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आहत सभ्यता को सुनने की कहानी है ‘द कश्मीर फाइल्स’
अरसे बाद ”द कश्मीर फाइल्स” के रूप में आहत भारतीय सभ्यता के एक अध्याय को दिल से सुनने की प्रयास हुआ है। परदे पर एक अमानवीय अध्याय को कहने को साहस से कोशिश हुई है। क्योंकि फिल्मी दुनिया का समाज पर एक जबरदस्त प्रभाव है, इसलिए इस नई कोशिश को लेकर समाज में एक अभूतपूर्व आक्रोश और उद्वेलन दिख रहा
द कश्मीर फाइल्स में एक संवाद है ”टूटे हुए लोग अपनी कहानी सुनाते नहीं, उनकी कहानी सुननी पड़ती है।” आहत सभ्यताओं के बारे में भी यह बात सटीक बैठती है। भारतीय सभ्यता की कहानी भी लम्बे समय से फिल्मी दुनिया ने सही ढंग से नहीं सुनी गई है। अब अरसे बाद ”द कश्मीर फाइल्स” के रूप में आहत भारतीय सभ्यता के एक अध्याय को दिल से सुनने की प्रयास हुआ है। परदे पर एक अमानवीय अध्याय को कहने को साहस से कोशिश हुई है। क्योंकि फिल्मी दुनिया का समाज पर एक जबरदस्त प्रभाव है, इसलिए इस नई कोशिश को लेकर समाज में एक अभूतपूर्व आक्रोश और उद्वेलन दिख रहा है।
संभवतः बाहुबली सीरीज के बाद यह पहली ऐसी फिल्म है, जिसको लेकर भारतीय समाज इतना उद्वेलित है। अधिक स्क्रीन देने का दबाव या फ्री टिकट उपलब्ध कराने जैसी खबरें यह साबित करती कि इस फिल्म को लेकन समाज किस तरह उत्साह है। ऐसा कहा जा सकता है कि बाहुबली से भारतीय सिनेमा में बदलाव की जो यात्रा शुरू हुई, वह अब एक नए पड़ाव पर पहुंच गई है। भारतीय यथार्थ को बेझिझक होकर कहने का आत्मविश्वास भारतीय सिनेमा ने ”द कश्मीर फाइल्स” के साथ हासिल कर लिया है।
इस फिल्म की ताकत तकनीक नहीं पटकथा,कहानी और अभिनय है। कभी डॉ चंद्रप्रकश द्विवेदी के धारावाहिक चाणक्य का उदाहरण उसकी पटकथा के लिए दिए जाता था। इसमें ऐतिहासिक और सभ्यतागत विमर्श को जिस तरह से पटकथा में कुशलता के साथ बुना गया उसने चाणक्य के संवाद को आम भारतीय के संवाद और तर्क का हिस्सा बन गया। बाद में अ वेडनेसडे जैसी फिल्मों ने अपनी कसी हुई कहानी और सधी हुई पटकथा के लिए प्रसिद्धि पाई।
द कश्मीर फाइल्स पटकथा और कहानी बुनने की कला को नई ऊंचाई देती है। घटनाओं के सच को जिस तरह से कहानी और पटकथा में ढाला गया है, वह दर्शक को झकझोर कर रख देता है। एक ऐसे दौर में जब एनीमेशन, 3 डी फिल्में सफलता के झंडे गाड रही हैं तब द कश्मीर फाइल्स की सफलता इसे और भी खास बना देती है। ” मीडिया वाले बाहर से नहीं अंदर से बदलते हैं” ” जो नदरू नहीं जानता, वह कश्मीर नहीं जानता” और ” जब तक सच जूते पहनता है तब तक झूठ दुनिया का चक्कर लगा के आ जाता है” जैसे संवाद दर्शक की समझ और जेहन दोनों को बदल देते हैं।
”द कश्मीर फाइल्स” को देखने के बाद युवाआंे में आश्चर्य, आक्रोश और उत्साह अधिक है। अधिकांश युवाओं को ऐसा लगता है किसी झूठी दुनिया से निकालकर उन्हें यकायक कठोर सच्चाई से रू-ब-रु करा दिया गया हो। युवाओं को यह भी लगता है कि जब तीन दशकों पहले घटी के बारे में झूठ और भ्रम रचा जा सकता है तोे सुदूर भारतीय इतिहास के साथ किस कदर खिलवाड़ किया गया होगा, उसका केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।
कहानी को जिस साहस के साथ कहा गया है, वह इस फिल्म को एकदम अलहदा बना देती है। ऐसी खबरें आई थी कि फिल्म उरी लम्बे समय तक इसलिए फंसी रही है क्योंकि उसके एक संवाद में 72 हूरों का जिक्र था। बाद में वह संवाद बदलना पड़ा। इस फिल्म ने शब्दों, दृश्यों और विषयों को लेकर झिझक तोड़ी है। फिल्म में काफिर, आतंकवाद, साम्यवाद जैसे शब्दों का खुलकर इस्तेमाल हुआ है। अत्याचार के दृश्यों को पूरे संजीदगी साथ फिल्माया गया है। मीडिया, पुलिसिया तंत्र और प्रशासन पर ऐसे संदर्भो के साथ तंज कसे गए है, जिनका उपयोग अभी तक भारतीय सिनेमा करने से बचता रहा है।
सिनेमा का उपयोग भारत के सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करने के लिए प्रतिस्पर्धी शक्तियां करती रही है, अब भारत ने इस नए हथियार को समझकर ऐसी शक्तियों को उत्तर देना प्रारंभ किया है। आख्यानों की दुनिया में ”द कश्मीर फाइल्स” शुरुआती लेकिन साहसी और प्रभावी प्रत्युत्तर है।
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‘भारतीय मन’ पर आधिपत्य का उपकरण
या भारत और स्वच्छ भारत बनाने का लक्ष्य बॉलीवुड को स्वच्छ और नया बनाए बगैर प्राप्त नहीं किया जा सकता। असल में बॉलीवुड इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है। बॉलीवुड को स्वच्छ करना जरूरी है, तभी नया भारत बन सकता है। एक टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में अभिनेत्री कंगना रणौत ने बॉलीवुड की ताकत और उसमें पसरी गंदगी की तरफ संकेत करते हुए यह टिप्पणी की थी।
