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देश-काल

शोध से समर्थ होगी भाषा

हिंदी के इस विस्तार के साथ उसकी प्रतिष्ठा घट रही है। इसका उपयोग अपनी पहचान के एक गौरवशाली उपकरण के रूप में करने की प्रवृत्ति दिन-ब-दिन क्षीण होती जा रही है।

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जब भी हिंदी की स्थिति का आकलन किया जाता है तो दो निर्विवाद तथ्य उभरकर हमारे सामने आते हैं। पहला यह कि हिंदी का विस्तार उसके परंपरागत क्षेत्र से बाहर हो रहा है। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे कुछ प्रदेशों को छोड़कर, जहां कि त्रिभाषा फार्मूला पूरी तरह से नहीं लागू किया गया है, हिंदी का पठन-पाठन पूरे भारत में हो रहा है। जनमाध्यमों के कारण भी हिंदी का सहज विस्तार हो रहा है, हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है।

दूसरा और हैरतभरा तथ्य यह है कि हिंदी के इस विस्तार के साथ उसकी प्रतिष्ठा घट रही है। इसका उपयोग अपनी पहचान के एक गौरवशाली उपकरण के रूप में करने की प्रवृत्ति दिन-ब-दिन क्षीण होती जा रही है। सामान्य जरूरतों को पूरा करने वाली बोली के रूप में तो हिंदी का विस्तार हो रहा है लेकिन चिंतन और ज्ञान-विज्ञान की समर्थ भाषा के रूप में इसका स्खलन हो रहा है। हिंदी कायिक रूप से तोला-तोला बढ़ रही है और आत्मिक रूप से माशा-माशा मर भी रही है।

इसलिए हिंदी का आत्मिक सशक्तिकरण समय की जरूरत बन जाता है। सबल बनाने की कई संभावनाएं मौजूद हैं। भाषा-विशेषज्ञ गाहे-बगाहे उनका जिक्र भी करते रहते हैं। लेकिन यदि किसी एक संभावना की पहचान करनी है,जिससे ङ्क्षहंदी को सर्वाधिक आत्मिक संबल मिल सकता है, तो वह है शोध की दुनिया से इसके जुड़ाव की पहल।

शोध शैक्षणिक गतिविधि का शीर्ष बिंदु है। भूतकाल की बिखरी कडिय़ों को जोडऩे , वर्तमान प्रवाह को पकडऩे और भविष्य के उभरते सांचे को समझने की क्षमता शोधवृत्ति से ही पैदा होती है। शोध बिखरे हुए तथ्यों और प्रवृत्तियों को एकदूसरे से जोड़कर पूरी तस्वीर बनाता है और इस तरह एक स्पष्ट समझ बनाने में हमारी सहायता करता है। यह पूरी तस्वीर और स्पष्ट समझ ही राजनीतिक, आर्थिक और संांस्कृतिक सामथ्र्य को सिरजते हैं। जाहिर है शोध जिस भाषा में होते हैं, उसके साथ गांभीर्य, सामथ्र्य और प्रतिष्ठा बोध अपने आप जुड़ जाते हैं।

दुर्भाग्य यह है कि हिंदी की उपस्थिति शोध की दुनिया में नगण्य जैसी है अथवा बना दी गई है। वाणिज्य, प्रबंधन और विज्ञान से संबंधित शोधों की दुनिया में हिंदी का प्रवेश निषेध है। कला से संबंधित विषयों में हिंदीभाषी क्षेत्र में विश्वविद्यालयों में थोड़ा बहुत शोध कार्य होता है। लेकिन यहां भी स्थिति हारे को हरिनाम जैसी रहती है।

हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं का शोध की दुनिया से जुड़ाव परिदृश्य को कैसे बदल सकता है, इस पर एक नजर डालना जरूरी है। भाषा, जो हम जानते हैं उसके अभिव्यक्ति की ही सीमा निर्धारित नहीं करती। भाषा जो हम जान सकते हैं, उसकी परिधि भी निर्धारित करती है। इसी बिंदु पर शोध और भाषा के अंतर्संबंध महत्त्वपूर्ण हो उठते हैं।

भाषा समस्याओं की पहचान, जो कि किसी भी शोध का प्रस्थान बिंदु है, में अहम भूमिका निभाती है। यही बात शोध में भाषा की भूमिका को महत्त्वपूर्ण बना देती हें। दो उदाहरणों से यह बात स्पष्ट हो जाती है। पिछले दिनों नारायण मूर्ति ने बड़े खेद के साथ कहा कि भारतीय शोध जगत पिछले पचास सालों में कोई भी ऐसा आविष्कार नहीं कर सका है,जो सामान्य जनजीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया हो अथवा जिसने सामान्य आदमी के जनजीवन में बड़ा बदलाव कर दिया हो। इसी तरह की एक रोचक बात सीएसआईआर के पूर्व प्रमुख आर माशेलकर ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कही थी। माशेलकर के अनुसार पिछले पचास वर्षों में भारतीयों ने छोटे-बड़े कई उपकरण बनाए हैं। नाभिकीय संयत्र तक भारतीय इंजीनियर बनाने लगे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि भारतीय विज्ञान जगत मिट्टी के चूल्ले में थोड़ा सा भी सुधार नहीं कर सका है। चूल्हों की डिजाइन पिछले पांच हजार वर्षों से जैसे की तैसी बनी हुई है। भारत की 70 फीसदी गृिहणियों का आमना-सामान दैनिक रूप से इस चूल्हे से होता है। दिन का एक चौथाई हिस्सा इसी चूल्हे के साथ गुजर जाता है। इसके कारण अधिकांश महिलाओं को श्वसन और तंत्रिका संबंधी गंभीर बीमारियां हो जाती हैं। हैरत की बात यह है कि भारतीय विज्ञान जगत को कभी भी यह नहीं लगा कि शोध का एक छोटा से विषय चूल्हे में सुधार भी हो सकता है और इससे करोड़ो की जिंदगी में बेहतरी आ सकती है।

