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देश-काल

सभ्यतागत सीमाओं को उजागर करता है जैक्सन का जीवन

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25 जून 2009 को पाॅप संगीत की दुनिया में किवदंती बन माइकल जैक्सन का निधन हो गया था। उनकी जिंदगी की तरह ही उनकी मौत भी रहस्यपूर्ण रही और मीडिया की सुर्खियों का हिस्सा बनी। जैक्सन पाॅप संगीत की दुनिया के बादशाह ही नहीं थे, वे वर्तमान उपभोक्तावादी सभ्यता के लिए ‘आदर्श प्रतीक’ भी थे। बाजारु जीवन दर्शन और मूल्यों पर आधारित वर्तमान सभ्यता के विश्लेषण के लिए, उसकी खूबी एवं खामियों को जानने के लिए जैक्सन के जीवन और उनकी जीवन-शैली को ‘केस स्टडी’ के रुप में चुना जा सकता है।

माइकल जैक्सन को उस जीवन-दर्शन और जीवनशैली का साक्षात उदाहरण माना जा सकता है, जिनको ‘मीडिया-मार्केट नेक्सस’ वैश्वीकरण के नाम पर पूरी दुनिया में आरोपित करने के लिए सतत प्रयत्नशील है। बाजार और संचार द्वारा गढे़ गए तमाम सुख एवं विकास के मानकों को जैक्सन ने अपने जीवन में स्पर्श किया। उन्होंने लोकप्रियता की उन ऊंचाईयों को छुआ, जो किसी के लिए ईष्र्या का विषय बन सकती हैं। विज्ञापनों में ही सम्भव दिखने वाली लोकप्रियता से आगे निकल गए थे जैक्सन। उनकी थिरकन पर झूमने वाले पूरी दुनिया में मिल सकते हैं। एक समय वह अकूत संपत्ति के मालिक थे। संक्षेप में कहें तो माइकल जैक्सन के पास वह सब कुछ था जिसे आज की व्यवस्था एक जीवन की सफलता और सार्थकता के पैमाने के रुप में आम आदमियों के सामने परोसती है।

दरअसल ,मीडिया -मार्केट नेक्सस उत्पादों के संग्रह और उनके प्रदर्शन को आज की जीवनशैली में ‘चरम-मूल्य’ के रुप में स्थापित करने का प्रयास कर रही है।। बाजारु प्राथमिकता में खरीददारी का सबसे ऊपर होना स्वाभाविक भी है। खरीददारी की उत्तेजना पैदा करने के लिए लोगों में दिखावे की संस्कृति रोपी जाती है। जैक्सन की जीवन में खरीददारी और दिखावे का जबरदस्त संयोग देखा जा सकता है। प्रदर्शन प्रभाव पैदा करने के लिए जैक्सन ने अपने पूरे शरीर को प्रयोगशाला बना दिया था। बीसियांे से अधिक बार उन्होंने नाक की सर्जरी करायी थी। उनके लिंग-प्रत्यारोपण के किस्स भी काफी चर्चित रहे । प्रदर्शन प्रभाव पैदा करने के लिए माइकल जैक्सन कितने संसाधनों का प्रयोग करते थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1996 में मुम्बई में हुए शो के लिए जैक्सन का सामान तीन रुसी मालवाहक पोतों के जरिए मुम्बई पहुंचा था। शौक का आलम यह कि उन्होंने अपना एक चिडि़याघर ही बसा डाला। एक द्वीपसमूह की खरीददारी कर डाली। हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि जैक्सन के दिखावे और खरीददारी का संबंध उनकी काली त्वचा और उससे जुड़ी हीनता-ग्रंथि से अधिक है। लेकिन इस तर्क को यह कहकर खारिज किया जा सकता है कि बाजार और संचार के गठजोड़ के बिना कालेपन से जुड़े हीनता के क्षणिक भाव को स्थायी भाव में नहीं बदला जा सकता।

लेकिन क्या वास्तव में जैक्सन एक खुशहाल जीवन जी सके ? क्या जैैक्सन के लोकप्रिय जीवन और लक-दक भरी जीवनशैली के स्याहपक्षों और दुःखद कराह को अनदेखा किया जा सकता है। जैक्सन की दर्दनाक मौत कुछ सवाल छोड़ गई है। ये साधारण सवाल नहीं है। आज की पूरी सभ्यता इन सवालों से जूझ रही है और इनका उत्तर पाने को छटपटा रही है।