कई लोगों को यह बात अटपटी लग सकती है। भला ‘नया भारत’ और ‘स्वच्छ भारत’ का मुंबइया सिनेमा से क्या सम्बंध हो सकता है? हमेशा ‘महत्वपूर्ण मुद्दों’ पर चर्चा करने के शौकीन कई बुद्धिजीवी पिछले दो महीनों से सोशल-मीडिया पर इस बात के लिए आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं कि सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या-हत्या प्रकरण को कुछ चैनल इतनी कवरेज क्यों दे रहे हैं? उनके लिए फिल्म और उससे जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना वाहियात मुद्दे पर चर्चा करने जैसा है।
ये वही लोग हैं जो अन्य जगहों पर नई पीढ़ी में बढ़ती नशे की लत पर रोना रोते हैं। परिवार टूटने, सम्बंधों के बिखरने पर नोस्टैल्जिक होकर व्याख्यान देते हैं। सामाजिक-सरोकारों से युवाओं की बढ़ती दूरी पर कोसते हैं। लेकिन तनिक ठहरकर, इस बात का विश्लेषण करने की जहमत नहीं उठाते कि ऐसा क्यों हो रहा है? जिस तथाकथित नई पीढ़ी के बिगड़ने की बातें हर जगह होती हैं, वह नई चीजें सीख कहां से रही है? उसे आधुनिकता, प्रगतिशीलता, वैज्ञानिकता के नाम पर जो परोस जा रहा है, उसे वह स्वीकार कर रही है। प्रश्न यह है कि वह परोसने वाला कौन है? कौन है जो भारत की नई पीढ़ी के मन और स्वप्न को गढ़ रहा है? कौन भारतीय मन पर कुंडली मारकर बैठा हुआ है? ऐसा कौन सा प्लेटफार्म है, जो भारतीय मन और उसके स्वप्नों को निर्धारित कर रहा है?
जनसामान्य और विशेषज्ञ अलग-अलग शब्दावली और लहजे में एक ही निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि नई पीढ़ी पर सबसे अधिक प्रभाव फिल्मी दुनिया का है, बॉलीवुड का है। समाजीकरण के अन्य माध्यमों का प्रभाव फिल्मी दुनिया के सामने हल्का पड़ता जा रहा है। खान-पान, रहन-सहन, जीवन के लक्ष्य, व्यवहार के मुहावरे सभी वहीं से तो आ रहे हैं। जिसके हाथों में देश की पूरी पीढ़ी हो, उस पर चर्चा करना निरर्थक विषय पर चर्चा करना कैसे हो सकता है? कंगना रणौत की टिप्पणी को इस संदर्भ में रखकर समझने की कोशिश करें तो उसके अर्थ आसानी से खुल जाते हैं।
इससे भी बड़ी बात यह कि जिस प्लेटफार्म और इंडस्ट्री के पास इतनी ताकत है, जो अपनी सम्मोहन-शक्ति के कारण सांस्कृतिक-अभिकेन्द्र बन गया है, उसको पारदर्शी, स्वच्छ और राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत बनाने की जिम्मेदारी हमारी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर होनी चाहिए। युवाओं के सबसे बड़े रोल-मॉडल संवैधानिक और राष्ट्रीय मूल्यों के अनुसार काम करें, यह आवश्यक हो जाता है। इस दिशा में कार्य करना, उसके लिए परिवेश बनाना, पसरे हुए सड़ांध को दूर करने के लिए मुखर होना एक महत्तर राष्ट्रीय कर्तव्य बन जाता है। इसलिए बॉलीवुड पर बहस बहुत जरूरी हो जाती है और उसकी पारदर्शिता के लिए उठने वाली किसी भी आवाज का महत्व बढ़ जाता है।
कंगना की ही शब्दावली का इस्तेमाल करें तो बॉलीवुड कोई इंडस्ट्री नहीं बल्कि एक रैकेट की तरह कार्य करता है। हिन्दूफोबिक और राष्ट्रविरोधी मानसिकता से चलने वाले माफिया-गिरोह की तरह है। यदि बॉलीवुड के इतिहास पर नजर डालें तो इस तथ्य को आसानी से समझा जा सकता है।
भारत में फिल्मों की शुरुआत लगभग एक सदी पहले दादा साहेब फाल्के से होती है। ऐतिहासिक साक्ष्य यह साबित करते हैं कि फिल्मी दुनिया में उनके प्रवेश का कारण भारतीय सभ्यता के उज्जवल पक्ष को लोगों के सामने रखना था। उन्हें मिशनरियों द्वारा दिखाई जा रही फिल्म ‘लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ को देखकर पीड़ा हुई थी कि वे फिल्मी माध्यम का उपयोग मतांतरण के लिए कर रहे हैं। इसके बाद वह संकल्प लेते हैं कि फिल्म निर्माण की बारीकियों को सीखकर भारतीय कथानक और मूल्यों को आगे बढ़ाएंगे। फिल्म-निर्माण की बारीकियों के सीखने की उनके संघर्ष की एक अलग कहानी है। लेकिन उनकी पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र बताती है कि फिल्म निमार्ण में उनकी प्राथमिकताएं क्या थीं।
