राजधर्म
राजधर्म का आधार है विजिगीषु-वृत्ति
जो सहज उपलब्ध है, उसमें विस्तार की सतत इच्छा ही विजिगीषु वृत्ति है। यह वृत्ति भारतीय राजनीतिक चिंतन का केंद्रीय तत्व रही है। राजनीतिक दर्शन हो, प्रक्रिया हो अथवा नीतियां, सभी इस वृत्ति के चहुंओर चक्कर लगाती हैं। यदि किसी राजा अथवा राज्य में विजिगीषु वृत्ति नहीं है,विस्तार की इच्छा नहीं है, तो उसकी योग्यता को शून्य और उसकी अवनति को स्वाभाविक मान लिया जाता था। ऐसे राजा अथवा राज्य, राजनीतिक ङ्क्षचतन की परिधि से बाहर थे। संभवतः इसी कारण विजिगीषु वृत्ति से विहीन हो चुके राजाओं के उबारने वाली किसी नीति का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता और न ही उनके कर्तव्यों के बारे में कोई संकेत मिलते हैं।
बहुत स्पष्ट है कि राजकर्म से संबंधित किसी व्यक्ति में विजिगीषु वृत्ति का न होना अयोग्यता का परिचायक मात्र नहीं बल्कि यह अधार्मिक होने जैसा था। यह इतनी अधम स्थिति मानी जाती थी कि उसके बारे में कर्तव्य-अकर्तव्य की स्थिति का विचार ही नहीं किया गया।
ऐसा प्रतीत होता है कि परंपरागत राजनीतिक चिंतन में विजिगीषु वृत्ति राजनीति की पूर्व शर्त तथा मूलभूत विशेषता थी। नीति, कार्यक्रम, विचार और कत्र्तव्य का पूरा राजमहल इसी वृत्ति पर खड़ा होता है। शांतिपर्व में राजनीति की महत्ता की बात हो अथवा चाणक्य द्वारा प्रतिपादित मंडल सिद्वांत, शुक्राचार्य जैसे आदि आचार्यों द्वारा प्रतिपादित षड्गुण नीति हो अथवा विभिन्न राजर्षियों द्वारा आदर्श राजा की आदर्श दिनचर्या का प्रतिपादन, सबके आधार में विजिगीषु वृत्ति ही कार्य कर रही है।
इसे न केवल भारतीय राजनीतिक चिंतन, बल्कि भारतीय भूमि और संस्कृति का भी दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि इस वृत्ति को बाद में न केवल उपेक्षणीय बना दिया गया बल्कि हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। आज भी कुछ लोग सीना ठोंककर यह बताते हैं कि देखो जी! हम लोग कितने उदात्त थे, आक्रांता आते रहे,जुल्म ढाते रहे, मूल्य ढहते रहे लेकिन हम सहिष्णु बने रहे। हमने कभी हिंसा को नहीं अपनाया।
ऐसे कथन न केवल भ्रामक समझ पर आधारित है बल्कि यह विजिगीषु वृत्ति को अपना प्राणतत्व मानने वाली महान चिंतन परंपरा का अपमान भी है। हां, यहां पर यह बात समझने योग्य है कि भारत में विजय की एक उदात्त और विशिष्ट परंपरा रही है, इसलिए अपने विस्तार तथा मूल्यों की स्थापना के लिए होने वाले युद्ध का प्रभाव सैनिकों और राजाओं तक ही सीमित होता था। आम आदमी ऐसे युद्धों से अछूता रहता था। इसके साथ ही इस परंपरा में विजय को कुछ आदर्श मूल्यों को बचाने और स्थापित करने की प्रक्रिया के साथ भी जोड़ा गया।