जैक्सन की मौत को लेकर जो खबर सामने आई उसके मुताबिक जैक्सन के उपर लगभग 8 हजार करोड़ रुपए का कर्ज था। इस कर्ज ने ही जैक्सन का ‘कमबैक कन्सर्ट’ पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य कर दिया। हालांकि उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति उन्हें किसी भी शो की तैयारी की अनुमति नहीं देती थी। जैक्सन की पोस्टमार्टम रिपार्ट के मुताबिक उनका शरीर कंकाल का ढांचा मात्र रह गया था। और उनकी मौत के वक्त उनके आंतो में दर्द निवारक गोलियां ही थीं। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक जैक्सन प्रतिमाह 20 लाख से अधिक रुपए दवाईयों पर व्यय करते थे। उनका स्वास्थ्य इतना बिगड़ चुका था कि उन्हें आॅक्सीजन के टेंटों का सहारा लेना पड़ता था। जैक्सन एल्फा -1 एंटीट्राईप्सिन नामक गंभीर बीमारी से पीडित थे । इस बीमारी में पूरे शरीर में फेफडों को सुरक्षा प्रदान करने वाली प्रोटीनों की संख्या तेजी से घटने लगती है।

सवाल यह है कि एक समय संगीत के क्षेत्र में विश्व के सर्वाधिक अमीर जैक्सन कर्जे के इतने बड़े कुचक्र में कैसे फंस गए। क्या ऐसी जीवनशैली को मान्यता दी जा सकती है, जिसमें चोटी पर बैठा व्यक्ति भी कर्ज के कुचक्र का शिकार हो जाए, भोजन के बजा दर्दनिवारक गोलियों का आहार ले। क्या उस बाजारु नियम को सामाजिक नियम में तब्दील किया जा सकता है, जो अपने कर्ज वसूली के लिए किसी की जान लेने में न हिचके। ये सवाल व्यक्तिगत नहीं हैं, साभ्यतिक हैं। वैश्विक मंदी से लेकर ग्लोबल वार्मिंग तक की ऐसी समस्त समस्याओं जिनका सामना हमारी सभ्यता कर रही है, का जुड़ाव इन सवालों से है। ऐसा नहीं है कि इन प्रश्नों को जैक्सन को पैदा करने वाली पश्चिमी सभ्यता महसूस नहीं कर रही है। पश्चिमी दुनिया इन प्रश्नों की गम्भीरता और उनके समाधान की अनिवार्यता से वाकिफ है। लेकिन आदिम मानव प्रवृत्तियों के रुपंातरण और उसकी अभिव्यक्ति में सहज तथा सामान्य बोध के समावेश की कला से वाकिफ न होने के कारण पश्चिम कोई सार्थक समाधान नहीं ढूढ पा रहा है । प्रकृति तथा समाज के प्रति अपने सीमित दृष्टिकोण के कारण भी पश्चिम के समाधान ढूंढने का रास्ता और दुर्गम हो जाता है।

आखिरकार इन प्रश्नों का उत्तर भी हमको हमको माइकल जैक्सन के जीवन का आखिरी पड़ाव दे जाता है। जैक्सन अपने जीवन के अंतिम दिनों में उपनिषदों के अद्वैतवाद से अपनी सर्जनात्मक -उर्जा खींचने वाले भारतीय कवि रविन्द्रनाथ टैगोर का अध्ययन कर रहे थे। रविन्द्रनाथ को पढ़कर जैक्सन पर्यावरण के विषय पर कुछ कविताएं लिखने और स्टेज शो करने की योजना बना रहे थे। जलवायु परिवर्तन की भयावह समस्या के प्रति आमजन को जागरुक करने के लिए वह योगदान देना चाहते थे।

आखिर वह कौन सा तत्व है जो माइकल जैक्सन का झुकाव भारत की तरफ कर रहा था? भारतीयता में निहित समग्रता और संतुलन की दृष्टि ही वह तत्व हैं जो जैक्सन का आकर्षित कर रहे थे। इसे पूर्व भी यह तत्व पश्चिमी चिंतकों को आकर्षित करती रही है। मानव प्रकृति की समग्र समझ तथा आदिम प्रवृत्तियों का रुपांतरण कर उनका उध्र्वगमन करने वाला भारतीय जीवनदर्शन एवं जीवनशैली पश्चिमी विचारकों को समय-समय पर आकर्षित करती रही है। भारतीय जीवनदर्शन और जीवनशैली का आधार व्यापक है। वैदिक ऋचाओं की उदात्त अभिव्यक्तियां, औपनिषदिक प्रश्नोत्तर में निहित व्यापक आध्यात्मिक ंिचंतन तथा षड्दर्शन वह मूलतत्व हैं, जिनसे भारतीय जनमानस को जीवनरस मिलता है। समाज सुधारकों और प्रकाण्ड विद्वानों की मनीषा ने इसको अधिक सुगठित बनाए रखने कालप्रवाह के साथ प्रासंगिक बनाए रखने वाले अनेक आयाम जोडे़ हैं। इसके कारण भारतीय जीवनशैली और जीवनदर्शन में सभी मानवीय प्रवृत्तियों को स्वीकार्यता प्रदान की गई है। अर्थ और काम के प्रति निषेध भाव नहीं है। परंतु इनकी सेवन और अभिव्यक्ति में धर्माधारित संतुलन की बात जरुर कही गयी है। पश्चिम अभी उपभोग को चरममूल्य मानने वाली जीवनशैली को अपनाए हुए है इसलिए वहां सुख एवं समृद्धि का संतुलन नही सध पा रहा है।