स्वतंत्रता के समय और उसके दो दशक बाद तक भारत का फिल्म जगत अपने सांस्कृतिक मूल्यों, देशज मान्यताओं और देशभक्ति से ओतप्रोत था। लेकिन इसी बीच बॉलीवुड में दो-पटकथा लेखकों सलीम-जावेद का प्रवेश होता है। और इसी के साथ शुरू होता है संवाद और कहानियों में भारतीय-समाज को वैचारिक और सभ्यतागत पूर्वाग्रहों के साथ पेश करने का सिलसिला। शोले, जंजीर, अंदाज, डॉन जैसी फिल्मों में इस पूर्वाग्रह को इतनी कुशलता के साथ गूंथा गया है कि दर्शक आसानी से इसको पकड़ नहीं पाता। समाज के कुछ वर्गों को बुरा और कुछ वर्गों को अच्छा दिखाने की परम्परा शुरु हुई। और यहीं से शुरु होता है अपनी परम्पराओं, सामाजिक-सरंचना और भारतीय यथार्थ का मखौल उड़ाने का सिलसिला, जो अब खुल्लम-खुल्ला देश का मखौल उड़ाने तक पहुंच गया है। उस समय गढ़ी गई ‘एंग्री यंगमैन’ की छवि ने भारत में औद्योगीकरण की प्रक्रिया को किस तरह प्रभावित किया, इसका विश्लेष्ण किया जाए तो वैचारिक आग्रहों को आसानी से पकड़ा जा सकता है।
नब्बे के दशक में बॉलीवुड तेजी से माफिया के शिकंजे में फंसता गया। फिल्मी-दुनिया को इंडस्ट्री का दर्जा देकर इसे रोकने की कोशिश की गई, लेकिन माफिया, ड्रग-रैकेट की घुसपैठ बॉलीवुड में इस कदर हो चुकी थी कि वह उससे ही संचालित होने लगा। मुम्बई बम धमाकों के बाद जब यहां का माफिया कराची पहुंचा तो उसके जरिए आईएसआई को बॉलीवुड में घुसपैठ करने का मौका मिल गया। उसके बाद तो जो काम संवादों में गूंथकर होता था, वह खुल्लमखुल्ला होने लगा। मिशन-कश्मीर, फना, माय नेम इज खान जैसी फिल्मों का पूरा कथानक ही इस तरह से बुना गया, जिससे पाकिस्तान का दृष्टिकोण साबित होता है।
इसी दौर में दिव्या भारती की रहस्यमय स्थितियों में मौत होती है। गुलशन-कुमार ने टी-सीरीज के जरिए देश में भक्ति-संगीत की एक नई गंगा बहाने की कोशिश की थी। पूरे देश ने उनके प्रयासों को हाथों-हाथ लिया था। बाद में उनकी नृशंस हत्या कर दी गई। उसके बाद पिछले दो-दशकों से इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया। आज भी भक्ति और देशभक्ति के लिए लोगों को दशकों पूर्व के गानों से ही काम चलाना पड़ता है। आशुतोष राणा जैसे फिल्मकारों, जिनकी भाषा और दर्शन को लेकर एक स्पष्ट झुकाव था, उनके कैरियर को तबाह कर दिया गया। विवेक ओबेरॉय जैसों का कैरियर व्यक्तिगत कारणों से तबाह कर देना हाल की ही घटना है।
कंटेट के जरिए भारतीय आस्था के प्रतीकों को किस तरह से नुकसान पहुचाया जा सकता है, इसके हालिया उदाहरणों ने लोगों को सोचने पर विवश कर दिया है। पीके में भगवान शिव और गलियों की रामलीला में भगवान राम का मजाक तो खुले आम दिखता है। बजरंगी भाईजान में बंदरों के सामने झुकने या शाकाहारी खाने का जिस तरह मजाक उडाया गया है, वह बहुत बारीकी से देखने पर ही समझ में आता है। दंगल में खास मजहब के बेचने वाले मुर्गों का खाना, अंततः मांसाहार बनाने की अनभिज्ञता और कुश्ती के फाइनल के दिन प्रसाद के रूप में मिट्टी देने की घटना के जरिए किस तरह सभ्यतागत एजेंडे को आगे बढाया गया है, वह आसानी से समझ में आता है।
कंगना रणौत ने क्योंकि इस इंडस्ट्री में काम किया है, इसलिए उनके शब्दों में बॉलीवुड में काम कर रही देश-विरोधी और सभ्यता-विरोधी संरचना को समझना आवश्यक है। कंगना के अनुसार यह पूरा ढ़ांचा तीन स्तरों पर काम करता है। पहले स्तर पर महेश भट्ट जैसे लोग हैं, जो दिखने में कूल और आधुनिक लगते हैं, लेकिन फिल्में जेहादी बनाते हैं। दूसरे स्तर पर जावेद-अख्तर जैसे लोग हैं, जो स्वयं को नास्तिक बताते हैं, लेकिन उनका पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि कौन लोग इस्लामिक सिद्धांतों के अनुसार काम करते है और कौन उसके विरोध में काम करते हैं। इसके आधार पर किसी अभिनेता को आगे बढ़ाने और रोकने की रणनीति बनाते हैं। तीसरे स्तर पर करण जौहर जैसे लोग हैं जो फिल्मों के कंटेंट को इस तरह से मोड़ते हैं, जिससे अपना देश, अपनी परम्पराएं ही खलनायक दिखने लगती हैं। गुंजन सक्सेना फिल्म में कपोल-कल्पित पितृसत्ता को दिखाने की बात हो या केसरी में सैनिकों द्वारा मस्जिद बनाने की बात, इसी तथ्य को साबित करते हैं, जबकि सच्चाई इसके बिलकुल विपरीत थी।
मन पर कब्जा किसी देश के लिए सबसे भयावह स्थिति होती है। इसको लम्बे समय बरकरार रखने की इजाजत दे दी जाए तो गुलामी में आजादी और आजादी में गुलामी का भ्रम पैदा होने लगता है। इसलिए मूवी-माफिया के शिकंजे को तोड़ना जरूरी हो जाता है। यह स्थापित तथ्य है कि मूवी-माफिया की जान ड्रग में बसती है, इसके जरिए वह जहां बॉलीवुड के तंत्र को लचर बनाता है, अभिनेता-अभिनेत्रियों की कमजोरी का लाभ उठाने की स्थिति में पहुंचता है, वहीं उसे बॉलीवुड में निवेश लायक धन भी मिलता है। ड्रग के जरिए उगाही और फिल्मों में निवेश, यह एक सेट फार्मूला है।