विजय की इस विशिष्ट भारतीय परंपरा को ’उत्खात प्रतिरोपण्य कहा जाता था। जैसे कुछ पौधों को उखाड़कर, उसे फिर से उसी जमीन पर रोप दिया जाता है। इस प्रक्रिया में पौधे की मृत्यु नहीं होती बल्कि वह एक खर-पतवार से विकसित होकर वृक्ष बन जाता है। ठीक इसी प्रकार भारतीय विजेता, पराजित राजा का उच्छेदन नहीं करते थे बल्कि पराजय और कुछ शर्तों को स्वीकार कर लेने के बाद उन्हें उनका राज्य वापस लौटा दिया जाता था और फिर से राजपद पर अभिषिक्त कर दिया जाता था। इस तरह विजेता के प्रभाव में वृद्धि भी होती थी और ढींठ शासकों को सीमा में रहने का सबक भी मिल जाता था। पराजित के अस्तित्व को तभी समाप्त किया जाता, जब वह पराजित होने के बाद भी युद्ध का आकांक्षी बना रहता था।
भूमिकाओं के विस्तार और सीमित होने की इस प्रक्रिया से आमजनता इससे अछूती ही रहती और उसके क्रियाकलापों पर इस तरह की जय-पराजय का खासा असर नहीं पड़ता। सिकंदर के सैनिकों ने अपने विजय अभियान में जब निहत्थे किसानों तक मौत के घाट उतार दिया था तो यह भारतीयों के लिए एक नई घटना थी और इसके कारण भारतीय जनमानस उस बहुत उद्वेलित भी हुआ।
’उत्खात प्रतिरोपण्य की प्रकिया में विजय और विजिगीषु वृत्ति के कई रहस्य छिपे हुए हैं। इसमें विस्तार की इच्छा है, मूल्यों को स्थापित करने की प्रेरणा है, लेकिन यह प्रक्रिया विस्तार और विजय को नरभक्षी बनाने से रोकती है और स्थानीय तत्वों के महत्व को राजनीतिक प्रक्रिया में रेखांकित करती है।
विजिगीषु वृत्ति बहुत नैसर्गिक प्रवृत्ति है। यह हेनरी किसिंजर जैसे आधुनिककूटनयिकों की इस बात से साम्यता और सहमति रखती है कि पूर्ण शांति इस दुनिया की स्वाभाविक अवस्था नहीं है। पराधीन करना और विजेता बनना बहुत ही स्वाभाविक इच्छाएं है और इनका पूर्ण निषेध नहीं हो सकता। यदि इनका निषेध किया जाता है और अपने विस्तार में विश्वास नहीं किया जाता तो दूसरों के विस्तार का शिकार बनना तय है। दूसरी तरफ यह भी एक स्थापित तथ्य है कि यदि विजेता बनने की इच्छा को बेलगाम छोड़ दिया जाए तो यह रक्तपात और अन्याय का सबसे बड़ा कारण बनती है। यह वृत्ति, न तो व्यक्तित्व को उदात्त बनने देती है और न ही संपूर्ण।
ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि विजिगीषु वृत्ति के साथ उदात्त मूल्यों को संबंधित किया जाए और दोनों में संतुलन स्थापित किया जाए। भारत में विजिगीषु वृत्ति और उदात्त मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करने वाले सूत्रों को न केवल खोजा गया बल्कि व्यावहारिक धरातल पर इन सूत्रों के जरिए लंबे समय तक संतुलन साधा भी गया। इसके कारण एक तरफ राजनीति को समाज में उच्च प्रतिष्ठा और स्थान मिला, वहीं दूसरी तरफ राजनीति देश की संस्कृति और भूमि को संरक्षित और संवद्र्धित भी करती रही। लेकिन बाद में इसी भूमि पर पैदा होने वाले विभिन्न संप्रदायों के कारण, जिनका जोर शांति,अहिंसा और स्वीकार्यता पर अधिक था, यह संतुलन टूटा। विजिगीषु वृत्ति के जरिए अपने योगक्षेम की प्रक्रिया का गैर-आध्यात्मिक और घोर सांसारिक कृत्यों की श्रेणी में रख दिया गया, जो कि प्राथमिकताओं की उपेक्षित और हेय श्रेणी थी।