एजेंडा सेट करना मीडिया का काम माना जाता है। दुर्भाग्य से, मीडिया बाजारु मूल्यों को नैतिक मूल्यों के रुप में स्थापित करने के एजेंडे पर काम कर रहा है। बाजारु मूल्यों को नैतिक मूल्यों के रुप में स्थापित करने की प्रक्रिया पूरी दुनिया में एक भीषण सांस्कृतिक संहार को जन्म दे रही है। इसलिए इस प्रक्रिया पर समग्र चिंतन किया जाना मानव और मानवता दोनों के लिए आवश्यक है। चिंतन की यह प्रक्रिया जैक्सन के जरिए शुरु हो सकती है क्योंकि जैक्सन का जीवन और उनकी मौत बाजार के साथ संचार जगत को अपने मूल्यों के प्रति आत्मावलोकन का अवसर प्रदान करती है।

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देश-काल

मीडिया ’मेड इन चाइना’

अभी दुनिया में जिन कुछ देशों में आयरन कर्टेन पॉलिसी शिद्दत के साथ लागू की जाती है, उनमें चीन सबसे ऊपर है। ऐसे में मेड इन चाइना वर्जन के सहारे भारत में पत्रकारिता करना राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक तो है ही, पत्रकारीय-मूल्यों के लिहाज से भी यह गर्त में जाने जैसा है।

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22 जून को एक लाइव टीवी डिबेट के दौरान सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद ने भारतीय सूचना-तंत्र पर कटाक्ष करते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उनके अनुसार सेना और सरकार के आधिकारिक बयान के बारे में भारतीय मीडिया का एक वर्ग संदेह पैदा करना चाहता है। इस वर्ग की तरफ से ऐसे अपुष्ट तथ्य सामने रखे जा रहे हैं, जिनसे राष्ट्रीय हित को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। पूर्व भारतीय सैन्य अधिकारी ने सवाल उठाते हुए कहा कि देश के बयान को सच न मानकर जिन अपुष्ट तथ्यों और प्रायोजित प्रश्नों को सच के रूप में परोसा जा रहा है, उनका सोर्स पता किया जाना चाहिए। यदि स्रोत की पहचान हो जाए तो भारतीय मीडिया के उस वर्ग की मानसिकता और हितों की आसानी से पहचान की जा सकती है।

स्पष्टतः लेफ्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद ग्लोबल टाइम्स के प्रोपेगेंडा को भारत के आधिकारिक बयान पर तरजीह देने वाले मीडिया के एक वर्ग की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे थे। उन्होंने कहा कि युद्ध जैसी स्थिति में शत्रु के बयान को अधिक वजन देकर भारतीय मीडिया का एक वर्ग क्या साबित करना चाहता है? वह भारतीय मीडिया के उस वर्ग के बारे में अपनी खीझ व्यक्त कर रहे थे, जो 16 जून के बाद ग्लोबल टाइम्स के दृष्टिकोण,तथ्य और बयानों को अंतिम सच मानकर ज्यों का त्यों स्वीकार रहा था।

ऐसी ही एक बहस में हायब्रिड वारफेयर पर विशेषज्ञता रखने वाले लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन ने राय दी कि गलवान-संघर्ष ने चीन के उस मनोवैज्ञानिक लाभ को ध्वस्त कर दिया है, जो उसने 1962 के युद्ध के बाद हासिल किया था। यह साबित हो गया है कि जमीन पर चीन, भारतीय सेना से बहुत कमजोर है। गलवान का सैन्य महत्व तो है ही, उससे अधिक महत्व मनोवैज्ञानिक है।

इन दोनों टिप्पणियों को केन्द्र में रखकर 16 जून के बाद भारतीय मीडिया के व्यवहार को देखें तो कोई बहुत अच्छी तस्वीर नहीं उभरती। निर्णायक मौकों पर अपने देश, सेना, सरकार को लेकर वह अजीब तरह के हीनताबोध का प्रदर्शन करती है। शल्य वृत्ति उसके भीतर बहुत गहरे तक धंसी हुई है।