इस स्थिति से निकलने का एक सहज और सरल उपाय अपने अनुभवों के आधार पर कंगना रणौत ने सुझाया है, वह यह है कि सभी अभिनेता, अभिनेत्री, फिल्म-डायरेक्टरर्स का किसी फिल्म शुरू करने से पहले इस बात को जानने के लिए ब्लड सैंपल लिया जाना चाहिए कि वह हार्ड ड्रग कनज्यूम करते हैं या नहीं और दूसरा उनसे यह हलफनामा लिया जाना चाहिए कि वह देश-विरोधी कंटेट औैर मानसिकता को आगे नहीं बढ़ाएंगे। जब खेलों तक में डोप टेस्ट किए जाते हैं तो पूरे देश की मानसिकता को प्रभावित करने वाले लोगों का ब्लड टेस्ट,डोप-टेस्ट क्यों नहीं होना चाहिए। आखिर किसी को भी अपने बच्चों का रोल-मॉडल बनाने की इजाजत तो नहीं दी जा सकती। #drugtestforcelebrities का अभियान समय और देश की मांग है।
देश-काल
सभ्यतागत स्मृति की निधि बने सिनेमा
भारतीय रजतपटल शत शरद ऋतुओं का द्रष्टा बन चुका है। वह शतायु हो गया है। आगामी 12-15 महीनों में कई तथ्य और तिथियां आपकी नजरों के सामने से बहुत बार गुजरेंगी। मसलन, प्रथम भारतीय कहानी आधारित फिल्म (फीचर फिल्म) ‘राजा हरिश्चंद्र’ है। इसके निर्माता धुंडिराज गोविंद फाल्के उपाख्य दादासाहब फाल्के थे। इस फिल्म की शूटिंग की शुरुआत 21 अक्टूबर 1912 से प्रारम्भ हुई। 21 अप्रैल 1913 को मुम्बई के ओलम्पिया हाॅल में इस फिल्म का पहला शो हुआ। यह शो पत्रकारों और बुद्धिजीवियों तक सीमित था। बाद में 3 मई 1913 को यह फिल्म जनसाधारण के समक्ष प्रदर्शित की गई। इन तमाम आंकड़ों को परोसने की प्रक्रिया में एक तथ्य को छुपाए जाने की प्रबल संभावना भी है। संभवतः पंथनिरपेक्षता की काली छाया और बाजार की कठोर काया का डर आंकड़ों के कारोबारियों को उस तथ्य का जिक्र करने से रोकगा, जिसने भारतीय सिनेमा के पितामह को फिल्म निर्माण के लिए अपनी भूमि और भाषा अपनाने की ललक पैदा की। वह तथ्य यह है कि इसाई मिशनरियों द्वारा संचालित मतांतरण अभियान से उपजे आक्रोश ने दादा साहब फाल्के को सिनेमा का भारतीय शिल्प गढ़ने के लिए प्रेरित किया था।
उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि मिशनरियों द्वारा सिनेमा के जरिए पश्चिमी आदर्शों को भारत पर थोपने की प्रक्रिया का प्रतिरोध करने के लिए दादा साहब ने भारतीय सिनेमा स्थापित करने के लिए प्रयास प्रारम्भ किए। यह एक स्थापित तथ्य है कि औपनिवेशिक शासनकाल में मतांतरण की प्रकिया को राज्याश्रय प्राप्त था। हिन्दू धर्मावलम्बियों को मतांतरित करने के लिए आर्थिक प्रलोभन और राजनीतिक प्रभुसत्ता दोनों को प्रयोग इसाई मिशनरियां कर रही थी। भारतीयों को मतांतरण हेतु मानसिक स्तर पर तैयार करने के लिए साहित्य वितरण जैसे पारंपरिक तरीकों के साथ सिनेमा जैसी नवीनतम माध्यमों का भी प्रयोग किया जा रहा था। इस कड़ी में वर्ष 1910 में भारत के विभिन्न हिस्सों में यीशु मसीह के जीवन पर आधारित एक फिल्म ‘ द लाइफ आॅफ क्राइस्ट’ दिखायी गयी। इसी फिल्म ने 39 वर्षीय दादा साहब फाल्के को समानांतर भारतीय सिनेमा को स्थापित करने की प्रेरणा दी। विदेशी भाव और भाषा में निर्मित इस फिल्म को दखने के बाद दादा साहब फाल्के ने यह महसूस किया कि ईसाई मिशनरियां सिनेमाई प्रभाव का उपयोग भारतीय संस्कृति के उच्छेदन के लिए कर रहीं है। उन्हें यह तथ्य समझने में भी समय नहीं लगा कि सिनेमा मनोरंजन तक सीमित नहीं है। इसमें सांस्कृतिक संरक्षण अथवा सांस्कृतिक उच्छेदन की असीम संभावनाए भी निहित हैं। उनकी दूरदृष्टि ने दीवार पर लिखी उस इबारत को भी पढ़ लिया था कि सिनेमा को भारतीय भाषा, भाव और भूमि से जोड़कर सांस्कृतिक नवचैतन्य के लिए संभावनाएं सृजित की जा सकती हैं।
उन्होंने अपनी पहली फिल्म के लिए जिस कथावस्तु का चयन किया और उसके निर्माण के लिए जिस तरह से संघर्ष किया, उससे भी यह स्पष्ट होता है कि उनके लिए सिनेमा सांस्कृतिक संरक्षण का उपकरण था। उन्होंने किसी ऐसे भारतीय आदर्श पुरुष पर फिल्म बनाने की ठानी, जिसका भारतीय लोकमानस पर गहरा प्रभाव हो। इसके लिए उन्होंने भारतीय समाज और संस्कृति का लम्बे अरसे तक अध्ययन और अवलोकन किया। अंततः किसी आदर्श भारतीय पात्र की उनकी खोज महाराज हरिश्चंद्र पर समाप्त हुई। महाराज हरिश्चंद्र के चरित्र में निहित उदात्त नैतिक मूल्यों की स्मृति अब भी भारतीय लोकमानस में बनी हुई थी। कई नाटक कम्पनियां हरिश्चंद्र नाटक का मंचन करती थी और एक आम भारतीय में इस नाटक को जबरदस्त उत्सुकता भी थी। महात्मा गांधी ने इस बात को स्वीकार किया है ‘राजा हरिश्चंद्र’ नाटक ने उनके जीवन का बहुत प्रभावित किया है। यह स्वीकृति इस बात को साबित करती है कि सम्पूर्ण भारत में राजा हरिश्चंद्र नाटक अत्यंत लोकप्रिय था। दादासाहब फाल्के द्वारा राजा हरिश्चंद्र पर फिल्म निर्माण का निर्णय उनकी भारतीय सामाजिक सांस्कृतिक संरचना की बेहतरीन समझ का संकेतक है। दरसअसल, रजतपटल को भारतीय स्मृतिपटल से जोडने की ललक ने ही दादासाहब फाल्के को महाराज हरिश्चंद्र पर फिल्म निर्माण करने के लिए प्रेरित किया ।
