सप्तसिंधु
पाकिस्तान के टूटने की कहानी भी है अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस
पाकिस्तान बनने की कहानी मजहबी है तो बांग्लादेश बनने की कहानी भाषायी है। इन दोनों कहानियों का निचोड़ यह है कि भाषायी प्रेम, मजहबी उन्माद पर भारी पड़ता है। पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश की बनने का संघर्ष मूलरूप से भाषायी आग्रह का संघर्ष है। ऐसे भाषा-प्रेमी युवाओं का संघर्ष है जो भाषा के लिए अपना सबकुछ दांव लगाने के लिए तत्पर हों। भाषा के प्रति यह आग्रह एक नए राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का आधार बना।
21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा तो 17 नवम्बर 1999 को हुई थी, लेकिन इसका नींव 21 फरवरी 1952 को पड़ गई थी, जब ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने उर्दू थोपने के विरोध में जबरदस्त आंदोलन किया था। दरअसल, पाकिस्तान ने 1948 में उर्दू को राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्वीकार किया तो पूर्वी पाकिस्तान में एक बेचैनी पनपी। जब पश्चिमी पाकिस्तान के हुक्मरानों द्वारा पूर्वी पाकिस्तान पर उर्दू थोपने के प्रयास तीव्रता से प्रारंभ हुए तो बांग्लाभाषियों के बेचैनी आक्रोश और आंदोलन में बदल गई ।
इस पूरे विवाद की शुरुआत पाकिस्तान की संविधान सभा की 23 फरवरी 1948 को आयोजित एक सत्र में पड़ी थी। इसमें यह प्रस्ताव रखा गया कि संविधान सभा के सदस्यों को या तो उर्दू में या फिर अंग्रेजी में बोलना पड़ेगा। इस पर ईस्ट पाकिस्तान कांग्रेस पार्टी के सदस्य धीरेन्द्रनाथ दत्त यह संशोधन प्रस्ताव ले कि आए बांग्ला को भी पाकिस्तानी संविधान सभा में एक भाषा के रूप में स्थान मिले। उनके इस प्रस्ताव का पकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान और पूर्वी बंगाल के मुख्यमंत्री ख्वाजा निजामुद्दीन ने विरोध किया। धीरेन्द्रनाथ दत्त के प्रस्ताव को अस्वीकार किए जाने की खबर से पूर्वी पाकिस्तान के विद्यार्थियों , बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों में आक्रोश की लहर फैल गई।
बांग्लाभाषा के लिए संघर्ष करने के लिए शम्सुल हक के नेतृत्व में एक समिति का गठन हुआ। समिति ने 11 मार्च 1948 को पूर्वी पाकिस्तान में हड़ताल की। शेख मुजीबुर्ररहमान ने इस आंदोलन के दौरान अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई। स्थिति हाथ से निकलती देख 19 मार्च 1948 को पाकिस्तान के तत्कालीन गवर्नर जनरल मुहम्मद अली जिन्ना ढाका आए, लेकिन उन्होंने बांग्लाभाषा को संविधान सभा तथा पूर्वी पाकिस्तान की राजकीय भाषा बनाने से इनकार कर दिया। इसके कारण पूर्वी पाकिस्तान में आक्रोश और बढ़ा।
11 मार्च 1950 को बांग्लाभाषा की पूर्वी पाकिस्तानी की राजकीय भाषा बनाने की मांग को लेकर ढाका विश्वविद्यालय में लैग्वेज एक्शन कमेटी का गठन हुआ। इसी बीच एककदम आगे बढ़ते हुए लैग्वेज एक्शन समिति ने 21 फरवरी 1952 को सम्पूर्ण पूर्वी पाकिस्तान में हड़ताल करने का निर्णय लिया। ढाका विश्वविद्यालय के असेम्बली हाल के तरफ बढ़ते विद्यार्थियों पर गोली चलाई, जिसमेें रफीकुद्दीन अहमद, अब्दुल जब्बार और अब्दुल बरकत बुरी तरह घायल हो गए। इस पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ 22 फरवरी 1952 को फिर से प्रदर्शन हुए। पुलिस और सेना की कार्रवाई में कई विद्यार्थियों की जान गई। 23 फरवरी 1952 को गोलीबारी के स्थल पर विद्यार्थियों ने एक स्मारक बना दिया, जिसे बाद में शहीद मिनार के नाम से जाना गया। बांग्लाभाषा का यह आंदोलन 1956 तक चला और पाकिस्तानी संविधान को बांग्ला और उर्दू को राजकीय भाषा के रूप में स्वीकृति देनी पड़ी।
बांग्लाभाषा को लेकर पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान में जो संघर्ष हुआ, वही आगे चलकर स्वतंत्र बांग्लादेश की आधारशिला बना। इस भाषायी आंदोलन के कारण ही मुस्लिम लीग से बांग्लाभाषी पूर्वी पाकिस्तान के लोगों का तेजी से मोहभंग होना प्रारंभ हुआ। प्रतिक्रियास्वरूप आवामी मुस्लिम लीग का गठन हुआ, जो आज आवामी लीग के नाम से जानी जाती है। यह पार्टी ही स्वतंत्र बांग्लादेश की सबसे मुखर आवाज बनी।
इस तरह अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पाकिस्तान के विखण्डन की कहानी भी है। यह पाकिस्तान द्वारा जबरन उर्दू थोपने से उपजे असंतोष और आंदोलन का इतिहास है। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस हमें कई भाषायी सबक दे जाता है। यह हमें स्मरण दिलाता है कि भाषा के प्रश्न को सर्वाधिक संवेदनशीलता के साथ हल किया जाना चाहिए। यह भी कि भाषा किसी व्यक्ति अथवा समाज की सबसे नजदीकी पहचान होती है। इसी कारण भाषायी आग्रह के सामने पांथिक पहचान भी हल्की पड़ जाती है।
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मजहबी उन्मादियों क लिए एक भाषायी सबक की तरह है। पाकिस्तान का विखण्डन उन मजहबी उन्मादियों के लिए एक संदेश की तरह है जो भाषायी पहचान के प्रश्न को दरकिनार कर देते हैं। एक राष्ट्र जो मजहबी नारों के साथ अस्तित्व में आया, वह भाषा के प्रश्न पर दो हिस्सों में टूट गया। इससे स्पष्ट है कि भाषा व्यक्ति का अंतरतम अंश है और अन्य पहचानें उसके बाद ही आती हैं।
आज जब अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है तो इसे कविता-कहानी या भावुक आग्रहों तक समेट कर रख दिया जाता है। जबकि भाषा का एक कठोर राजनीतिक-कूटनीतिक यथार्थ भी होता है। हायब्रिड वारफेयर के दौर में जब अपरम्परागत हथियारों के उपयोग का चलन बढ़ रहा है, तब भाषा के इस कठोर राजनीतिक यथार्थ को समझना और भी जरूरी हो गया है।