भारतीय मीडिया के एक वर्ग की यह प्रवृत्ति हायब्रिड वारफेयर, या फिफ्थ जनरेशन वारफेयर के वर्तमान दौर में देशहित को गंभीर नुकसान पहुंचा रही है। युद्ध की नई शैली सीमा और सैनिकों तक सीमित नहीं है। सूचना-तंत्र और सूचना-प्रवाह इसका अहम हिस्सा हो चुके हैं। इस लिहाज से पत्रकार देश की सुरक्षा की अहम कड़ी बन चुके हैं। सोशल-मीडिया के आने के बाद तो प्रत्येक नागरिक, उसकी सोच और अभिव्यक्ति की भी युद्ध में निश्चित भूमिका तय हो जाती है।

ऐसे में पेशेवर मीडिया से सम्बंध रखने वाले लोग ’मेड इन चाइना वर्जन’ को अधिक तरजीह देकर देश की सुरक्षा और सम्प्रभुता के साथ खिलवाड़ क्यों करना चाहते हैं? इसका रहस्यभेदन करना राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ खुले एक महत्वपूर्ण मोर्चे को फतह करने जैसा है। आखिर क्या कारण है कि अपने ऊल-जलूल शीर्षकों के लिए पहचान बना चुका अंग्रेजी अखबार भारत-चीन संघर्ष के बाद बड़े निर्लज्जतापूर्वक यह शीर्षक लगाता है कि उन्होंने हमें घर में घुसकर मारा। इस शीर्षक से देशवासियों और सेना को क्या संदेश देने की कोशिश की जा रही थी और इससे किसके हितों की पूर्ति हो रही थी, यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है।

क्या कारण है कि ग्लोबल टाइम्स के इस निष्कर्ष को कि चीन में भारतीय प्रधानमंत्री के आधिकारिक बयान की बहुत प्रशंसा हो रही है, हमारे अखबार ज्यो का त्यों प्रकाशित करते हैं? यह जानते हुए कि ग्लोबल टाइम्स की हैसियत चीनी सत्ता-प्रतिष्ठान के प्रोपेगैंडा-मशीन से अधिक कुछ नहीं हैं। यही ग्लोबल टाइम्स पिछले पांच सालों से भारतीय प्रधानमंत्री को अतिराष्ट्रवादी रवैये के लिए कोसता रहा है। उसकी यह स्टोरी प्रधानमंत्री की राष्ट्रवादी और मजबूत निर्णय लेने वाली छवि को नुकसान पहुंचाने के लिए प्लांट की गई थी। भारत का मीडिया उसकी चाल में फंसा, और उसके बाद कुछ राजनीतिक दल भी। यह एक वेल-डिजाइन और वेल-टारगेटेड स्टोरी थी।

ऐसा नहीं है कि ग्लोबल टाइम्स की भारतीय प्रधानमंत्री की मजबूत और निर्णायक छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश अपने तरह की पहली कोशिश हो। भारत में  2019 में होने वाले आम चुनावों के ठीक पहले पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने यह कहते हुए सबको हैरत में डाल दिया था कि यदि चुनावों में मोदी जीतते हैं तो भारत और पाक के शांति-प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। इससे पहले इमरान खान मोदी को हठी और शांति-प्रक्रिया का दुश्मन बताते रहे हैं। जाहिर है यह बयान मोदी को चुनावों में नुकसान पहुंचाने और उस फर्जी नैरेशन को मजबूत करने के लिए दिया गया था, जिसमें पुलवामा हमलों के लिए मोदी और पाकिस्तान की मिलीभगत का आरोप लगाया गया था। चुनाव समाप्त होने के बाद, नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद, इमरान खान ने फिर भूलकर भी ऐसा बयान नहीं दिया। स्पष्ट है कि सूचना-संग्राम का अपना आकलन, अपने निशाने और रणनीति होती है, जिसे समग्र परिप्रेक्ष्य में रखे बगैर समझा नहीं जा सकता।

ऐसा नहीं कि भारतीय मीडिया का जो वर्ग चायनीज वर्जन को अंतिम मानकर परोस रहा है, उसे मीडिया के जरिए लड़ी जाने लड़ाई और उसके तौर-तरीकों का पता न हो। इनमें से अधिकांश कई दशकों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं, इसलिए उनकी समझ पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। फिर दो ही संभावनाएं बचती हैं, या तो वे घरेलू राजनीतिक-संघर्ष को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक खींचने की कोशिश कर रहे हैं या फिर उनकी निष्ठा देश के प्रति कभी रही नहीं हैं, और अन्य देशों के मीडिया आउटलेट का एक्सटेंशन काउंटर के रूप में कार्य रहे हैं। हो सकता है कि यह दोनों बातें साथ-साथ काम रही हों।  