प्रबंधन और विज्ञान जगत के इन मूर्धन्य लोगों के ऐसे ‘आश्चर्र्योंÓ के कई अन्य कारण हो सकते हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण तो भाषा ही है। भारत में प्रबंधन, सूचना तकनीक और विज्ञान जगत से संबंधित लगभग शत-प्रतिशत शोध अंग्रेजी में होते हैं। अब अंग्रेजी के राडार पर मोबाइल,टेलीविजन और कार संबंधी छोटी से छोटी जरूरतें तो उभर आती है लेकिन चूल्हे जैसी जमीनी चीज को अंग्रेजी का हवाई राडार नहीं पकड़ पाता। अंग्रेजी जिस आर्थिकी में पलती है, उसमें मिट्टी के चूल्हें के लिए कोई स्थान नहीं होता। बहुत संभावना इस बात की है कि अंग्रेजी के परिवेश में पला बढ़ा व्यक्ति चूल्हे नामक बला के बारे में जानता ही न हो। दूसरी तरफ जिस सामान्य आदमी के जीवन में चूल्हा केंद्रीय तत्त्व है, शोध की दुनिया में उसकी भाषा का प्रवेश वर्जित है। अंग्रेजी के प्रभुत्व के कारण मूलभूत समस्याओं की पहचान ही नहीं हो पाती, समाधान तो बहुत दूर की कोैड़ी है। हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में शोध न होने के कारण नारायणमूर्ति और माशेलकर के ‘आश्चर्यÓ पैदा होते हैं और चूल्हा हजारों साल तक वहीं का वहीं ठिठका रहता है। सबसे मजेदार बात तो यह है कि भारत में कृषि संबंधी अधिकांश शोध भी अंग्रेजी में होते हैं। ऐसे में जीएम फसलों पर शोधों की झड़ी लग जाती है लेकिन किसानों के नाक में दम कर देने वाली पार्थेेनियम घास (लोग इसे प्यार से कांग्रेस घास भी कहते हैं), से छुटकारे के लिए शोध संबंधी प्रयास नहीं होते।

शोध और परिवशे की भाषा के अलगाव के कारण दोतरफा विसंगति पैदा होती है। एक तरफ शोध के अभाव में परिवेश की भाषा को प्रतिष्ठा नहीं मिलती और दूसरी ओर परिवेश के भाषा से जुडाव न होने के कारण शोध मे मौलिकता और जमीनी सच्चाइयां नहीं झलक पातीं। शोध से न जुडऩे के कारण भारतीय भाषाओं की हैसियत प्रभावित होती है। बिना आजमाए ही भारतीय भाषाओं पर अक्षम होने का ‘लेबलÓ चस्पां कर दिया जाता है। यह समझाने की कोशिश की जाती है इन देशज भाषाओं में शोध जैसा उच्चस्तरीय चिंतन कैसे हो सकता है?

शोध से भारतीय भाषाओं का विलगाव, इन्हें अप्रतिष्ठित रखने का व्यवस्थागत षड्यंत्र है। कला, विज्ञान, वााणज्य और प्रबंधन में न्यूनतम पचीस फीसदी शोध कार्य, भारतीय भाषाओं के लिए आरक्षित करके न केवल शोध की दुनिया को मौलिक एवं धरातल बनाय जा सकता है बल्कि भारतीय भाषाओं के बारे में प्रतिष्ठा बोध भी पैदा किया जा सकता है। यही भाषायी आत्महीनता के महारोग का प्रारंभिक उपचार होगा।

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  1. Dr Ravinder Singh Bhadwal

    June 11, 2023 at 8:15 am

    बहुत बढ़िया विश्लेषण…

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देश-काल

मीडिया ’मेड इन चाइना’

अभी दुनिया में जिन कुछ देशों में आयरन कर्टेन पॉलिसी शिद्दत के साथ लागू की जाती है, उनमें चीन सबसे ऊपर है। ऐसे में मेड इन चाइना वर्जन के सहारे भारत में पत्रकारिता करना राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक तो है ही, पत्रकारीय-मूल्यों के लिहाज से भी यह गर्त में जाने जैसा है।

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22 जून को एक लाइव टीवी डिबेट के दौरान सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद ने भारतीय सूचना-तंत्र पर कटाक्ष करते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उनके अनुसार सेना और सरकार के आधिकारिक बयान के बारे में भारतीय मीडिया का एक वर्ग संदेह पैदा करना चाहता है। इस वर्ग की तरफ से ऐसे अपुष्ट तथ्य सामने रखे जा रहे हैं, जिनसे राष्ट्रीय हित को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। पूर्व भारतीय सैन्य अधिकारी ने सवाल उठाते हुए कहा कि देश के बयान को सच न मानकर जिन अपुष्ट तथ्यों और प्रायोजित प्रश्नों को सच के रूप में परोसा जा रहा है, उनका सोर्स पता किया जाना चाहिए। यदि स्रोत की पहचान हो जाए तो भारतीय मीडिया के उस वर्ग की मानसिकता और हितों की आसानी से पहचान की जा सकती है।

स्पष्टतः लेफ्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद ग्लोबल टाइम्स के प्रोपेगेंडा को भारत के आधिकारिक बयान पर तरजीह देने वाले मीडिया के एक वर्ग की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे थे। उन्होंने कहा कि युद्ध जैसी स्थिति में शत्रु के बयान को अधिक वजन देकर भारतीय मीडिया का एक वर्ग क्या साबित करना चाहता है? वह भारतीय मीडिया के उस वर्ग के बारे में अपनी खीझ व्यक्त कर रहे थे, जो 16 जून के बाद ग्लोबल टाइम्स के दृष्टिकोण,तथ्य और बयानों को अंतिम सच मानकर ज्यों का त्यों स्वीकार रहा था।