फिल्म निर्माण की बारीकियों को समझने के लिए 1 फरवरी 1912 को उन्होंने लंदन के लिए प्रस्थान किया। लंदन जाने के लिए उन्होंने अपनी बीमा पाॅलिसी और पत्नी के गहनों को गिरवी रखकर पैसे जुटाए थे। जाहिर है यह संघर्ष व्यवसायिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण के लिए था। व्यवसायिक इसलिए नहीं क्योंकि उस समय भारत जैसे देश में सिनेमा के जरिए व्यवसायिक हित साधना संभव नहीं था। फिल्म बनाना एक दुष्कर कार्य था और सिनेमा देखना एक अधम कार्य। सिनेमा को उस समय इतनी हीन दृष्टि से देखा जाता था कि दादा साहब फाल्के को राजा हरिश्चंद्र के महिला चरित्रों के लिए पुरुष कलाकारों का चयन करना पड़ा था। क्योंकि उस समय आम भद्र महिला तो दूर वेश्याएं भी सिनेमा में भूमिका निभाने के लिए तैयार नहीं थीं। तत्कालीन समाज में फिल्म के शौकीनों को भी तौहीन की नजर से देखा जाता था। फिल्म देखने के शौकीन लोगों को ‘ चवन्नी छाप ’ आदम कहकर बुलाया जाता था क्योंकि उस समय मुम्बई के नावेल्टी होटल में देशी दर्शकों के लिए टिकट का मूल्य चार आने निर्धारित किया गया था। ऐसे माहौल में फिल्म निर्माण के लिए पहल कोई सांस्कृतिक व्यक्ति ही कर सकता है , व्यवसायिक व्यक्ति नहीं।
दादा साहब फाल्के द्वारा ‘राजा हरिश्चंद्र’ के रुप में रोपा गया भारतीय सिनेमा का वह नन्हा पौधा आज एक विशाल वट वृक्ष बन गया है। एक आंकडे़ के मुताबिक भारत में 1.3 करोड़ लोग प्रतिदिन वाॅलीवुड की फीचर फिल्मों को विभिन्न माध्यमों के जरिए देखते हैं। वाॅलीवुड में औसतन 1000 फिल्में सालाना बनती हैं। जबकि हाॅलीवुड में यह आंकड़ा 600 फिल्मों तक सीमित है। इस वटवृक्ष से तमिल, तेलगु, बंगाली, भोजपुरी फिल्मों की नई जडे़ं निकल आयी हैं। बाहर से देखने पर यह वृक्ष लहलहा रहा है। प्रभाव में वृद्वि हुई है। हमारे सुख, दुख, स्वप्न, शैली और शब्द सब फिल्मों की स्क्रिप्ट और धुनों के जरिए अभिव्यक्त हो रहे हैं। लेकिन क्या प्रभाववृद्वि और व्यवसायिक सफलता रजतपटल के मूल्यांकन के एकमेव आधार बन सकते हैं। भारतीय संदर्भों में ऐसा नहीं कहा जा सकता क्योंकि दादा साहब फाल्के ने यह पर रजतपटल के शुरुआत सामाजिक सांस्कृतिक संरक्षण और सामूहिक स्मृतिपटल के पोषण के लिए की थी।
आज की स्थिति बिल्कुल उलटी है। रजतपटल भारतीय स्मृतिपटल को पोषित करने के बजाय उसकी जडों में मट्ठा डाल रहा हैं ,उसको खरोंचकर लहूलुहान कर रहा है। आज भारतीय रजतपटल के पास पैसा और तकनीकी दोनों हैं लेकिन भारतीयता को पोषित करने वाली दृष्टि नहीं है। उसकी अंतर्वस्तु या तो बाजारु-भारतीय है अथवा विदेशी। भारतीय समाज और सांस्कृतिक वैशिष्ट्य की पहचान और अभिव्यक्ति का कोई भी प्रयास रजतपटल के चमकीले लोग नहीं कर रहे है। अभिव्यक्ति की बात तो दूर भारतीय मूल्यों को उपहास की विषयवस्तु के रुप में प्रस्तुत किया जा रहा है। चाणक्य जैसे धारावाहिक के निर्माता और रजतपटल की दुनिया भारतीयता को अभिव्यक्ति देने में सक्रिय कुछ गिने चुने लोगों में से एक डाॅ0चंद्रप्रकाश द्विवेदी आज की स्थितियों का सटीक आकलन करते हुए कहते हैं कि –
‘‘भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहब फाल्के के पास उस समय कई विषय रहे होंगे,लेकिन उन्होेंने अपनी फिल्म की कथा अतीत से चुनी। मतलब यह नहीं कि वे अतीतजीवी थे। उन्हें भारत के सामने एक आदर्श रखना था।उनका उद्देश्य था इस असाधारण उपकरण सिनेमा का इस्तेमाल हम समाज के लिए करें। आजादी और उससे पहले जो फिल्में हमारे यहां बनी उसमें भारत की जडें थी।भारतीय आत्मा थी।भारत के सवाल थे। उन सवालों के उत्तर देने की कोशिशें भी उनमें थी।पांचवें छठें दशक का सिनेमा भारतीय तत्वों से भरा था। परन्तु जैसे-जैसे सिनेमा का विकास होता गया , बाजार का दबाव बढता गया। हमारी कहानियां भारत से दूर होती गयीं। अब स्थिति ऐसी हो गयी है कि भारत के पात्र होत हैं और पीछे विदेशी भीड घूम रही होती है। हमारी गलियां भी अमृतसर , राजस्थान , यूपी और बिहार की नहीं रह गयीं, बल्कि अब हम गलियां भी न्यूयार्क , लंदन , शंघाई, स्पेन और कनाडा जैसे देशों की ढूंढ रहे हैं। ’’ (झंकार ,दैनिक जागरण , 5 फरवरी 2012 , पृष्ठ 4)