भारतीय मीडिया के मेड इन चाइना संस्करण को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि अविश्वसनीय होना चीन की सबसे बड़ी पहचान है। चीन और उसके उत्पादों के बारे में कोई भी किसी भी तरह का दावा करने से बचता है। दुकानदार, खरीददार सभी का चीनी उत्पादों के बारे में मूल्यांकन यही होता है-चीनी सामान है, कितने दिन चलेगा इसका कोई भरोसा नहीं। वहां की पत्रकारिता को लेकर अविश्वास तो और भी अधिक है। क्योंकि अभी दुनिया में जिन कुछ देशों में आयरन कर्टेन पॉलिसी शिद्दत के साथ लागू की जाती है, उनमें चीन सबसे ऊपर है। ऐसे में मेड इन चाइना वर्जन के सहारे भारत में पत्रकारिता करना राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक तो है ही, पत्रकारीय-मूल्यों के लिहाज से भी यह गर्त में जाने जैसा है।

चायनीज मीडिया के भारतीय संस्करणों को जून 2020 के तीसरे सप्ताह में यह बात समझ में आ गई होगी कि किसी दूसरे देश का भोंपू बनने और वास्तविक खबर के बीच अंतर करने का कौशल अब भारतीय जनता में आ गया है। इसलिए पत्रकारिता के मूल्यों की दुहाई देकर देशहित के साथ खिलवाड़ करने का खेल भी वह अच्छी तरह समझने लगी है। अब चीन के सबसे बड़े रणनीतिकार माने जाने वाले शुन झू की बिना लड़े युद्ध जीतने की नीति भारत में आगे नहीं बढ़ पाएगी। ऐसे में चीन और भारत में काम कर रहे मेड इन चाइना वर्जन को स्वीकार करने वाले मीडिया का अवसाद और अवमूल्यन की तरफ बढ़ना बहुत स्वाभाविक है।

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देश-काल

भारतीय मुसलमानों का ’देशज विमर्श’, जो उनके खुरदुरे यथार्थ के एकदम नजदीक है

ए.टी.एम. को मुसलमानों का प्रतिनिधि मानने से राजनीतिक और अकादमिक स्तर पर मुसलमानों की वास्तविक स्थिति देश के सामने नहीं आ पाई है। इस न्यूनता के कारण जहां साम्प्रदायिक-संघर्षों की प्रकृति को समझने में नीति-नियंता प्रायः विफल हो जाते हैं

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जम्मू-कश्मीर के ख्यातिलब्ध विद्वान और प्रसिद्ध भारतविद् प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री की नई पुस्तक ’कश्मीर का रिसता घाव: एटीएम बनाम डीएम का संघर्ष’ मुसलमानों के भारतीय यथार्थ को नई शब्दावली और उपकरणों के माध्यम से समझने की एक ऐसी ही कोशिश है। प्रो. अग्निहोत्री ने भारतीय मुसलमानों को मोटे तौर पर दो वर्गों  में विभक्त कर मुसलमानों की आंतरिक दुनिया में झांकने की कोशिश की है। वह विदेशी नस्ल के मुसलमानों को ए.टी.एम ( अरब-तुर्क-मुगल) कहते हैं और भारतीय मूल के मुसलमानों को डी.एम (देशी मुसलमान) के नाम से सम्बोधित करते हैं। इस शब्दावली के माध्यम से उन्होंने मोटे-तौर पर सम्पूर्ण भारत और विशेष रूप में जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों की सामाजिक-सांस्कृतिक गत्यात्मकता को समझने की कोशिश की है।

उनका मानना है कि मुसलमानों को एक समूह और ए.टी.एम. को मुसलमानों का प्रतिनिधि मानने से राजनीतिक और अकादमिक स्तर पर मुसलमानों की वास्तविक स्थिति देश के सामने नहीं आ पाई है। इस न्यूनता के कारण जहां साम्प्रदायिक-संघर्षों की प्रकृति को समझने में नीति-नियंता प्रायः विफल हो जाते हैं और आर्थिक स्तर पर लक्षित समूहों तक योजनाओं का लाभ पहुंच पाता है और न ही उनके सशक्तिकरण की दिशा में कदम उठ पाते है। इससे भी बड़ी बात यह कि ए.टी.एम. को मुसलमानों का प्रतिनिधि मानने से देशज मुसलमानों को उनकी भारतीय सम्बद्धता से एकदम से काटने के प्रयास किए जाते हैं। 

