परिवेश की भाषाओं के उपयोग का चलन बढ़ा है। इस परिदृश्य में वैधता और समर्थन प्राप्त करने में परिवेश की भाषा की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गई है।

इसका एक उदाहरण तब देखने को मिला जब 7 अक्टूबर 2023 के हमलों के बाद भारत में इजरायली दूतावास ने हमले की स्थिति स्पष्ट करने और सहयोग मांगने के लिए हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं में भी ट्वीट किए । 11 अक्टूबर 2023 को भारत में इजरायली दूतावास के ट्विटर हैंडल ‘Israel in India’ ट्वीट करते हुए लिखा कि ’हमास आतंकवादियों ने बिस्तरों में सो रहे बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की बेरहमी से हत्या कर दी। आंखें मत मूदें। इस हत्याकांड का सच साझा करें। इसके साथ ही हैशटैग, बैनर भी ट्वीट किए गए। संदेशों में अधिक से अधिक स्थानीयता का समावेश करने की कोशिश की गई। स्थानीय भाषा प्रयोग ने भारत में इजरायल के पक्ष को दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंचाने में मदद की। इसलिए, अब सुरक्षा और सैन्य चिंतन किसी विशिष्ट भाषा तक सीमित रहने वाले नहीं है। युद्ध का एक प्रमुख तथा निर्णायक मोर्चा ‘अपनी भाषाएं’ बनने वाली हैं। हाइब्रिड  वॉरफेयर में दुश्मन को उसकी भाषा में समझाना एक प्रभावी नीति है, लेकिन अपने नागरिकों और मित्रों को उनकी ‘अपनी भाषा’ में समझाना विजय की मूलभूत रणनीति बन गई है । इसलिए, आने वाले दिनों में भारतीय सैन्य प्रतिष्ठान और एडीजीपीआई यदि बहुभाषी होकर संवाद करते दिखें, तो इसमें किसी को, किसी भी तरह का आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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लम्बे समय से ‘हायब्रिड वारफेयर’ झेल रहा भारत, पहली बार जवाब भी उसी शैली में दे रहा है

पहलगाम के बैसरन में हुई पर्यटकों की नरसंहार की घटना के बाद सिंधु जल संधि को स्थगित कर भारत ने अपरम्परागत लेकिन निर्णायक प्रत्युत्तर दिया है। यह निर्णय कितना घातक है इसका अंदाजा हायब्रिड वारफेयर की समझ के बिना नहीं लगाया जा सकता। इस निर्णय के माध्यम से भारत ने यह भी संकेत दे दिया है कि वह हायब्रिड वारफेयर के जटिल युद्धशैली को न केवल समझता है बल्कि इसका सामना करने के लिए आवश्यक दक्षता भी उसके पास है…

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22 अप्रैल 2025 को पहलगाम के बैसरन में पर्यटकों के नरसंहार के बाद भारत सतत, क्रमवार और प्रभावी ढंग से पाकिस्तान को प्रत्युत्तर दे रहा है। इस जवाबी कार्रवाई में अभी तक परम्परागत युद्ध के ‘विजुअल्स’ दिख नहीं रहे हैं । दूसरी तरफ, हाइब्रिड वॉरफेयर तथा उसकी विशेषताओं से भारतीय जनमानस का अभी तक ठीक ढंग से परिचय नहीं हुआ है। इसीलिए,भारतीय प्रत्युत्तर और उसके  प्रभाव का सही ढंग से आकलन भी नहीं हो पा रहा है। यदि हाइब्रिड वॉरफेयर के संदर्भों में देखें तो भारत का जवाब बहुत घातक और दूरगामी दिखता है।

भारतीय जवाब में सबसे उल्लेखनीय सिंधु जल संधि को तुरंत प्रभाव से स्थगित करना है। यह भारत की तरफ से उठाया गया एक निर्णायक कदम है, जिसमें स्पष्ट संदेश और व्यापक प्रभाव निहित हैं। इस संधि के अस्तित्व में आने के बाद भारत और पाक के बीच तीन युद्ध हुए, लेकिन यह संधि अप्रभावित ही रही। इसलिए इस संधि का स्थगित होने की गूंज और मारकता एक निर्णायक युद्ध से कहीं अधिक ही है, अंतर केवल इतना है कि इसमें न कोई गोला-बारूद इस्तेमाल हुआ और न ही किसी तरह की क्षति उठानी पड़ी।