ऐसी ही एक बहस में हायब्रिड वारफेयर पर विशेषज्ञता रखने वाले लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन ने राय दी कि गलवान-संघर्ष ने चीन के उस मनोवैज्ञानिक लाभ को ध्वस्त कर दिया है, जो उसने 1962 के युद्ध के बाद हासिल किया था। यह साबित हो गया है कि जमीन पर चीन, भारतीय सेना से बहुत कमजोर है। गलवान का सैन्य महत्व तो है ही, उससे अधिक महत्व मनोवैज्ञानिक है।

इन दोनों टिप्पणियों को केन्द्र में रखकर 16 जून के बाद भारतीय मीडिया के व्यवहार को देखें तो कोई बहुत अच्छी तस्वीर नहीं उभरती। निर्णायक मौकों पर अपने देश, सेना, सरकार को लेकर वह अजीब तरह के हीनताबोध का प्रदर्शन करती है। शल्य वृत्ति उसके भीतर बहुत गहरे तक धंसी हुई है।

भारतीय मीडिया के एक वर्ग की यह प्रवृत्ति हायब्रिड वारफेयर, या फिफ्थ जनरेशन वारफेयर के वर्तमान दौर में देशहित को गंभीर नुकसान पहुंचा रही है। युद्ध की नई शैली सीमा और सैनिकों तक सीमित नहीं है। सूचना-तंत्र और सूचना-प्रवाह इसका अहम हिस्सा हो चुके हैं। इस लिहाज से पत्रकार देश की सुरक्षा की अहम कड़ी बन चुके हैं। सोशल-मीडिया के आने के बाद तो प्रत्येक नागरिक, उसकी सोच और अभिव्यक्ति की भी युद्ध में निश्चित भूमिका तय हो जाती है।

ऐसे में पेशेवर मीडिया से सम्बंध रखने वाले लोग ’मेड इन चाइना वर्जन’ को अधिक तरजीह देकर देश की सुरक्षा और सम्प्रभुता के साथ खिलवाड़ क्यों करना चाहते हैं? इसका रहस्यभेदन करना राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ खुले एक महत्वपूर्ण मोर्चे को फतह करने जैसा है। आखिर क्या कारण है कि अपने ऊल-जलूल शीर्षकों के लिए पहचान बना चुका अंग्रेजी अखबार भारत-चीन संघर्ष के बाद बड़े निर्लज्जतापूर्वक यह शीर्षक लगाता है कि उन्होंने हमें घर में घुसकर मारा। इस शीर्षक से देशवासियों और सेना को क्या संदेश देने की कोशिश की जा रही थी और इससे किसके हितों की पूर्ति हो रही थी, यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है।

क्या कारण है कि ग्लोबल टाइम्स के इस निष्कर्ष को कि चीन में भारतीय प्रधानमंत्री के आधिकारिक बयान की बहुत प्रशंसा हो रही है, हमारे अखबार ज्यो का त्यों प्रकाशित करते हैं? यह जानते हुए कि ग्लोबल टाइम्स की हैसियत चीनी सत्ता-प्रतिष्ठान के प्रोपेगैंडा-मशीन से अधिक कुछ नहीं हैं। यही ग्लोबल टाइम्स पिछले पांच सालों से भारतीय प्रधानमंत्री को अतिराष्ट्रवादी रवैये के लिए कोसता रहा है। उसकी यह स्टोरी प्रधानमंत्री की राष्ट्रवादी और मजबूत निर्णय लेने वाली छवि को नुकसान पहुंचाने के लिए प्लांट की गई थी। भारत का मीडिया उसकी चाल में फंसा, और उसके बाद कुछ राजनीतिक दल भी। यह एक वेल-डिजाइन और वेल-टारगेटेड स्टोरी थी।

ऐसा नहीं है कि ग्लोबल टाइम्स की भारतीय प्रधानमंत्री की मजबूत और निर्णायक छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश अपने तरह की पहली कोशिश हो। भारत में  2019 में होने वाले आम चुनावों के ठीक पहले पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने यह कहते हुए सबको हैरत में डाल दिया था कि यदि चुनावों में मोदी जीतते हैं तो भारत और पाक के शांति-प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। इससे पहले इमरान खान मोदी को हठी और शांति-प्रक्रिया का दुश्मन बताते रहे हैं। जाहिर है यह बयान मोदी को चुनावों में नुकसान पहुंचाने और उस फर्जी नैरेशन को मजबूत करने के लिए दिया गया था, जिसमें पुलवामा हमलों के लिए मोदी और पाकिस्तान की मिलीभगत का आरोप लगाया गया था। चुनाव समाप्त होने के बाद, नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद, इमरान खान ने फिर भूलकर भी ऐसा बयान नहीं दिया। स्पष्ट है कि सूचना-संग्राम का अपना आकलन, अपने निशाने और रणनीति होती है, जिसे समग्र परिप्रेक्ष्य में रखे बगैर समझा नहीं जा सकता।

ऐसा नहीं कि भारतीय मीडिया का जो वर्ग चायनीज वर्जन को अंतिम मानकर परोस रहा है, उसे मीडिया के जरिए लड़ी जाने लड़ाई और उसके तौर-तरीकों का पता न हो। इनमें से अधिकांश कई दशकों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं, इसलिए उनकी समझ पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। फिर दो ही संभावनाएं बचती हैं, या तो वे घरेलू राजनीतिक-संघर्ष को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक खींचने की कोशिश कर रहे हैं या फिर उनकी निष्ठा देश के प्रति कभी रही नहीं हैं, और अन्य देशों के मीडिया आउटलेट का एक्सटेंशन काउंटर के रूप में कार्य रहे हैं। हो सकता है कि यह दोनों बातें साथ-साथ काम रही हों।  