वह कहते हैं-जब भी भारत में मुसलमानों का अध्ययन किया जाता है तो ए.टी.एम. बनाम डी.एम. को जोड़कर भारतीय मुसलमान कह दिया जाता है। इतना ही नहीं, इस प्रकार के अध्ययनों में केस स्टडी के लिए ए.टी.एम को ही लिया जाता है लेकिन उसके निष्कर्षों से डी.एम. या देसी मुसलमानों को शिकार बनाया जाता है। इस प्रकारा देसी मुसलमान ए.टी.एम के नीचे दब जाता है। ( पृष्ठ.36)

उनका मानना है कि जम्मू-कश्मीर का प्रश्न हिन्दू-मुस्लिम से अधिक ए.टी.एम. बनाम डी.एम. का प्रश्न है। यदि इस संघर्ष के कारणों और उपकरणों की ठीक ढंग से पहचान कर ली जाए तो जम्मू-कश्मीर के प्रश्न के समाधान में तो सहयोग मिलेगा ही, सम्पूर्ण भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या से निपटने में भी मदद मिलेगी।

इस पुस्तक में इन दोनों समुदायों के टकराव, उसके विविध पड़ावों, उसमें अपनायी जाने वाली रणनीतियों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। टकराव का मुख्य बिंदु यह है कि एक तरफ विदेशी मुसलमानों का वर्ग देशी मुसलमानों से उनकी प्रत्येक पहचान को छीनकर अपने खांचे मे ढालने के लिए प्रयास करता है, लेकिन नीति-निर्णयन की प्रक्रिया में उन्हें स्थान नहीं देना चाहता। लेखक ने इस प्रक्रिया और मानसिकता को सैयदीकरण कहा है। दूसरी तरफ लगातार दबावों, जलालतों और कुंठाओं को सहते हुए भी देशज मुसलमान अपनी परम्परागत पहचान को अब तक अपने साथ बनाए हुए है। लेखक का मानना है कि पिछले कुछ वर्षो में देशज मुसलमानों में अपनी पहचान को लेकर आकर्षण न केवल बढ़ा है। यह हवा पिछले कुछ सालों से ही बह निकली है। सैयदों की छ सौ सालों की मेहनत में जलजले आने लगे हैं। देसी मुसलमान अपने पुर्वजों की खोज में निकल पड़ा है। ( पृष्ठ-254)

लेखक नवीन परिस्थितियों से उभर रहे समीकरणों को लेकर आशान्वित है और यह मानते हैं  कि देशज मुसलमान को अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर बढ़ता आग्रह स्वस्थ भारतीय समाज के लिए महत्वपूर्ण है। जम्मू-कश्मीर में संदर्भो में वह देशी मुसलमानों की मजबूत होती आवाज को और भी अधिक जरूरी मानते हैं। मजहब की गोलियां खिला-खिलाकर बेहोश की गई जातियां अंगड़ाई लेने लगीं। उनकी यह अंगड़ाई ही सैयदों के वर्चस्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। यही कारण है  कि वे 370 की लाश को रो-रोकर घर में संभालने का हठ किए हुए हैं और सुपुर्द-ए-खाक करने में आनाकानी कर रही हैं। (पृष्ठ 234)

यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण अकादमिक हस्तक्षेप तो है ही, भारतीय मुस्लिम समाज और उसके अंतर्द्वंद्वों को समझने के लिए सटीक उपकरण और शब्दावली भी उपलब्ध कराने के कारण सभ्यतागत दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गई है। सामाजिक विमर्श को लेकर संवेदनशील लोगों के लिए तो ये पुस्तक जरूरी है ही, राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ सभ्यतागत विमर्श में रुचि रखने वाले अध्येताओं के लिए भी अपने सर्वथा नवीन परिप्रेक्ष्य कारण यह पुस्तक संग्रहणीय है।   

एक ऐसे समय में जब भारत अपनी पहचान और यथार्थ को लेकर अधिक सजग और संवेदनशील हुआ है, यह पुस्तक देशज मुसलमानों के आंतरिक-सिलवटों और अंतरद्वंद्वों को न केवल पहचानने की कोशिश करती है, बल्कि उनके सम्यक समाधान के मार्ग की तरफ भी संकेत करती है ।

पुस्तक का नाम: कश्मीर का रिसता घाव-ATM बनाम DM संघर्ष’

लेखक       : प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

प्रकाशक     : प्रभात प्रकाशन

मूल्य          : 400 रुपए

समीक्षक : डॉ. जयप्रकाश सिंह, सहायक आचार्य, कश्मीर अध्ययन केंद्र, हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला

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देश-काल

शोध से समर्थ होगी भाषा

हिंदी के इस विस्तार के साथ उसकी प्रतिष्ठा घट रही है। इसका उपयोग अपनी पहचान के एक गौरवशाली उपकरण के रूप में करने की प्रवृत्ति दिन-ब-दिन क्षीण होती जा रही है।