बैसरन में हुए नरसंहार के बाद पाकिस्तान इतनी बड़ी कार्रवाई के लिए बिलकुल तैयार नहीं था। बाद में उसने सिंधु जल संधि को प्रभावित करने के किसी भी प्रयास को ’एक्ट ऑफ वार’ बताया। लेकिन भारत तो उसे स्थगित करने की घोषणा पहले कर ही चुका था। यदि पाकिस्तान को तनिक भी अंदेशा होता कि भारत सिंधु जल संधि को स्थगित करने का निर्णय ले सकता है, तो वह पहले ही ’एक्ट ऑफ वार’ के मुद्दे पर  दुष्प्रचार अभियान अथवा मनोवैज्ञानिक अभियान ( डिस्इन्फार्मेशन कम्पेन और सायकोलॉजिकल ऑपरेशन) चलाने की कोशिश करता और इससे भारत और सम्पूर्ण विश्व को दबाव में लेने की कोशिश करता। ठीक वैसे ही जैसे अभी वह जम्मू-कश्मीर को ’न्यूक्लियर फ्लैशप्वाइंट’ बताकर वैश्विक समर्थन हासिल करने करने और भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। सिंधु जल संधि को तत्काल स्थगित कर भारत ने उसे ऐसा न करने की समय और अवसर ही नहीं दिया। सिंधु जल संधि को स्थगित करके लम्बे समय से हायब्रिड वारफेयर झेल रहे भारत ने उसी शैली में अब तक का सबसे घातक जवाब दिया है।

भारत में बहुत से लोगों ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का अर्थ यह निकाला कि सिंधु और सहायक नदियों के जलप्रवाह को भारत पूरी तरह से अवरुद्ध कर देगा। इस पर प्रश्न भी उठे कि क्या भारत के पास इतनी क्षमता है कि सिंधु नदी के प्रवाह को पूरी तरह से रोक दे। लेकिन इस संधि को स्थगित का एकमात्र लक्ष्य तत्काल जल-प्रवाह को पूरी तरह से रोकना था भी नहीं। इसका तात्कालिक लक्ष्य तो जल-भंडारण क्षमता की जानकारी न प्रदान करना ही प्रतीत होता है। और मात्र जानकारी न देकर भारत पाकिस्तान और वहां कृषि और उसकी युद्ध-क्षमताओं को किस हद प्रभावित कर सकता है, इसका अंदाजा पाकिस्तान को अच्छे से है।

फसल की बुवाई के समय कम पानी छोड़ने और फसल कटाई के समय अधिक पानी छोड़ने के क्या प्रभाव हो सकते हैं यह तो आम किसान भी जानता है। और पानी के प्रवाह की जानकारी न देने से पाकिस्तान ऐसी स्थितियों को संभालने की स्थिति में बिल्कुल भी नहीं होगा। एक अन्य बात यह भी है कि जल-प्रवाह और उसकी तीव्रता की सटीक जानकारी न होने पर यह निश्चित करना भी मुश्किल  होगा कि भारत पानी रोक भी रहा है अथवा नहीं। सिंधु जल संधि के स्थगित करने की घोषणा के एक सप्ताह के भीतर चेनाब और झेलम के जलस्तर में जिस तरह अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव देखने को मिला है,उसमें पाकिस्तान के लिए गहरे संदेश छिपे हुए हैं।

सिंधु जल संधि को स्थगित करने से पाकिस्तान में पहले से ही पानी को लेकर चल रहा संघर्ष और भी बढ़ सकता है। पाकिस्तान के सिंध में चोलिस्तान नहर परियोजना का तीखा विरोध हो रहा है। यह नहर ग्रीन पाकिस्तान इनीशिएटिव के अंतर्गत बनाई जा रही है और इसके अंतर्गत  सिंधु नदी के पानी को पंजाब के चोलिस्तान तक पहुचाया जाना है। सिंधियों को आशंका है कि इसके सिंध में पानी का भयंकर संकट पैदा हो सकता है। सिंधु जल संधि को स्थगित करने से पाकिस्तान में पानी का यह संकट और उसके कारण होने वाला संघर्ष और भी गहरा सकता है ।