विजिगीषु वृत्ति को नेपथ्य में धकेले जाने की प्रक्रिया के कारण एक भूगोल और एक भाव के रूप में भारत को बहुत नुकसान उठाना पड़ा। इस वृत्ति से युक्त व्यक्ति और समाज अपने अगल-बगल होने वाली घटनाओं के प्रति सजग रहता है और अपने ऊपर पढऩे वाले प्रभावों-दुष्प्रभावों का आकलन कर प्रोएक्टिव कदम उठाता है। इसके कारण संभावित खतरों को दरवाजे पर पहुंचने से पहले ही समाप्त कर देता है। यदि खतरा अधिक प्रबल होने की स्थिति में दरवाजे तक पहुंच ही जाता है तो भी विजिगीषु वृत्ति से लैस व्यक्ति के पास संभावित खतरे की पूर्व जानकारी होने के कारण इतना समय होता है कि वह उचित रणनीति बनाकर खतरे को जमींदोज कर सके।
विजिगीषु वृत्ति से विहीन व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र अगल-बगल हो रही घटनाओं के प्रति निहायत ही लापरवाह हो जाता है और अपने ’कंफर्ट जोन में ही सिमटा रहता है। ऐसी स्थिति में खतरा, जो बहुत पहले ही जन्म ले चुका होता है, उसके सामने यकायक प्रकट होता है। इस खतरे से निपटने के उसके पास आजमाने को बहुत सीमित और अनियोजित विकल्प रहते हैं। या तो वह खतरे को सांसारिक घोषित कर भाग जाता है अथवा उद्वेग में आकर लड़ाई करता है, जिसमें उसका पराजित होना तय होता है।
भारत के सामूहिक अवचेतन मन से विजिगीषु वृत्ति की खुरच-खुरचकर मिटा दिया गया। इसका नाम लेना भी कुफ्र घोषित कर दिया गया। इसके कारण हम आक्रांत होते रहे। इस्लाम की मूल मान्यताओं के बारे में आज भी अनभिज्ञ है, ईसाइयत के विश्व दृष्टि क्या है, इसके बारे में हम ठीक ढंग से नहीं जानते और सभी धर्म एक समान हैं, इसकी रट लगाए रहते हैं। ऐसा नहीं है कि यह पूर्व में की गई गलतियां हैं। यह चलन आज भी बना हुआ है। हम आज भी बिना तुलनात्मक और विशख्रेषणात्मक अध्ययन के यह मान लेते हैं कि जैसा हम मानते हैं, वैसे ही दूसरे हैं। जब वह दूसरे हमारी मान्यता के विपरीत अपने रूप में हमारे सामने आते हैं तो हम छाती पीटने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं कर पाते।
आज भी आईएसआईएस की ’खिलाफत की प्रेरणा अथवा ’गजवा-ए-हिंद की संकल्पना के बारे में भारतीयों में बौद्धिक अथवा रणनीतिक स्तर पर कोई उद्वेलन देखने को नहीं मिलता तो इसका कारण यही है कि हममें विजिगीषु वृत्ति का पूर्ण अभाव है। स्वविस्तार और स्वसंरक्षण की भावना रहने पर पैदा हो रहे प्रत्येक खतरे को आकलन एक स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में किया जाता है।
इस वृत्ति के अभाव में हम खुद कुछ सुविधाजनक निष्कर्ष निकाल लेते हैं और उसी की पट्टी अपने आंखों पर बांध लेते हैं। परिवेश के प्रति सजगता, विजिगीषु वृत्ति की सबसे बड़ी देन है। यही सजगता न केवल हमारे सामर्थ्य को बनाए रखती है, बल्कि सामर्थ्य को बढ़ाती भी है। इसलिए राष्ट्र के परंवैभव की कामना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति का यह प्राथमिक कत्र्तव्य है कि वह राष्ट्र के सामूहिक अवचेतन में विजिगीषु वृत्ति को प्रतिष्ठित करने का यत्न करे। यह वृत्ति अन्य आवश्यक उपायों और वृत्तियों को स्वयं पैदा कर लेगी।
राजधर्म
महाराजा हरि सिंह की कहानी अनिर्णय की नहीं, सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण निर्णय लेने की है