भारतीय मीडिया के मेड इन चाइना संस्करण को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि अविश्वसनीय होना चीन की सबसे बड़ी पहचान है। चीन और उसके उत्पादों के बारे में कोई भी किसी भी तरह का दावा करने से बचता है। दुकानदार, खरीददार सभी का चीनी उत्पादों के बारे में मूल्यांकन यही होता है-चीनी सामान है, कितने दिन चलेगा इसका कोई भरोसा नहीं। वहां की पत्रकारिता को लेकर अविश्वास तो और भी अधिक है। क्योंकि अभी दुनिया में जिन कुछ देशों में आयरन कर्टेन पॉलिसी शिद्दत के साथ लागू की जाती है, उनमें चीन सबसे ऊपर है। ऐसे में मेड इन चाइना वर्जन के सहारे भारत में पत्रकारिता करना राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक तो है ही, पत्रकारीय-मूल्यों के लिहाज से भी यह गर्त में जाने जैसा है।

चायनीज मीडिया के भारतीय संस्करणों को जून 2020 के तीसरे सप्ताह में यह बात समझ में आ गई होगी कि किसी दूसरे देश का भोंपू बनने और वास्तविक खबर के बीच अंतर करने का कौशल अब भारतीय जनता में आ गया है। इसलिए पत्रकारिता के मूल्यों की दुहाई देकर देशहित के साथ खिलवाड़ करने का खेल भी वह अच्छी तरह समझने लगी है। अब चीन के सबसे बड़े रणनीतिकार माने जाने वाले शुन झू की बिना लड़े युद्ध जीतने की नीति भारत में आगे नहीं बढ़ पाएगी। ऐसे में चीन और भारत में काम कर रहे मेड इन चाइना वर्जन को स्वीकार करने वाले मीडिया का अवसाद और अवमूल्यन की तरफ बढ़ना बहुत स्वाभाविक है।

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देश-काल

भारतीय मुसलमानों का ’देशज विमर्श’, जो उनके खुरदुरे यथार्थ के एकदम नजदीक है

ए.टी.एम. को मुसलमानों का प्रतिनिधि मानने से राजनीतिक और अकादमिक स्तर पर मुसलमानों की वास्तविक स्थिति देश के सामने नहीं आ पाई है। इस न्यूनता के कारण जहां साम्प्रदायिक-संघर्षों की प्रकृति को समझने में नीति-नियंता प्रायः विफल हो जाते हैं

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जम्मू-कश्मीर के ख्यातिलब्ध विद्वान और प्रसिद्ध भारतविद् प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री की नई पुस्तक ’कश्मीर का रिसता घाव: एटीएम बनाम डीएम का संघर्ष’ मुसलमानों के भारतीय यथार्थ को नई शब्दावली और उपकरणों के माध्यम से समझने की एक ऐसी ही कोशिश है। प्रो. अग्निहोत्री ने भारतीय मुसलमानों को मोटे तौर पर दो वर्गों  में विभक्त कर मुसलमानों की आंतरिक दुनिया में झांकने की कोशिश की है। वह विदेशी नस्ल के मुसलमानों को ए.टी.एम ( अरब-तुर्क-मुगल) कहते हैं और भारतीय मूल के मुसलमानों को डी.एम (देशी मुसलमान) के नाम से सम्बोधित करते हैं। इस शब्दावली के माध्यम से उन्होंने मोटे-तौर पर सम्पूर्ण भारत और विशेष रूप में जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों की सामाजिक-सांस्कृतिक गत्यात्मकता को समझने की कोशिश की है।

उनका मानना है कि मुसलमानों को एक समूह और ए.टी.एम. को मुसलमानों का प्रतिनिधि मानने से राजनीतिक और अकादमिक स्तर पर मुसलमानों की वास्तविक स्थिति देश के सामने नहीं आ पाई है। इस न्यूनता के कारण जहां साम्प्रदायिक-संघर्षों की प्रकृति को समझने में नीति-नियंता प्रायः विफल हो जाते हैं और आर्थिक स्तर पर लक्षित समूहों तक योजनाओं का लाभ पहुंच पाता है और न ही उनके सशक्तिकरण की दिशा में कदम उठ पाते है। इससे भी बड़ी बात यह कि ए.टी.एम. को मुसलमानों का प्रतिनिधि मानने से देशज मुसलमानों को उनकी भारतीय सम्बद्धता से एकदम से काटने के प्रयास किए जाते हैं। 

वह कहते हैं-जब भी भारत में मुसलमानों का अध्ययन किया जाता है तो ए.टी.एम. बनाम डी.एम. को जोड़कर भारतीय मुसलमान कह दिया जाता है। इतना ही नहीं, इस प्रकार के अध्ययनों में केस स्टडी के लिए ए.टी.एम को ही लिया जाता है लेकिन उसके निष्कर्षों से डी.एम. या देसी मुसलमानों को शिकार बनाया जाता है। इस प्रकारा देसी मुसलमान ए.टी.एम के नीचे दब जाता है। ( पृष्ठ.36)

उनका मानना है कि जम्मू-कश्मीर का प्रश्न हिन्दू-मुस्लिम से अधिक ए.टी.एम. बनाम डी.एम. का प्रश्न है। यदि इस संघर्ष के कारणों और उपकरणों की ठीक ढंग से पहचान कर ली जाए तो जम्मू-कश्मीर के प्रश्न के समाधान में तो सहयोग मिलेगा ही, सम्पूर्ण भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या से निपटने में भी मदद मिलेगी।