बैसरन में आतंकियों ने नरसंहार के साथ भारत को कुछ स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की थी। आतंकियों द्वारा पर्यटकों की उनका धर्म पूछकर हत्या, केवल पुरुषों की निशाना बनाने, कलमा पढ़ने और प्रधानमंत्री को सूचित करने जैसी बातें कहकर भारत को एक उत्तेजक संदेश भेजा गया था, ताकि वह हड़बड़ी में गलत कदम उठाने को बाध्य हो जाए। स्पष्ट है कि यह आतंकी हमले से अधिक भारतीय राज्य किया गया एक हायब्रिड हमला था। अच्छी बात यह है कि भारत इस आतंकी हमले को हायब्रिड हमला ही मान रहा है और इसका उत्तर भी हायब्रिड वॉरफेयर की शैली में दे रहा है। सिंधु जल संधि को स्थगित करना इसी बात की गवाही दे रहा है।

सिंधु जल संधि के स्थगित होने के बाद भारत 12 अप्रैल 2022 को तत्कालीन एअर चीफ मार्शल विवेक राम चौधरी द्वारा दिए गए उस वक्तव्य को ठीक ढंग से समझने की स्थिति था, जिसमें उन्होंने यह संकेत किया था कि भविष्य में पहली गोली चलने और पहले एअरक्राफ्ट को सीमा पार करने से पूर्व युद्ध का एक बड़ा हिस्सा लड़ा जा चुका होगा। अब भी कुछ विशेषज्ञ और आम नागरिक इस बात का कयास लगा रहे हैं कि भारत युद्ध में कब और कैसे जाएगा, जबकि यथार्थ यह है कि भारत युद्ध में निर्णायक प्रवेश कर चुका है।

हायब्रिड वारफेयर की यही विशेषता ही है कि इसमें युद्ध का निश्चित स्थल और समय नहीं रह जाता और न ही गोलाबारी युद्ध का एकमात्र संकेतक रह जाता है। इसमें आर्थिक, तकनीकी अथवा सैन्य मोर्चे पर कोई एक महत्वपूर्ण निर्णय लेकर उसे संचार-प्रक्रिया के माध्यम से इस तरह व्यापक और प्रभावी बनाया जाता है कि अराजकता की स्थिति पैदा हो जाती है अथवा प्रतिस्पर्धी की निर्णयन क्षमता पंगु हो जाती है । इस युद्ध शैली में सैन्य संघर्ष युद्ध का एक महत्वपूर्ण हिस्सा तो होता है, लेकिन सैन्य संघर्ष और युद्ध एकदूसरे के पर्याय नहीं रह जाते।   

सिंधु जल संधि को स्थगित कर भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा और जल-प्रवाह को एकदूसरे के साथ जोड़ने की कोशिश की है। उरी हमले के बाद ही भारत ने इस बात के संकेत दे दिए थे कि यदि आतंकी गतिविधियों को नहीं रोका गया तो भारत सिंधु जल संधि के बारे में नए सिरे से विचार कर सकता है। तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसी तरफ संकेत करते हुए कहा था कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते। संभवतः तब पाकिस्तान ने इस कथन को गंभीरता से नहीं लिया था।

पहलगाम के बैसरन में हुई पर्यटकों की नरसंहार की घटना के बाद सिंधु जल संधि को स्थगित कर भारत ने अपरम्परागत लेकिन निर्णायक प्रत्युत्तर दिया है। यह निर्णय कितना घातक है इसका अंदाजा हायब्रिड वारफेयर की समझ के बिना नहीं लगाया जा सकता। इस निर्णय के माध्यम से भारत ने यह भी संकेत दे दिया है कि वह हायब्रिड वारफेयर के जटिल युद्धशैली को न केवल समझता है बल्कि इसका सामना करने के लिए आवश्यक दक्षता भी उसके पास है। आवश्यकता हायब्रिड वारफेयर के जटिल और विकाशसील यथार्थ को आम भारतीयों तक पहुंचाने की है, ताकि वे शत्रु के छलावों से सजग रहें और अपने देश के निर्णयों को सही आकलन भी कर सकें।  

-लेखक हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कश्मीर अध्ययन केंद्र में असिस्टेंट प्रोफेसर और हाइब्रिड वॉरफेयर के विशेषज्ञ है।

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