अधिमिलन प्रक्रिया की आधी-अधूरी जानकारी के कारण महाराज हरि सिंह के बारे में अनेक भ्रांतियां स्थापित कर दी गईं। उनमें में प्रमुख यह है कि वह संवैधानिक अधिमिलन को लेकर अनिर्णय का शिकार हो गए थे और यह भी कि उनके मन में जम्मू-कश्मीर को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की लालसा था। स्वतंत्रता मिलने के 2 महीने 12 के दिन के भीतर उन्होंने क्षेत्रफल की दृष्टि से उस समय के सबसे बड़ी रियासत का संवैधानिक अधिमिलन भारत में कर दिया था। उनके इस विलम्ब को ऐसे प्रस्तुत किया जाता है जैसे जम्मू-कश्मीर ने अधिमिलन की प्रक्रिया में सबसे अंत में हस्ताक्षर किए हों, जबकि सम्पूर्ण अधिमिलन प्रक्रिया के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है यथार्थ इसके बिलकुल उलट है।
अधिमिलन प्रक्रिया का ठीक ढंग से अध्ययन से यह स्पष्ट होता है जम्मू-कश्मीर के अधिमिलन के बहुत बाद तक अधिमिलन प्रक्रिया जारी रही। उदाहरण के लिए बनारस रियासत का संवैधानिक अधिमिलन 15 अक्टूबर 1948 को सम्पन्न हुआ था। स्वतंत्रता मिलने के पूरे 1 वर्ष 2 महीने और 1 दिन बाद। इसी तरह, हिमाचल प्रदेश की बिलासपुर रियासत का अधिमिलन 12 अक्टूबर 1948 को सम्पन्न हुआ। इन उदाहरणों से पता चलता है कि अधिमिलन-प्रक्रिया कई कारणों से लम्बीं खींच रही थी।
विभाजन से उपजी नई परिस्थितियों के कारण देशी रियासतों के शासक नए राजनीतिक यथार्थ को समझने के लिए समय ले रहे थे। सीमावर्ती राज्य होने के कारण महाराजा हरिसिंह के समक्ष चुनौतियां अधिक थी, फिर भी उन्होंने बहुत जल्दी अपने दौर का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए जम्मू-कश्मीर राज्य का संवैधानिक अधिमिलन भारत में कर दिया था।
यहां पर यह स्मरण रखना चाहिए कि महाराजा हरिसिंह ने संवैधानिक अधिमिलन का निर्णय वाह्य दबावों, आंतरिक अवरोधों और अराजकता की चरम-स्थिति के बीच लिया था। आंतरिक स्तर पर पर महाराजा हरिसिंह को अधिमिलन को लेकर अनेक अवरोधों को सामना करना पड़ रहा था। महाराजा हरिसिंह ने जुलाई 1947 में संवैधानिक अधिमिलन को लेकर अपना मन बना लिया था और उचित माध्यमों से इसे अभिव्यक्त भी कर दिया था, लेकिन उस समय के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व द्वारा उन्हें संकेत दिए जा रहे थे कि महाराजा अपनी शक्तियां शेख अब्दुल्ला को सौंप दें और शेख अब्दुल्ला ही अधिमिलन के बारे में निर्णय लें। इस आग्रह के पीछे कोई तर्क नहीं था क्योंकि विधिक रूप से यह स्पष्ट था कि अधिमिलन पत्र पर रियासत का शासक ही हस्ताक्षर कर सकता है। महाराजा हरिसिंह किसी भी कीमत पर शेख अब्दुल्ला को अपनी शक्तियां नहीं देना चाहते थे क्योंकि वह उनकी भारत विरोधी मानसिकता को लेकर स्पष्ट थे।
बाद में यह सच साबित हुआ कि शेख अब्दुल्ला के बारे में महाराजा हरिसिंह का आकलन सही था। 