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जब भी हिंदी की स्थिति का आकलन किया जाता है तो दो निर्विवाद तथ्य उभरकर हमारे सामने आते हैं। पहला यह कि हिंदी का विस्तार उसके परंपरागत क्षेत्र से बाहर हो रहा है। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे कुछ प्रदेशों को छोड़कर, जहां कि त्रिभाषा फार्मूला पूरी तरह से नहीं लागू किया गया है, हिंदी का पठन-पाठन पूरे भारत में हो रहा है। जनमाध्यमों के कारण भी हिंदी का सहज विस्तार हो रहा है, हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है।

दूसरा और हैरतभरा तथ्य यह है कि हिंदी के इस विस्तार के साथ उसकी प्रतिष्ठा घट रही है। इसका उपयोग अपनी पहचान के एक गौरवशाली उपकरण के रूप में करने की प्रवृत्ति दिन-ब-दिन क्षीण होती जा रही है। सामान्य जरूरतों को पूरा करने वाली बोली के रूप में तो हिंदी का विस्तार हो रहा है लेकिन चिंतन और ज्ञान-विज्ञान की समर्थ भाषा के रूप में इसका स्खलन हो रहा है। हिंदी कायिक रूप से तोला-तोला बढ़ रही है और आत्मिक रूप से माशा-माशा मर भी रही है।

इसलिए हिंदी का आत्मिक सशक्तिकरण समय की जरूरत बन जाता है। सबल बनाने की कई संभावनाएं मौजूद हैं। भाषा-विशेषज्ञ गाहे-बगाहे उनका जिक्र भी करते रहते हैं। लेकिन यदि किसी एक संभावना की पहचान करनी है,जिससे ङ्क्षहंदी को सर्वाधिक आत्मिक संबल मिल सकता है, तो वह है शोध की दुनिया से इसके जुड़ाव की पहल।

शोध शैक्षणिक गतिविधि का शीर्ष बिंदु है। भूतकाल की बिखरी कडिय़ों को जोडऩे , वर्तमान प्रवाह को पकडऩे और भविष्य के उभरते सांचे को समझने की क्षमता शोधवृत्ति से ही पैदा होती है। शोध बिखरे हुए तथ्यों और प्रवृत्तियों को एकदूसरे से जोड़कर पूरी तस्वीर बनाता है और इस तरह एक स्पष्ट समझ बनाने में हमारी सहायता करता है। यह पूरी तस्वीर और स्पष्ट समझ ही राजनीतिक, आर्थिक और संांस्कृतिक सामथ्र्य को सिरजते हैं। जाहिर है शोध जिस भाषा में होते हैं, उसके साथ गांभीर्य, सामथ्र्य और प्रतिष्ठा बोध अपने आप जुड़ जाते हैं।

दुर्भाग्य यह है कि हिंदी की उपस्थिति शोध की दुनिया में नगण्य जैसी है अथवा बना दी गई है। वाणिज्य, प्रबंधन और विज्ञान से संबंधित शोधों की दुनिया में हिंदी का प्रवेश निषेध है। कला से संबंधित विषयों में हिंदीभाषी क्षेत्र में विश्वविद्यालयों में थोड़ा बहुत शोध कार्य होता है। लेकिन यहां भी स्थिति हारे को हरिनाम जैसी रहती है।

हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं का शोध की दुनिया से जुड़ाव परिदृश्य को कैसे बदल सकता है, इस पर एक नजर डालना जरूरी है। भाषा, जो हम जानते हैं उसके अभिव्यक्ति की ही सीमा निर्धारित नहीं करती। भाषा जो हम जान सकते हैं, उसकी परिधि भी निर्धारित करती है। इसी बिंदु पर शोध और भाषा के अंतर्संबंध महत्त्वपूर्ण हो उठते हैं।