इस पुस्तक में इन दोनों समुदायों के टकराव, उसके विविध पड़ावों, उसमें अपनायी जाने वाली रणनीतियों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। टकराव का मुख्य बिंदु यह है कि एक तरफ विदेशी मुसलमानों का वर्ग देशी मुसलमानों से उनकी प्रत्येक पहचान को छीनकर अपने खांचे मे ढालने के लिए प्रयास करता है, लेकिन नीति-निर्णयन की प्रक्रिया में उन्हें स्थान नहीं देना चाहता। लेखक ने इस प्रक्रिया और मानसिकता को सैयदीकरण कहा है। दूसरी तरफ लगातार दबावों, जलालतों और कुंठाओं को सहते हुए भी देशज मुसलमान अपनी परम्परागत पहचान को अब तक अपने साथ बनाए हुए है। लेखक का मानना है कि पिछले कुछ वर्षो में देशज मुसलमानों में अपनी पहचान को लेकर आकर्षण न केवल बढ़ा है। यह हवा पिछले कुछ सालों से ही बह निकली है। सैयदों की छ सौ सालों की मेहनत में जलजले आने लगे हैं। देसी मुसलमान अपने पुर्वजों की खोज में निकल पड़ा है। ( पृष्ठ-254)

लेखक नवीन परिस्थितियों से उभर रहे समीकरणों को लेकर आशान्वित है और यह मानते हैं  कि देशज मुसलमान को अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर बढ़ता आग्रह स्वस्थ भारतीय समाज के लिए महत्वपूर्ण है। जम्मू-कश्मीर में संदर्भो में वह देशी मुसलमानों की मजबूत होती आवाज को और भी अधिक जरूरी मानते हैं। मजहब की गोलियां खिला-खिलाकर बेहोश की गई जातियां अंगड़ाई लेने लगीं। उनकी यह अंगड़ाई ही सैयदों के वर्चस्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। यही कारण है  कि वे 370 की लाश को रो-रोकर घर में संभालने का हठ किए हुए हैं और सुपुर्द-ए-खाक करने में आनाकानी कर रही हैं। (पृष्ठ 234)

यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण अकादमिक हस्तक्षेप तो है ही, भारतीय मुस्लिम समाज और उसके अंतर्द्वंद्वों को समझने के लिए सटीक उपकरण और शब्दावली भी उपलब्ध कराने के कारण सभ्यतागत दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गई है। सामाजिक विमर्श को लेकर संवेदनशील लोगों के लिए तो ये पुस्तक जरूरी है ही, राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ सभ्यतागत विमर्श में रुचि रखने वाले अध्येताओं के लिए भी अपने सर्वथा नवीन परिप्रेक्ष्य कारण यह पुस्तक संग्रहणीय है।   

एक ऐसे समय में जब भारत अपनी पहचान और यथार्थ को लेकर अधिक सजग और संवेदनशील हुआ है, यह पुस्तक देशज मुसलमानों के आंतरिक-सिलवटों और अंतरद्वंद्वों को न केवल पहचानने की कोशिश करती है, बल्कि उनके सम्यक समाधान के मार्ग की तरफ भी संकेत करती है ।

पुस्तक का नाम: कश्मीर का रिसता घाव-ATM बनाम DM संघर्ष’

लेखक       : प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

प्रकाशक     : प्रभात प्रकाशन

मूल्य          : 400 रुपए

समीक्षक : डॉ. जयप्रकाश सिंह, सहायक आचार्य, कश्मीर अध्ययन केंद्र, हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला

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सभ्यतागत स्मृति की निधि बने सिनेमा

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भारतीय रजतपटल शत शरद ऋतुओं का द्रष्टा बन चुका है। वह शतायु हो गया है। आगामी 12-15 महीनों में कई तथ्य और तिथियां आपकी नजरों के सामने से बहुत बार गुजरेंगी। मसलन, प्रथम भारतीय कहानी आधारित फिल्म (फीचर फिल्म) ‘राजा हरिश्चंद्र’ है। इसके निर्माता धुंडिराज गोविंद फाल्के उपाख्य दादासाहब फाल्के थे। इस फिल्म की शूटिंग की शुरुआत 21 अक्टूबर 1912 से प्रारम्भ हुई। 21 अप्रैल 1913 को मुम्बई के ओलम्पिया हाॅल में इस फिल्म का पहला शो हुआ। यह शो पत्रकारों और बुद्धिजीवियों तक सीमित था। बाद में 3 मई 1913 को यह फिल्म जनसाधारण के समक्ष प्रदर्शित की गई। इन तमाम आंकड़ों को परोसने की प्रक्रिया में एक तथ्य को छुपाए जाने की प्रबल संभावना भी है। संभवतः पंथनिरपेक्षता की काली छाया और बाजार की कठोर काया का डर आंकड़ों के कारोबारियों को उस तथ्य का जिक्र करने से रोकगा, जिसने भारतीय सिनेमा के पितामह को फिल्म निर्माण के लिए अपनी भूमि और भाषा अपनाने की ललक पैदा की। वह तथ्य यह है कि इसाई मिशनरियों द्वारा संचालित मतांतरण अभियान से उपजे आक्रोश ने दादा साहब फाल्के को सिनेमा का भारतीय शिल्प गढ़ने के लिए प्रेरित किया था।

उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि मिशनरियों द्वारा सिनेमा के जरिए पश्चिमी आदर्शों को भारत पर थोपने की प्रक्रिया का प्रतिरोध करने के लिए दादा साहब ने भारतीय सिनेमा स्थापित करने के लिए प्रयास प्रारम्भ किए। यह एक स्थापित तथ्य है कि औपनिवेशिक शासनकाल में मतांतरण की प्रकिया को राज्याश्रय प्राप्त था। हिन्दू धर्मावलम्बियों को मतांतरित करने के लिए आर्थिक प्रलोभन और राजनीतिक प्रभुसत्ता दोनों को प्रयोग इसाई मिशनरियां कर रही थी। भारतीयों को मतांतरण हेतु मानसिक स्तर पर तैयार करने के लिए साहित्य वितरण जैसे पारंपरिक तरीकों के साथ सिनेमा जैसी नवीनतम माध्यमों का भी प्रयोग किया जा रहा था। इस कड़ी में वर्ष 1910 में भारत के विभिन्न हिस्सों में यीशु मसीह के जीवन पर आधारित एक फिल्म ‘ द लाइफ आॅफ क्राइस्ट’ दिखायी गयी। इसी फिल्म ने 39 वर्षीय दादा साहब फाल्के को समानांतर भारतीय सिनेमा को स्थापित करने की प्रेरणा दी। विदेशी भाव और भाषा में निर्मित इस फिल्म को दखने के बाद दादा साहब फाल्के ने यह महसूस किया कि ईसाई मिशनरियां सिनेमाई प्रभाव का उपयोग भारतीय संस्कृति के उच्छेदन के लिए कर रहीं है। उन्हें यह तथ्य समझने में भी समय नहीं लगा कि सिनेमा मनोरंजन तक सीमित नहीं है। इसमें सांस्कृतिक संरक्षण अथवा सांस्कृतिक उच्छेदन की असीम संभावनाए भी निहित हैं। उनकी दूरदृष्टि ने दीवार पर लिखी उस इबारत को भी पढ़ लिया था कि सिनेमा को भारतीय भाषा, भाव और भूमि से जोड़कर सांस्कृतिक नवचैतन्य के लिए संभावनाएं सृजित की जा सकती हैं।

उन्होंने अपनी पहली फिल्म के लिए जिस कथावस्तु का चयन किया और उसके निर्माण के लिए जिस तरह से संघर्ष किया, उससे भी यह स्पष्ट होता है कि उनके लिए सिनेमा सांस्कृतिक संरक्षण का उपकरण था। उन्होंने किसी ऐसे भारतीय आदर्श पुरुष पर फिल्म बनाने की ठानी, जिसका भारतीय लोकमानस पर गहरा प्रभाव हो। इसके लिए उन्होंने भारतीय समाज और संस्कृति का लम्बे अरसे तक अध्ययन और अवलोकन किया। अंततः किसी आदर्श भारतीय पात्र की उनकी खोज महाराज हरिश्चंद्र पर समाप्त हुई। महाराज हरिश्चंद्र के चरित्र में निहित उदात्त नैतिक मूल्यों की स्मृति अब भी भारतीय लोकमानस में बनी हुई थी। कई नाटक कम्पनियां हरिश्चंद्र नाटक का मंचन करती थी और एक आम भारतीय में इस नाटक को जबरदस्त उत्सुकता भी थी। महात्मा गांधी ने इस बात को स्वीकार किया है ‘राजा हरिश्चंद्र’ नाटक ने उनके जीवन का बहुत प्रभावित किया है। यह स्वीकृति इस बात को साबित करती है कि सम्पूर्ण भारत में राजा हरिश्चंद्र नाटक अत्यंत लोकप्रिय था। दादासाहब फाल्के द्वारा राजा हरिश्चंद्र पर फिल्म निर्माण का निर्णय उनकी भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक संरचना की बेहतरीन समझ का संकेतक है। दरसअसल, रजतपटल को भारतीय स्मृतिपटल से जोडने की ललक ने ही दादासाहब फाल्के को महाराज हरिश्चंद्र पर फिल्म निर्माण करने के लिए प्रेरित किया ।

फिल्म निर्माण की बारीकियों को समझने के लिए 1 फरवरी 1912 को उन्होंने लंदन के लिए प्रस्थान किया। लंदन जाने के लिए उन्होंने अपनी बीमा पाॅलिसी और पत्नी के गहनों को गिरवी रखकर पैसे जुटाए थे। जाहिर है यह संघर्ष व्यवसायिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण के लिए था। व्यवसायिक इसलिए नहीं क्योंकि उस समय भारत जैसे देश में सिनेमा के जरिए व्यवसायिक हित साधना संभव नहीं था। फिल्म बनाना एक दुष्कर कार्य था और सिनेमा देखना एक अधम कार्य। सिनेमा को उस समय इतनी हीन दृष्टि से देखा जाता था कि दादा साहब फाल्के को राजा हरिश्चंद्र के महिला चरित्रों के लिए पुरुष कलाकारों का चयन करना पड़ा था। क्योंकि उस समय आम भद्र महिला तो दूर वेश्याएं भी सिनेमा में भूमिका निभाने के लिए तैयार नहीं थीं। तत्कालीन समाज में फिल्म के शौकीनों को भी तौहीन की नजर से देखा जाता था। फिल्म देखने के शौकीन लोगों को ‘ चवन्नी छाप ’ आदम कहकर बुलाया जाता था क्योंकि उस समय मुम्बई के नावेल्टी होटल में देशी दर्शकों के लिए टिकट का मूल्य चार आने निर्धारित किया गया था। ऐसे माहौल में फिल्म निर्माण के लिए पहल कोई सांस्कृतिक व्यक्ति ही कर सकता है , व्यवसायिक व्यक्ति नहीं।

दादा साहब फाल्के द्वारा ‘राजा हरिश्चंद्र’ के रुप में रोपा गया भारतीय सिनेमा का वह नन्हा पौधा आज एक विशाल वट वृक्ष बन गया है। एक आंकडे़ के मुताबिक भारत में 1.3 करोड़ लोग प्रतिदिन वाॅलीवुड की फीचर फिल्मों को विभिन्न माध्यमों के जरिए देखते हैं। वाॅलीवुड में औसतन 1000 फिल्में सालाना बनती हैं। जबकि हाॅलीवुड में यह आंकड़ा 600 फिल्मों तक सीमित है। इस वटवृक्ष से तमिल, तेलगु, बंगाली, भोजपुरी फिल्मों की नई जडे़ं निकल आयी हैं। बाहर से देखने पर यह वृक्ष लहलहा रहा है। प्रभाव में वृद्वि हुई है। हमारे सुख, दुख, स्वप्न, शैली और शब्द सब फिल्मों की स्क्रिप्ट और धुनों के जरिए अभिव्यक्त हो रहे हैं। लेकिन क्या प्रभाववृद्वि और व्यवसायिक सफलता रजतपटल के मूल्यांकन के एकमेव आधार बन सकते हैं। भारतीय संदर्भों में ऐसा नहीं कहा जा सकता क्योंकि दादा साहब फाल्के ने यह पर रजतपटल के शुरुआत सामाजिक सांस्कृतिक संरक्षण और सामूहिक स्मृतिपटल के पोषण के लिए की थी।