8 अगस्त 1953 को शेख अब्दुल्ला को सदर-ए-रियासत के पद से बर्खास्त करने बात हो अथवा शेख अब्दुल्ला और मिर्जा अफजल बेग सहित अन्य 22 के खिलाफ कश्मीर कांस्पिरेसी केस के अंतर्गत मुकदमा चलाने के बात हो, से स्पष्ट होता है कि महाराजा हरिसिंह नहीं बल्कि शेख अब्दुल्ला के मन में जम्मू-कश्मीर को अगल राष्ट्र बनाने की लालसा कार्य कर रही थी। यह गौरतलब है कि 1958 से प्रारंभ हुए कश्मीर कांस्पिरेसी केस में भी शेख अब्दुल्ला के ऊपर जम्मू-कश्मीर को स्वतंत्र देश बनाने के आरोप ही लगाए गए थे। इसमें भी उल्लेखनीय बात यह है कि शेख अब्दुल्ला को सदर-ए-रियासत पद से बर्खास्त करने और देश के खिलाफ षड्यंत्र रचने का मामला दर्ज करने का निर्णय पंडित जवाहर लाल नेहरू के शासनकाल में ही लिया गया, जो एक समय महाराजा हरिसिंह के बजाय शेख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर की जनता का वास्तविक प्रतिनिधि मानते थे।
महाराजा हरिसिंह की ऐसी मान्यता थी कि शेख अब्दुल्ला मुस्लिम कट्टरता को नए तौर-तरीकों से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। महाराजा के सामने इसको लेकर कई सार्वजनिक उदाहरण थे। सबसे बड़ा सार्वजनिक उदाहरण तब सामने आया था जब 1939 में पंथनिरपेक्ष छवि हासिल करने के लिए शेख-अब्दुल्ला ने 1932 में स्थापित अपने संगठन का नाम जम्मू-कश्मीर मुस्लिम कान्फ्रेंस से बदलकर नेशलन कान्फ्रेंस कर दिया था।, लेकिन कार्यशैली और एजेंडा पुराने ही बने रहे।
आंतरिक अवरोधों के साथ लॉर्ड माउंटबेटन विविध तरीकों से पाकिस्तान में सम्मिलित होने के लिए महाराजा हरिसिंह को संकेत दे रहे थे। जम्मू-कश्मीर की महत्वपूर्ण भूराजनीतिक स्थिति ने भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जम्मू-कश्मीर के अधिमिलन के प्रश्न को महत्वपूर्ण बना दिया था। द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद बनी द्विध्रुवीय व्यवस्था में एक खेमा यह नहीं चाहती था कि भारत की सीमा कहीं भी मध्य-एशिया से जुडे़, उन्हें डर था कि सीमा से जुड़ाव की स्थिति में सोवियत संघ इसका लाभ उठा सकता है। तत्कालीन जम्मू-कश्मीर रियासत की सीमाएं पश्चिम एशिया से जुड़ती थीं, इसलिए महाराजा हरिसिंह को लॉर्ड माउंटबेटन की तरफ से लगातार यह संकेत दिए जा रहे थे कि वह अधिमिलन को लेकर जल्दबाजी न करें। माउंटेबेटेन ने 24 जून 1947 को पंडित जवाहरलाल नेहरू को यह बताया था कि उन्होंने महाराजा हरिसिंह से कहा है कि जब तक पाकिस्तान की संविधान सभी नहीं बन जाती, तब तक अधिमिलन को लेकर वह जल्दबाजी न करें। माउंटबेटन की तरफ से महाराजा हरिसिंह यह भी संकेत दिया गया था कि पाकिस्तान में सम्मिलित होने के उनके निर्णय को नवनिर्मित स्टेट डिपार्टमेंट इससे अमित्रतापूर्ण कृत्य के रूप में नहीं देखेगा।
ऐसे अवरोधों के बीच भी महाराजा हरि सिंह ने भारत में संवैधानिक अधिमिलन का निर्णय लिया था। 26 अक्टूबर 1947 को अधिमिलन पत्र किए गए उनके हस्ताक्षर को अनिर्णय की बजाय स्वतंत्रता के बाद किसी भी व्यक्ति द्वारा लिए पहले सबसे चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण निर्णय के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। उनका हस्ताक्षर सार्वजनिक बाधाओं और व्यक्तिगत दुराग्रहों पर देशहित को प्राथमिकता देने वाले निर्णयों का प्रभावी प्रतीक चिन्ह है।
राजधर्म
लोदी मीडिया की ढहती सल्तनत