भाषा समस्याओं की पहचान, जो कि किसी भी शोध का प्रस्थान बिंदु है, में अहम भूमिका निभाती है। यही बात शोध में भाषा की भूमिका को महत्त्वपूर्ण बना देती हें। दो उदाहरणों से यह बात स्पष्ट हो जाती है। पिछले दिनों नारायण मूर्ति ने बड़े खेद के साथ कहा कि भारतीय शोध जगत पिछले पचास सालों में कोई भी ऐसा आविष्कार नहीं कर सका है,जो सामान्य जनजीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया हो अथवा जिसने सामान्य आदमी के जनजीवन में बड़ा बदलाव कर दिया हो। इसी तरह की एक रोचक बात सीएसआईआर के पूर्व प्रमुख आर माशेलकर ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कही थी। माशेलकर के अनुसार पिछले पचास वर्षों में भारतीयों ने छोटे-बड़े कई उपकरण बनाए हैं। नाभिकीय संयत्र तक भारतीय इंजीनियर बनाने लगे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि भारतीय विज्ञान जगत मिट्टी के चूल्ले में थोड़ा सा भी सुधार नहीं कर सका है। चूल्हों की डिजाइन पिछले पांच हजार वर्षों से जैसे की तैसी बनी हुई है। भारत की 70 फीसदी गृिहणियों का आमना-सामान दैनिक रूप से इस चूल्हे से होता है। दिन का एक चौथाई हिस्सा इसी चूल्हे के साथ गुजर जाता है। इसके कारण अधिकांश महिलाओं को श्वसन और तंत्रिका संबंधी गंभीर बीमारियां हो जाती हैं। हैरत की बात यह है कि भारतीय विज्ञान जगत को कभी भी यह नहीं लगा कि शोध का एक छोटा से विषय चूल्हे में सुधार भी हो सकता है और इससे करोड़ो की जिंदगी में बेहतरी आ सकती है।

प्रबंधन और विज्ञान जगत के इन मूर्धन्य लोगों के ऐसे ‘आश्चर्र्योंÓ के कई अन्य कारण हो सकते हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण तो भाषा ही है। भारत में प्रबंधन, सूचना तकनीक और विज्ञान जगत से संबंधित लगभग शत-प्रतिशत शोध अंग्रेजी में होते हैं। अब अंग्रेजी के राडार पर मोबाइल,टेलीविजन और कार संबंधी छोटी से छोटी जरूरतें तो उभर आती है लेकिन चूल्हे जैसी जमीनी चीज को अंग्रेजी का हवाई राडार नहीं पकड़ पाता। अंग्रेजी जिस आर्थिकी में पलती है, उसमें मिट्टी के चूल्हें के लिए कोई स्थान नहीं होता। बहुत संभावना इस बात की है कि अंग्रेजी के परिवेश में पला बढ़ा व्यक्ति चूल्हे नामक बला के बारे में जानता ही न हो। दूसरी तरफ जिस सामान्य आदमी के जीवन में चूल्हा केंद्रीय तत्त्व है, शोध की दुनिया में उसकी भाषा का प्रवेश वर्जित है। अंग्रेजी के प्रभुत्व के कारण मूलभूत समस्याओं की पहचान ही नहीं हो पाती, समाधान तो बहुत दूर की कोैड़ी है। हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में शोध न होने के कारण नारायणमूर्ति और माशेलकर के ‘आश्चर्यÓ पैदा होते हैं और चूल्हा हजारों साल तक वहीं का वहीं ठिठका रहता है। सबसे मजेदार बात तो यह है कि भारत में कृषि संबंधी अधिकांश शोध भी अंग्रेजी में होते हैं। ऐसे में जीएम फसलों पर शोधों की झड़ी लग जाती है लेकिन किसानों के नाक में दम कर देने वाली पार्थेेनियम घास (लोग इसे प्यार से कांग्रेस घास भी कहते हैं), से छुटकारे के लिए शोध संबंधी प्रयास नहीं होते।

शोध और परिवशे की भाषा के अलगाव के कारण दोतरफा विसंगति पैदा होती है। एक तरफ शोध के अभाव में परिवेश की भाषा को प्रतिष्ठा नहीं मिलती और दूसरी ओर परिवेश के भाषा से जुडाव न होने के कारण शोध मे मौलिकता और जमीनी सच्चाइयां नहीं झलक पातीं। शोध से न जुडऩे के कारण भारतीय भाषाओं की हैसियत प्रभावित होती है। बिना आजमाए ही भारतीय भाषाओं पर अक्षम होने का ‘लेबलÓ चस्पां कर दिया जाता है। यह समझाने की कोशिश की जाती है इन देशज भाषाओं में शोध जैसा उच्चस्तरीय चिंतन कैसे हो सकता है?

शोध से भारतीय भाषाओं का विलगाव, इन्हें अप्रतिष्ठित रखने का व्यवस्थागत षड्यंत्र है। कला, विज्ञान, वााणज्य और प्रबंधन में न्यूनतम पचीस फीसदी शोध कार्य, भारतीय भाषाओं के लिए आरक्षित करके न केवल शोध की दुनिया को मौलिक एवं धरातल बनाय जा सकता है बल्कि भारतीय भाषाओं के बारे में प्रतिष्ठा बोध भी पैदा किया जा सकता है। यही भाषायी आत्महीनता के महारोग का प्रारंभिक उपचार होगा।

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