वर्तमान भारतीय रजतपटल में भारत और भारतीयता दोनों एकसिरे से गायब हैं। आज के रजतपटल में गोवध की समस्या नहीं है, मैली होती गंगा नहीं है, किसान आत्महत्या नहीं है, 90 करोड़ निर्धन नहीं हैं, बिजली से महरुम और ढिबरी से टिमटिमाते 10 करोड़ घर नहीं हंै, गांव की पगडंडिया नहीं हैं, हाथरस, भदोही, मुरादाबाद के हस्तशिल्पियों की दारुण दशा नहीं है। भारतीय स्मृतिपटल में रची बसी छवियां नहीं हैं, मुहावरे नहीं है। वह तो राजपथ, फ्लाईओवर, शाॅपिंगमाल्स से जगमगा रहा है। विदेशों में पिकनिक मना रहा है, बास्टर्ड कहने में इतरा रहा है और च्यूतिया कहने में लजा रहा है। उद्योगपतियों के कौशल को मसाला लगाकर दिखा रहा है। डाॅ चंद्रप्रकाश द्विवेदी इस संदर्भ में कहते हैं कि –
‘‘ पिछले 63 सालों में भारत के विभाजन पर कितनी फिल्में बनी? उंगलियों पर गिन सकते हैं 1984 के दंगों पर कितनी फिल्में हैं? कश्मीर का सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा हमारी फिल्मों का विषय नहीं हैं। आतंकवाद और नक्सलवाद को लेकर, भ्रष्टाचार को लेकर, आरक्षण को लेकर, रामजन्म भूमि विवाद को लेकर फिल्में नहीं बनी हैं। इतने सारे विषय देश में मौजूद हैं, परंतु हमारे फिल्मकारों को उनसे कोई सरोकार नहीं है।’’ (झंकार ,दैनिक जागरण , 5 फरवरी 2012 , पृष्ठ 4)
सर्वाधिक पीड़ादायी दृश्य यह है कि कई पीढि़यों से लोकस्मृति में घर कर चुकी छवियां और शब्द में रजतपटल पर जगह नहीं पा रहे हैं। 60 और 70 के दशक में फिल्मों के आधिकांश गाने लोकधुनों पर आधारित होते है। आज भी लोग उन्हें बडे आत्मीय भाव से गुनगुनाते हैं। नैन लडी जईहैं तो मनवा में खटक होईबै करी, चलत मुसाफिर मोह लियो रे पिजडे वाली मुनिया ,दुख भरे दिन बीते रे भइया सुख भरे दिन आयो रे, जैसी लोकधुने अब रजतपटल से लुप्तप्राय हो गयी हैं। भारतीय नाटको की परंपरा सुखांत रही है, अच्छाई के पथ पर चलने वाले नायक की विजय सुनिश्चित होती है। लेकिन अब रजतपटल पर पश्चिमी दुखांत परंपरा हावी हो रही है। अच्छाई और बुराई की रेखाएं मिट रही हैं।
सोनचिरैया संस्था की संस्थापक और प्रख्यात लोकगायिक मालिनी अवस्थी रजतपटल पर लोकधुनों के गायब होने से काफी आहत हैं। वह रजतपटल में लोक के लिए सिमटते स्थान पर चिंता जाहिर करते हुए कहती हैं कि -‘‘स्थिति यह है कि सिर्फ गायन में ही नहीं लोक के सभी अंग -उपांग में क्षति है।लोक कलाकार के अस्तित्व से सीधे जुडा हुआ है लोक कलाओं का अस्तित्व।नक्कारा ,ताशा ,मृदंग ,झांझ,सींगी ,करताल और हुडुक जैसे वाद्य तभी तक सुरक्षित है ,जब तक कि इनके कलाकार । इन कलाओं को बचाना है तो इन लोक कलाओं को बढावा देना होगा । नई पीढी को इस अनमोल थाती से जोडना है तो लोककलाओं को अब स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा । यदि अपनी संस्कृति और अपने निजत्व की पहचान बनाए रखनी है तो समाज को हर हाल में नई पीढ़ी को लोक-साक्षर बनाना ही होगा।
निश्चय ही, वर्ण साक्षरण और ई साक्षरता से कम जरुरी नहीं है लोक साक्षरता। लोकसाक्षरता एक व्यापक शब्द है। इसका सम्बंध केवल गायन वादन से नहीं है। यह उस परंपरा से परिचय है जो भारतीय व्यक्तित्व को वैशिष्ट्य प्रदान करती है। इस परंपरा का उल्लेख किसी शास्त्रीय पोथी में नहीं है। इस परंपरा के प्राण भारतीयों के सामूहिक स्मृतिपटल में बसता है। इसी स्मृति पटल की बदौलत लाखों शब्द और छवियां समय के अवरोधों को पार करते हुए निरंतर एक पीढी से दूसरी पीढी में प्रवाहित हो रही हैं। स्मृतिपटल का चुकना भारतीयों की सबसे बडी सांस्कृतिक पराजय होगी। सामूहिक स्मृति पटल को बचाने के लिए लोकसाक्षरता आवश्यक है। यही सैकडों सालों की पराधीनता के कारण भारतीय भावभूमि पर जड जमा चुकी आत्महीनता की ग्रंथि को उखाड सकती है।
स्मृतिपटल और रजतपटल के बीच स्वस्थ संवाद स्थापित कर लोकसाक्षरता को बढाया जा सकता है , यह सवंाद स्मृतिपटल के संरक्षण के लिए भी आवश्यक है। इसके लिए रजतपटल पर सांस्कृतिक समझ वाले लोगों की सक्रियता बढनी आवश्यक है। भारत में व्यवस्था परिवर्तन के आकांक्षी व्यक्तियों को भी रजतपटल को हल्के में लेने और उससे दूर रहने की प्रवृत्ति परिवर्तित करने होगी। जो रजतपटल प्रतिदिन 1.3 करोड भारतीयों तक पहुंचता है ,उन्हें हंसाने -रुलाने की क्षमता रखता है,युवावर्ग जिससे सर्वाधिक प्रभावित होता हो ,उसको नजरंदाज कर व्यवस्था परिवर्तन की रुपरेखा कैसे तय की जा सकती है? क्या श्री रामजन्म भूमि आंदोलन की सफलता में श्री रामानंद सागर कृत रामायण के योगदान को एकदम से नकारा जा सकता है। रजतपटल पर सांस्कृतिक व्यक्तियों की सक्रियता समय की मांग है। सांस्कृतिक व्यक्तियों की सक्रियता रजतपटल पर स्मृतिपटल का प्रभाव और दबाव सृजित करेगी। यह प्रभाव और दबाव सांस्कृतिक सम्पन्नता और निरंतरता के लिए आवश्यक है।