पैगम्बरवादी पंथ मूर्तिभंग को मानभंग का प्रमुख औजार मानते हैं और ज्ञान का अन्यधाराओं से उनकी शत्रुता उन्हें शब्दबैरी.शास्त्रबैरी बना देती है। इसलिए प्रभाव.विस्तार के लिए यदि गाजियों और क्रूसेडर्स के निशाने पर सबसे पहले धर्मस्थान और धर्मशास्त्र आते रहे हैं तो यह अनायास नहीं है। इसके स्पष्ट राजनीतिक.मनोवैज्ञानिक आयाम हैं। मनोवैज्ञानिक स्तर पर आइकनौक्लाज्म ;मूर्तिभंगद्ध और ष्बुक बर्निंग ;शास्त्र को जलानाद्धष् सभ्यताओं के संहार की प्रक्रिया है। अंग.भंग से व्यक्ति आहत होता है लेकिन इन सेमेटिक परम्पराओं से पूरी सभ्यता आहत होती है।
शब्द और मूर्ति सामूहिक स्मृति को गढ़ती है। शब्द के माध्यम से परम्पराएं आगे बंढ़ती है और इस तरह शब्द सभ्यता के संरक्षक बन जाते हैं । दूसरी तरफ हजारों सालों का चिंतन मूर्तियों के रुप में आकार लेता है और इन मूर्तियों से संस्कृति को गढ़नेवाली अनेकों परम्पराएं जन्म लेती हैं। मूर्ति चिंतन और परम्परा का निकर्ष होती है। मूर्तिभंग और शास्त्रोच्छेद के साथ चिंतन और परम्परा दोनों अवरुद्ध हो जाती है। ऐसे में सामूहिक स्मृतियों का लोप होना प्रारंभ हो जाता है। यह एक स्थापित तथ्य है कि स्मृतिहीन समाज आसानी से दासता स्वीकार कर लेता है। इसलिए अपने सत्य को अंतिम सत्य घोषित करने वाली सभ्यताओं ने यदि बड़े पैमाने पर पूरी दुनिया में मूर्तियाें को तोड़ा और किताबों का जलाया तो उनका मंतव्य किसी भी प्रकार अपनी श्रेष्ठता को स्थापित करना था।
भारतीय संदर्भों में देखें तो मूर्तिभंग और शास्त्रबैर दोनों का ही दंश भारत को लगभग हजार साल तक झेलना पड़ा। सामूहिक स्मृति फिर भी बची रहीए तो इसका कारण भारत की श्रुति परम्परा है। मूर्तिंयां टूटींए शास्त्र जलाए गएए लेकिन कंठस्थ शब्दों और हृदयंगम भावनाओं का आक्रमणकारी क्या कर सकते थेघ् उन्हें तो वह देख ही नहीं सकते थे। इस्लामिक आक्रमण काल में जिन व्यक्तियों ने मूर्तिभंग और शास्त्रोच्छेद के परम्पराओं को जिहादी मानसिकता और क्रूर तरीके से आगे बढ़ायाए उसमें से एक का नाम सिकंदर लोदी है। इसलिए भारतीयता को हिंसक और क्रूर तरीके से मिटाने वाली मानसिकता को लोदी मानसिकता कहा जा सकता है।
भारतीय सभ्यता को स्मृतिहीन करने का महाअभियान अब भी विविध रूपों में चल रहा हैए जहां पर संभव है वहां पर मूर्तिभंग के जरिए और जहां पर नहीं है वहां पर मीडिया के जरिए क्योंकि शब्दों को पालने.पोषने अथवा उन्हें मारने का कार्य मुख्यतः मीडिया के जरिए ही हो रहा है। सेनाओं के बजाय अब मीडिया भारतीय सभ्यता को स्मृति बनाने के कार्य को अंजाम दे रहा है। भारतीय मीडिया का एक बड़ा वर्ग इसमें संलिप्त रहा है। मीडिया के इस वर्ग की करतूतें सिंकदर लोदी जैसी हैए इसीलिए मीडिया के इस वर्ग को लोदी मीडिया कहा जा सकता है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह लोदी मीडिया किस कदर पूर्वाग्रहों से संचालित होता रहा हैए इसका सबसे अच्छा आकलन पिछले 6 दशकों में चलाए गए प्रमुख आंदोलनों पर उसके दृष्टिकोण और कवरेज के आधार पर किया जा सकता है। इन 6 दशकों में देश के मानस को अभिव्यक्त करने वाली सभी प्रमुख आंदोलनों को या तो कवरेज ही नहीं मिलीए या फिर उसे सनकी.साम्प्रदायिक लोगों को आंदोलन बताने की कोशिश की गई। इसी कारण नई पीढ़ी स्वतंत्रता बाद के आंदोलनों से या अपरिचित है या फिर उनके प्रति नकारात्मक नजरिया रखती है।