आज की स्थिति बिल्कुल उलटी है। रजतपटल भारतीय स्मृतिपटल को पोषित करने के बजाय उसकी जडों में मट्ठा डाल रहा हैं ,उसको खरोंचकर लहूलुहान कर रहा है। आज भारतीय रजतपटल के पास पैसा और तकनीकी दोनों हैं लेकिन भारतीयता को पोषित करने वाली दृष्टि नहीं है। उसकी अंतर्वस्तु या तो बाजारु-भारतीय है अथवा विदेशी। भारतीय समाज और सांस्कृतिक वैशिष्ट्य की पहचान और अभिव्यक्ति का कोई भी प्रयास रजतपटल के चमकीले लोग नहीं कर रहे है। अभिव्यक्ति की बात तो दूर भारतीय मूल्यों को उपहास की विषयवस्तु के रुप में प्रस्तुत किया जा रहा है। चाणक्य जैसे धारावाहिक के निर्माता और रजतपटल की दुनिया भारतीयता को अभिव्यक्ति देने में सक्रिय कुछ गिने चुने लोगों में से एक डाॅ0चंद्रप्रकाश द्विवेदी आज की स्थितियों का सटीक आकलन करते हुए कहते हैं कि –

‘‘भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहब फाल्के के पास उस समय कई विषय रहे होंगे,लेकिन उन्होेंने अपनी फिल्म की कथा अतीत से चुनी। मतलब यह नहीं कि वे अतीतजीवी थे। उन्हें भारत के सामने एक आदर्श रखना था।उनका उद्देश्य था इस असाधारण उपकरण सिनेमा का इस्तेमाल हम समाज के लिए करें। आजादी और उससे पहले जो फिल्में हमारे यहां बनी उसमें भारत की जडें थी।भारतीय आत्मा थी।भारत के सवाल थे। उन सवालों के उत्तर देने की कोशिशें भी उनमें थी।पांचवें छठें दशक का सिनेमा भारतीय तत्वों से भरा था। परन्तु जैसे-जैसे सिनेमा का विकास होता गया , बाजार का दबाव बढता गया। हमारी कहानियां भारत से दूर होती गयीं। अब स्थिति ऐसी हो गयी है कि भारत के पात्र होत हैं और पीछे विदेशी भीड घूम रही होती है। हमारी गलियां भी अमृतसर , राजस्थान , यूपी और बिहार की नहीं रह गयीं, बल्कि अब हम गलियां भी न्यूयार्क , लंदन , शंघाई, स्पेन और कनाडा जैसे देशों की ढूंढ रहे हैं। ’’ (झंकार ,दैनिक जागरण , 5 फरवरी 2012 , पृष्ठ 4)

वर्तमान भारतीय रजतपटल में भारत और भारतीयता दोनों एकसिरे से गायब हैं। आज के रजतपटल में गोवध की समस्या नहीं है, मैली होती गंगा नहीं है, किसान आत्महत्या नहीं है, 90 करोड़ निर्धन नहीं हैं, बिजली से महरुम और ढिबरी से टिमटिमाते 10 करोड़ घर नहीं हंै, गांव की पगडंडिया नहीं हैं, हाथरस, भदोही, मुरादाबाद के हस्तशिल्पियों की दारुण दशा नहीं है। भारतीय स्मृतिपटल में रची बसी छवियां नहीं हैं, मुहावरे नहीं है। वह तो राजपथ, फ्लाईओवर, शाॅपिंगमाल्स से जगमगा रहा है। विदेशों में पिकनिक मना रहा है, बास्टर्ड कहने में इतरा रहा है और च्यूतिया कहने में लजा रहा है। उद्योगपतियों के कौशल को मसाला लगाकर दिखा रहा है। डाॅ चंद्रप्रकाश द्विवेदी इस संदर्भ में कहते हैं कि –
‘‘ पिछले 63 सालों में भारत के विभाजन पर कितनी फिल्में बनी? उंगलियों पर गिन सकते हैं 1984 के दंगों पर कितनी फिल्में हैं? कश्मीर का सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा हमारी फिल्मों का विषय नहीं हैं। आतंकवाद और नक्सलवाद को लेकर, भ्रष्टाचार को लेकर, आरक्षण को लेकर, रामजन्म भूमि विवाद को लेकर फिल्में नहीं बनी हैं। इतने सारे विषय देश में मौजूद हैं, परंतु हमारे फिल्मकारों को उनसे कोई सरोकार नहीं है।’’ (झंकार ,दैनिक जागरण , 5 फरवरी 2012 , पृष्ठ 4)

सर्वाधिक पीड़ादायी दृश्य यह है कि कई पीढि़यों से लोकस्मृति में घर कर चुकी छवियां और शब्द में रजतपटल पर जगह नहीं पा रहे हैं। 60 और 70 के दशक में फिल्मों के आधिकांश गाने लोकधुनों पर आधारित होते है। आज भी लोग उन्हें बडे आत्मीय भाव से गुनगुनाते हैं। नैन लडी जईहैं तो मनवा में खटक होईबै करी, चलत मुसाफिर मोह लियो रे पिजडे वाली मुनिया ,दुख भरे दिन बीते रे भइया सुख भरे दिन आयो रे, जैसी लोकधुने अब रजतपटल से लुप्तप्राय हो गयी हैं। भारतीय नाटको की परंपरा सुखांत रही है, अच्छाई के पथ पर चलने वाले नायक की विजय सुनिश्चित होती है। लेकिन अब रजतपटल पर पश्चिमी दुखांत परंपरा हावी हो रही है। अच्छाई और बुराई की रेखाएं मिट रही हैं।