भारतीय स्मृतिपटल को लहुलूहान करने में मात्र रजतपटल की अंतर्वस्तु और तकनीकी ही जिम्मेदार नहीं है। रजतपटल से सम्बंधित सूचना-प्रवाह भी भारतीय स्मृतिपटल की जडें खोद रही है। व्यवसायिक सिनेमा के अतिरिक्त बहुत कुछ सर्जनात्मक भी रजतपटल की दुनिया हो रहा है। लेकिन फिल्म की दुनिया में उसकी कोई रिपोर्टिंग नहीं होती। बिग बाॅस को लेकर तो प्रिंट और मीडिया ने आसमान अपने सिर पर उठा लिया था लेकिन लगभग एक दशक के शोध के बाद मार्च से प्रसारित होने वाले डाॅ चंद्रप्रकाश द्विवेद्वी के धारावाहिक उपनिषद गंगा की चर्चा सूचना-संसार और फिल्म,धारावाहिक समीक्षा के काॅलम का हिस्सा नहीं बन सका । डाक्यूमेंट्री की समीक्षा अब भी रजतपटल पत्रकारिता का हिस्सा नहीं बन सकी है, जबकि यह फिल्मों की अपेक्षा भारतीय भावभूमि और समस्याओं से अधिक जुडी है। रजतपटल की पत्रकारिता को साहित्य समीक्षा जैसा गांभीर्य देकर रजतपटल के भारतीयकरण की दिशा में प्रारम्भिक कदम बढाया जा सकता है।
देश-काल
सभ्यतागत सीमाओं को उजागर करता है जैक्सन का जीवन
25 जून 2009 को पाॅप संगीत की दुनिया में किवदंती बन माइकल जैक्सन का निधन हो गया था। उनकी जिंदगी की तरह ही उनकी मौत भी रहस्यपूर्ण रही और मीडिया की सुर्खियों का हिस्सा बनी। जैक्सन पाॅप संगीत की दुनिया के बादशाह ही नहीं थे, वे वर्तमान उपभोक्तावादी सभ्यता के लिए ‘आदर्श प्रतीक’ भी थे। बाजारु जीवन दर्शन और मूल्यों पर आधारित वर्तमान सभ्यता के विश्लेषण के लिए, उसकी खूबी एवं खामियों को जानने के लिए जैक्सन के जीवन और उनकी जीवन-शैली को ‘केस स्टडी’ के रुप में चुना जा सकता है।
माइकल जैक्सन को उस जीवन-दर्शन और जीवनशैली का साक्षात उदाहरण माना जा सकता है, जिनको ‘मीडिया-मार्केट नेक्सस’ वैश्वीकरण के नाम पर पूरी दुनिया में आरोपित करने के लिए सतत प्रयत्नशील है। बाजार और संचार द्वारा गढे़ गए तमाम सुख एवं विकास के मानकों को जैक्सन ने अपने जीवन में स्पर्श किया। उन्होंने लोकप्रियता की उन ऊंचाईयों को छुआ, जो किसी के लिए ईष्र्या का विषय बन सकती हैं। विज्ञापनों में ही सम्भव दिखने वाली लोकप्रियता से आगे निकल गए थे जैक्सन। उनकी थिरकन पर झूमने वाले पूरी दुनिया में मिल सकते हैं। एक समय वह अकूत संपत्ति के मालिक थे। संक्षेप में कहें तो माइकल जैक्सन के पास वह सब कुछ था जिसे आज की व्यवस्था एक जीवन की सफलता और सार्थकता के पैमाने के रुप में आम आदमियों के सामने परोसती है।
दरअसल ,मीडिया -मार्केट नेक्सस उत्पादों के संग्रह और उनके प्रदर्शन को आज की जीवनशैली में ‘चरम-मूल्य’ के रुप में स्थापित करने का प्रयास कर रही है।। बाजारु प्राथमिकता में खरीददारी का सबसे ऊपर होना स्वाभाविक भी है। खरीददारी की उत्तेजना पैदा करने के लिए लोगों में दिखावे की संस्कृति रोपी जाती है। जैक्सन की जीवन में खरीददारी और दिखावे का जबरदस्त संयोग देखा जा सकता है। प्रदर्शन प्रभाव पैदा करने के लिए जैक्सन ने अपने पूरे शरीर को प्रयोगशाला बना दिया था। बीसियांे से अधिक बार उन्होंने नाक की सर्जरी करायी थी। उनके लिंग-प्रत्यारोपण के किस्स भी काफी चर्चित रहे । प्रदर्शन प्रभाव पैदा करने के लिए माइकल जैक्सन कितने संसाधनों का प्रयोग करते थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1996 में मुम्बई में हुए शो के लिए जैक्सन का सामान तीन रुसी मालवाहक पोतों के जरिए मुम्बई पहुंचा था। शौक का आलम यह कि उन्होंने अपना एक चिडि़याघर ही बसा डाला। एक द्वीपसमूह की खरीददारी कर डाली। हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि जैक्सन के दिखावे और खरीददारी का संबंध उनकी काली त्वचा और उससे जुड़ी हीनता-ग्रंथि से अधिक है। लेकिन इस तर्क को यह कहकर खारिज किया जा सकता है कि बाजार और संचार के गठजोड़ के बिना कालेपन से जुड़े हीनता के क्षणिक भाव को स्थायी भाव में नहीं बदला जा सकता।
लेकिन क्या वास्तव में जैक्सन एक खुशहाल जीवन जी सके ? क्या जैैक्सन के लोकप्रिय जीवन और लक-दक भरी जीवनशैली के स्याहपक्षों और दुःखद कराह को अनदेखा किया जा सकता है। जैक्सन की दर्दनाक मौत कुछ सवाल छोड़ गई है। ये साधारण सवाल नहीं है। आज की पूरी सभ्यता इन सवालों से जूझ रही है और इनका उत्तर पाने को छटपटा रही है।