स्वतंत्रता के बाद पहली बार जिस आंदोलन ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया थाए वह था 1966 में गोहत्या पर पाबंदी को लेकर साधु.संतों द्वारा चलाया गया आंदोलन। इस आंदोलन में सभी भारतीय सम्प्रदायों के संतों ने एकस्वर में गोहत्या पर पाबंदी और गोसंवर्द्धन के लिए ठोस कदम उठाने की सरकार से मांग की। गोरक्षा महाअभियान समिति के बैनर तले इस आंदोलन को आर्यसमाजएबौद्धए जैनए सिखए नाथए निरंकारी सम्प्रदायों का भी समर्थन प्राप्त था। ऐसी सांस्कृतिक एकता उसके बाद भारत ने अभी तक नहीं देखी। सरकार ने इस मुद्दे पर अडि़यल रुख अपनाया। 7 नवम्बर को दिल्ली में पुलिसिया कार्रवाई में कई संत गोलोकवास हुए। इसी आंदोलन के दौरान शंकराचार्य निरंजनदेवतीर्थ का 72 दिनों का अनशन और करपात्री जी महाराज की भूमिका को यादकर आज भी गोभक्त रोमांचित हो जाते है। लेकिन इसके बारे में मीडिया ने तब जो मौन धारण कियाए वह अब तक बरकरार है। लोदी मोडिया भारतीय भावनाओं को नजरंदाज की इस प्रवृत्ति के कारण सामान्य व्यक्ति तो दूरए अच्छे.खासे पढ़ लिख लोग भी इस आंदोलन और 7 नवम्बर 1966 को संतो ंके अविस्मरणीय बलिदान के बारे मे नहीं अनभिज्ञ हैं।
छोटी.छोटी घटनाओं के आधार पर अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर जो बनावटी बखेड़ा लोदी मीडिया आज खड़ा करने की कोशिश कर रहा हैए उसकी भूमिका आपातकाल में निहायत संदिग्ध रही। आज के दौर को जबरदस्ती आपातकाल जैसा साबित करने की कोशिश की जाती हैए जबकि आपातकाल तो सचमुच का संकट था। ष्जैसे खतरे को ष् को ष्सचमुच के खतरेष् से बड़ा बताने का कारनामा तो लोदी मीडिया ही कर सकता है। आज भी आपातकाल की चर्चा आते ही मीडिया का यह वर्ग चर्चा करने से बचता है या शातिराना तरीके से ष्हंसकर टाल देने वाली मुद्राष् अपना लेता है। नतीजनए आपातकाल के बारे में आज भारतीय समाज खुद को स्मृतिहीन अवस्था में पाता है।
रामजन्मभूमि आंदोलन लोकतांत्रिक व्यवस्था में भारतीय चिति को स्थापित करने वाला राष्ट्र की तरफ से चलाया गया सर्वाधिक प्रभावी आंदोलन था। इसके केन्द्र में सभ्यता की पांच सौ सालों की संघर्षगाथा थी। दुर्भाग्य से मीडिया ने बहुत चालाकी से रामजन्मभूमि के विमर्श को 1949 से पहले नहीं जाने देने का षड्यंत्र रचा और सफल भी रहा। राजजन्मभूमि के लिए किए पचास पीढि़यों के संघर्ष का इतिहास हर भारतीय के लिए प्रेरणास्त्रोत बन सकती थीए लेकिन इसे आस्थाए पहचानए आदर्श और इतिहास के बजाय बहुत सीमित दायरे में लिया। लोदी मीडिया ने प्रयासपूर्वक राष्ट्र की शताब्दियों की आकांक्षा को ष्मदिर बने या अस्पताल बनेष् जैसी टुच्ची बहस में उलझा दिया।