सोनचिरैया संस्था की संस्थापक और प्रख्यात लोकगायिक मालिनी अवस्थी रजतपटल पर लोकधुनों के गायब होने से काफी आहत हैं। वह रजतपटल में लोक के लिए सिमटते स्थान पर चिंता जाहिर करते हुए कहती हैं कि -‘‘स्थिति यह है कि सिर्फ गायन में ही नहीं लोक के सभी अंग -उपांग में क्षति है।लोक कलाकार के अस्तित्व से सीधे जुडा हुआ है लोक कलाओं का अस्तित्व।नक्कारा ,ताशा ,मृदंग ,झांझ,सींगी ,करताल और हुडुक जैसे वाद्य तभी तक सुरक्षित है ,जब तक कि इनके कलाकार । इन कलाओं को बचाना है तो इन लोक कलाओं को बढावा देना होगा । नई पीढी को इस अनमोल थाती से जोडना है तो लोककलाओं को अब स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा । यदि अपनी संस्कृति और अपने निजत्व की पहचान बनाए रखनी है तो समाज को हर हाल में नई पीढ़ी को लोक-साक्षर बनाना ही होगा।

निश्चय ही, वर्ण साक्षरण और ई साक्षरता से कम जरुरी नहीं है लोक साक्षरता। लोकसाक्षरता एक व्यापक शब्द है। इसका सम्बंध केवल गायन वादन से नहीं है। यह उस परंपरा से परिचय है जो भारतीय व्यक्तित्व को वैशिष्ट्य प्रदान करती है। इस परंपरा का उल्लेख किसी शास्त्रीय पोथी में नहीं है। इस परंपरा के प्राण भारतीयों के सामूहिक स्मृतिपटल में बसता है। इसी स्मृति पटल की बदौलत लाखों शब्द और छवियां समय के अवरोधों को पार करते हुए निरंतर एक पीढी से दूसरी पीढी में प्रवाहित हो रही हैं। स्मृतिपटल का चुकना भारतीयों की सबसे बडी सांस्कृतिक पराजय होगी। सामूहिक स्मृति पटल को बचाने के लिए लोकसाक्षरता आवश्यक है। यही सैकडों सालों की पराधीनता के कारण भारतीय भावभूमि पर जड जमा चुकी आत्महीनता की ग्रंथि को उखाड सकती है।

स्मृतिपटल और रजतपटल के बीच स्वस्थ संवाद स्थापित कर लोकसाक्षरता को बढाया जा सकता है , यह सवंाद स्मृतिपटल के संरक्षण के लिए भी आवश्यक है। इसके लिए रजतपटल पर सांस्कृतिक समझ वाले लोगों की सक्रियता बढनी आवश्यक है। भारत में व्यवस्था परिवर्तन के आकांक्षी व्यक्तियों को भी रजतपटल को हल्के में लेने और उससे दूर रहने की प्रवृत्ति परिवर्तित करने होगी। जो रजतपटल प्रतिदिन 1.3 करोड भारतीयों तक पहुंचता है ,उन्हें हंसाने -रुलाने की क्षमता रखता है,युवावर्ग जिससे सर्वाधिक प्रभावित होता हो ,उसको नजरंदाज कर व्यवस्था परिवर्तन की रुपरेखा कैसे तय की जा सकती है? क्या श्री रामजन्म भूमि आंदोलन की सफलता में श्री रामानंद सागर कृत रामायण के योगदान को एकदम से नकारा जा सकता है। रजतपटल पर सांस्कृतिक व्यक्तियों की सक्रियता समय की मांग है। सांस्कृतिक व्यक्तियों की सक्रियता रजतपटल पर स्मृतिपटल का प्रभाव और दबाव सृजित करेगी। यह प्रभाव और दबाव सांस्कृतिक सम्पन्नता और निरंतरता के लिए आवश्यक है।

भारतीय स्मृतिपटल को लहुलूहान करने में मात्र रजतपटल की अंतर्वस्तु और तकनीकी ही जिम्मेदार नहीं है। रजतपटल से सम्बंधित सूचना-प्रवाह भी भारतीय स्मृतिपटल की जडें खोद रही है। व्यवसायिक सिनेमा के अतिरिक्त बहुत कुछ सर्जनात्मक भी रजतपटल की दुनिया हो रहा है। लेकिन फिल्म की दुनिया में उसकी कोई रिपोर्टिंग नहीं होती। बिग बाॅस को लेकर तो प्रिंट और मीडिया ने आसमान अपने सिर पर उठा लिया था लेकिन लगभग एक दशक के शोध के बाद मार्च से प्रसारित होने वाले डाॅ चंद्रप्रकाश द्विवेद्वी के धारावाहिक उपनिषद गंगा की चर्चा सूचना-संसार और फिल्म,धारावाहिक समीक्षा के काॅलम का हिस्सा नहीं बन सका । डाक्यूमेंट्री की समीक्षा अब भी रजतपटल पत्रकारिता का हिस्सा नहीं बन सकी है, जबकि यह फिल्मों की अपेक्षा भारतीय भावभूमि और समस्याओं से अधिक जुडी है। रजतपटल की पत्रकारिता को साहित्य समीक्षा जैसा गांभीर्य देकर रजतपटल के भारतीयकरण की दिशा में प्रारम्भिक कदम बढाया जा सकता है।

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