जैक्सन की मौत को लेकर जो खबर सामने आई उसके मुताबिक जैक्सन के उपर लगभग 8 हजार करोड़ रुपए का कर्ज था। इस कर्ज ने ही जैक्सन का ‘कमबैक कन्सर्ट’ पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य कर दिया। हालांकि उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति उन्हें किसी भी शो की तैयारी की अनुमति नहीं देती थी। जैक्सन की पोस्टमार्टम रिपार्ट के मुताबिक उनका शरीर कंकाल का ढांचा मात्र रह गया था। और उनकी मौत के वक्त उनके आंतो में दर्द निवारक गोलियां ही थीं। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक जैक्सन प्रतिमाह 20 लाख से अधिक रुपए दवाईयों पर व्यय करते थे। उनका स्वास्थ्य इतना बिगड़ चुका था कि उन्हें आॅक्सीजन के टेंटों का सहारा लेना पड़ता था। जैक्सन एल्फा -1 एंटीट्राईप्सिन नामक गंभीर बीमारी से पीडित थे । इस बीमारी में पूरे शरीर में फेफडों को सुरक्षा प्रदान करने वाली प्रोटीनों की संख्या तेजी से घटने लगती है।
सवाल यह है कि एक समय संगीत के क्षेत्र में विश्व के सर्वाधिक अमीर जैक्सन कर्जे के इतने बड़े कुचक्र में कैसे फंस गए। क्या ऐसी जीवनशैली को मान्यता दी जा सकती है, जिसमें चोटी पर बैठा व्यक्ति भी कर्ज के कुचक्र का शिकार हो जाए, भोजन के बजा दर्दनिवारक गोलियों का आहार ले। क्या उस बाजारु नियम को सामाजिक नियम में तब्दील किया जा सकता है, जो अपने कर्ज वसूली के लिए किसी की जान लेने में न हिचके। ये सवाल व्यक्तिगत नहीं हैं, साभ्यतिक हैं। वैश्विक मंदी से लेकर ग्लोबल वार्मिंग तक की ऐसी समस्त समस्याओं जिनका सामना हमारी सभ्यता कर रही है, का जुड़ाव इन सवालों से है। ऐसा नहीं है कि इन प्रश्नों को जैक्सन को पैदा करने वाली पश्चिमी सभ्यता महसूस नहीं कर रही है। पश्चिमी दुनिया इन प्रश्नों की गम्भीरता और उनके समाधान की अनिवार्यता से वाकिफ है। लेकिन आदिम मानव प्रवृत्तियों के रुपंातरण और उसकी अभिव्यक्ति में सहज तथा सामान्य बोध के समावेश की कला से वाकिफ न होने के कारण पश्चिम कोई सार्थक समाधान नहीं ढूढ पा रहा है । प्रकृति तथा समाज के प्रति अपने सीमित दृष्टिकोण के कारण भी पश्चिम के समाधान ढूंढने का रास्ता और दुर्गम हो जाता है।
आखिरकार इन प्रश्नों का उत्तर भी हमको हमको माइकल जैक्सन के जीवन का आखिरी पड़ाव दे जाता है। जैक्सन अपने जीवन के अंतिम दिनों में उपनिषदों के अद्वैतवाद से अपनी सर्जनात्मक -उर्जा खींचने वाले भारतीय कवि रविन्द्रनाथ टैगोर का अध्ययन कर रहे थे। रविन्द्रनाथ को पढ़कर जैक्सन पर्यावरण के विषय पर कुछ कविताएं लिखने और स्टेज शो करने की योजना बना रहे थे। जलवायु परिवर्तन की भयावह समस्या के प्रति आमजन को जागरुक करने के लिए वह योगदान देना चाहते थे।
आखिर वह कौन सा तत्व है जो माइकल जैक्सन का झुकाव भारत की तरफ कर रहा था? भारतीयता में निहित समग्रता और संतुलन की दृष्टि ही वह तत्व हैं जो जैक्सन का आकर्षित कर रहे थे। इसे पूर्व भी यह तत्व पश्चिमी चिंतकों को आकर्षित करती रही है। मानव प्रकृति की समग्र समझ तथा आदिम प्रवृत्तियों का रुपांतरण कर उनका उध्र्वगमन करने वाला भारतीय जीवनदर्शन एवं जीवनशैली पश्चिमी विचारकों को समय-समय पर आकर्षित करती रही है। भारतीय जीवनदर्शन और जीवनशैली का आधार व्यापक है। वैदिक ऋचाओं की उदात्त अभिव्यक्तियां, औपनिषदिक प्रश्नोत्तर में निहित व्यापक आध्यात्मिक ंिचंतन तथा षड्दर्शन वह मूलतत्व हैं, जिनसे भारतीय जनमानस को जीवनरस मिलता है। समाज सुधारकों और प्रकाण्ड विद्वानों की मनीषा ने इसको अधिक सुगठित बनाए रखने कालप्रवाह के साथ प्रासंगिक बनाए रखने वाले अनेक आयाम जोडे़ हैं। इसके कारण भारतीय जीवनशैली और जीवनदर्शन में सभी मानवीय प्रवृत्तियों को स्वीकार्यता प्रदान की गई है। अर्थ और काम के प्रति निषेध भाव नहीं है। परंतु इनकी सेवन और अभिव्यक्ति में धर्माधारित संतुलन की बात जरुर कही गयी है। पश्चिम अभी उपभोग को चरममूल्य मानने वाली जीवनशैली को अपनाए हुए है इसलिए वहां सुख एवं समृद्धि का संतुलन नही सध पा रहा है।
एजेंडा सेट करना मीडिया का काम माना जाता है। दुर्भाग्य से, मीडिया बाजारु मूल्यों को नैतिक मूल्यों के रुप में स्थापित करने के एजेंडे पर काम कर रहा है। बाजारु मूल्यों को नैतिक मूल्यों के रुप में स्थापित करने की प्रक्रिया पूरी दुनिया में एक भीषण सांस्कृतिक संहार को जन्म दे रही है। इसलिए इस प्रक्रिया पर समग्र चिंतन किया जाना मानव और मानवता दोनों के लिए आवश्यक है। चिंतन की यह प्रक्रिया जैक्सन के जरिए शुरु हो सकती है क्योंकि जैक्सन का जीवन और उनकी मौत बाजार के साथ संचार जगत को अपने मूल्यों के प्रति आत्मावलोकन का अवसर प्रदान करती है।