लोदी मीडिया का ऐसा ही रवैया रामसेतु आंदोलन और अमरनाथ आंदोलन के प्रति भी रहा। इन आंदोलनों की तीव्रता और व्यापकता को दरकिनार कर लोदी मीडिया में इनकी कवरेज कानून.व्यवस्था के प्रश्न के नजरिए सी गई। कहां पर कितनी ट्रकें रूकी रहींए कैसे यातायात व्यवस्था प्रभावित हुईए ऐसे आंदोलनों के कारण कैसे एक खास वर्ग अप्रसन्न होता हैए जैसे कोणों से इतने बड़े आंदोलनों की कवरेज करने की कुचेष्टा की गई। इसी कारणए अभी पिछले दशक में हुए इन आंदोलनों और उनके उद्देश्यों के बारे में हमारी जानकारी बहुत सीमित है।
शब्दों के जरिेए भारतीयता की छविभंग करने की कोशिशों को लोदी मीडिया पिछले दशक तक सफलतापूर्वक अंजाम देता रहा है। अब वह ऐसा नहीं कर पा रहा है। मीडिया पर उसका एकाधिकार खत्म हो रहा हैए उसकी सल्तनत ढहती हुई दिख रही है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम परए आदर्शों को बचाने के नाम पर मीडिया में जो धमा.चौकड़ी मची हुई हैए उसका एकमात्र कारण लोदी मीडिया की एजेंडा तय करने की ताकत में आ रही गिरावट है।
लोदी मीडिया को पहला सबसे बड़ा झटका जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में सांस्कृतिक शाम के बहाने ष्भारत तेरे टुकड़े होंगेष् का नारा लगाने वाली गैंग के पक्ष में पूरी ताकत से बैटिंग करने के बावजूद देश द्वारा नकार दिए जाने बाद लगा। लोदी मीडिया के इस तर्क से कोई भारतीय सहमत नहीं हो सका कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर भारत की बर्बादी तक जंग रहेगीए गो.इंडिया.गो.बैकए इंडियन आर्मी जिंदाबादए भारत तेरे टुकड़े होंगे.इंशाअल्लाहए इंशाअल्लाहए बंदूक के दम पर लेंगे आजादी जैसे नारे लगाए जा सकते हैं। इस मामले में अरोपियों की जमानत देते समय जस्टिस प्रतिभा रानी का 2 मार्च 2016 को यह निर्णय कि नारेबाज इसलिए नारे लगा पा रहे हैंए क्योंकि कच्छ और सियाचिन जैसे दुर्गम क्षेत्रों सशस्त्र बल सीमा की सुरक्षा कर रहे हैए पूरे देश की भावनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति बन गया।
भीमा.कोरेगांव प्रकरण में भी बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर के विचारों के साथ अर्बन.नक्सलियों ने जिस तरह खिलवाड़ कियाए और लोदी मीडिया ने इसे जिस तरह न्यायसंगत ठहराने की कोशिश की उससे अनुसूचित जाति के लोगों सहित पूरे देश ने नकार दिया। याकूब मेमन का प्रकरण होए या कठुआ कांड लोदी मीडिया का झूठ अब आसानी से पकड़ा जाने लगा है। सोशल मीडिया का प्लेटफार्म और नागरिकों में बढ़ता भारतीयता के बोध ने झूठ के कारोबार को असंभव बना दिया है।
ऐसे में अपनी गिरती साख को बचाने के लिए यह लोदी मीडियाए खुद को सच का एकमात्र पैरोकार साबित कर दूसरों को गोदी मीडिया बताने में जुटा हैए सेल्फी लेने न लेने पर फतवे जारी हो रहे हैंए सहानुभूति बटोरने की कोशिश हो रही है। इन तमाम हथकंडों के बावजूद आम आदमी लोदी मीडिया के एजेंडे को तवज्जो नहीं दे रहा है। शायद वह लोदी मीडिया के प्राथमिकताओंए नारों के आवरण में छिपे असलियत को पहचानने में सक्षम हो गया है। लोदी मीडिया की ढहती सल्तनत से भारत न केवल शाब्दिक कत्लोगारत से मुक्त हो सकेगा बल्कि उसे स्वस्थ.संवाद का परिवेश और नया सांस्कृतिक.आत्मविश्विास भी उपलब्ध हो सकेगा।
