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सनातन का अमृत है ‘कुंभ’

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भारतीय मनीषा, परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है, कि अवधारणा से पूरी तरह सहमत नहीं है। वह इससे एक कदम आगे जाकर सातत्य के साथ परिवर्तन की अवधारणा में विश्वास करती है। परिवर्तन हवा में नहीं बल्कि सातत्य की आधारभूमि पर ही अवतरित होते हैं। इसके अलावा नए तत्वों के अवतरण को ही हम परिवर्तन नहीं मानते। इसमें रूपांतरण का आयाम भी शामिल है। जन्म-मरण और पुनर्जन्म के संदर्भों में तो परिवर्तन का मतलब ही रूपांतरण है। यह रूपांतरण शाश्वत तत्व का होता है,जो समय की मर्यादा के अनुरूप नया चोला धारण कर लेता है। आत्मा अमर है और शरीर बदलता रहता है। यह हमारी मान्यता है। यह मान्यता सातत्य के साथ परिवर्तन की अवधारणा को आध्यात्मिक पृष्ठभूमि उपलब्ध कराती है। लौकिक परिप्रेक्ष्य और राष्ट्रीय सामाजिक जीवन में भी इस मान्यता के कई उदाहरण आज भी हमको देखने को मिलते हैं। इसीकारण,हम सामयिक अभिव्यक्ति के साथ शाश्वत तत्वों की पहचान पर भी जोर देते हैं। जब शाश्वत प्रज्ञा और सामयिक बुद्धि का संतुलन सधता है तो सुंदरता का आविर्भाव होता है। महाकवि माघ ने सुंदरता को परिभाषित करते हुए कहा है कि-
क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैती
तदैव रूपं रमणीयताया।

यदि स्थिरता को धारण करने वाला कोई तत्व क्षण-क्षण में रूपांतरण करे,नया रूप धारण करे तो वहां रमणीकता पैदा हो जाती है,सुं्दरता पैदा हो जाती है। शाश्वत को पहचानकर उसको सामयिक अभिव्यक्ति प्रदान करना भारतीय संस्कृति की मूल विशेषता कही जा सकती है और कुंभ को इसी मान्यता की एक वृहद अभिव्यक्ति माना जा सकता है।

धर्म संसद का बारह-वर्षीय सत्र है कुंभ : पश्चिमी शिक्षा-व्यवस्था में पले-बढ़े अधिकांश बुद्धिजीवियों की मान्यता है कि लोकतंत्र में निहित विशेषताओं का विकास पश्चिमी देशों में हुआ है। यह वर्ग मानता है कि व्यवस्थागत मुद्दों में समाज की सहभागिता और सार्वजनिक चर्चा जैसी लोकतांत्रिक विशेषताओं का इतिहास दो सौ साल से अधिक पुराना नहीं है। परंतु यह अवधारणा सही नहीं है । भारत में लोकतांत्रिक परंपराएं लंबे समय से मौजूद रही हैं। यह अलग बात है कि यदि हम ब्रिटेन अथवा अमेरिका को केंद्र में रेखकर भारत का अध्ययन करेंगे तो ऐसी विशेषताओं की पहचान कर पाना मुश्किल होगा। पश्चिमी देशों में नीति-निर्माण की प्रक्रिया पूरी तरह राजसत्ता के हाथों में केंद्रित है। दूसरे,शब्दों में कहें तो वहां पर नीति-निर्माण की प्रक्रिया पर राजसत्ता का एकाधिकार है। भारत की व्यवस्थागत संरचना पश्चिमी दुनिया से अलग है। यहां पर नीति-निर्माण की प्रक्रिया बहुध्रवीय है। यह राज,समाज और धर्म में विकेंद्रित है। इन त्रिपुटी के सुंदर समन्वय से यह व्यवस्था संचालित होती है। राजदंड पर धर्मदंड के नियंत्रण की बात राज और धर्म के संतुलन की तरफ संकेत करता है। इसी तरह पंचायत प्रणाली लोकसत्ता औश्र राजसत्ता के संबंधों की तरफ संकेत करती है।

भारतीय व्यवस्था का सूक्ष्मतापूर्वक अवलोकन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्मतंत्र और राजतंत्र के बीच संवाद के अवसरों की बहुलता है। इसी तरह राजतंत्र और समाजतंत्र के बीच संवाद के अवसर भी बन जाते हैं लेकिन धर्मतंत्र और समाजतंत्र के बीच संवाद के अवसरों की संभावना स्वाभाविक रूप से नहीं बन पाती । उनका सृजन करना पड़ता है। धर्म और समाज के बीच एक नियमित अंतराल पर संवाद का सृजन हो सके ,इसके लिए ही कुंभ जैसे आयोजन अस्तित्व में आए। कुंभ समाज और धर्म के बीच संवाद का एक वृहद प्लेटफार्म है।

कुंभ की व्यवस्थागत व्याख्या: भारतीय चिंतन सदैव से लोक और वेद के संतुलन पर जोर देता है। कुछ लोग इसी विशेषता को ऋषि और कृषि परंपरा के संतुलन के रूप में परिभाषित करते हैं। समय के कारण हो रहे बदलावों को समाज अपने ढंग से महसूस करता है और आदर्श की मर्यादाओं में रहकर नए बदलावों के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश करता है। परिवर्तन की बयार मर्यादा के स्तंभों को धाराशायी न कर दे, इसके लिए समाज लगभग एकदशक में कुछ सूत्रों की तलाश कर लेता है और यह चाहता है कि व्यवस्था में उनको स्थान मिले। हालांकि ये सूत्र अभिव्यक्ति के लिहाज से अनगढ़ होते हैं और कुछ हद तक अपरिष्कृत भी। लेकिन ये व्यवहारिक दृष्टि से अधिक सक्षम भी होते हैं। इन सूत्रों और समाधानों की खूबसूरती यह है कि इनकी रचना दैनिक जीवन के झंझावातों में स्वाभाविक रूप से सृजित होते हैं। ऐसे सूत्र एकांत में पैदा होने वाले एकांगी सूत्र नहीं होते बल्कि जीवन की धूप-छाव में ,दु:ख-सुख में,उतार-चढ़ाव में पैदा होते हैं। शायद इसीलिए इनमें व्यवस्था को ठीक रास्ते पर रखने की क्षमता अधिक होती है।

धर्मसत्ता का तो ध्येय ही है-आत्मनोमोक्षार्थ जगत् हिताय च। आत्म मुक्ति का रास्ता सामाजिक कल्याण से पृथक नहीं है। इसीलिए,धर्मसत्ता की भी सामाजिक बदलावों पर बड़ी गहरी नजर होती है। वह एक परिदृश्य में हो रहे बदलावों का विश£ेषण करने में सक्षम होते है और राजसत्ता जिस शब्दावली और मुहावरों को समझती है,उनमें ही नए बदलावों को अभिव्यक्त भी कर सकती है। धर्मसत्ता का चिंतन लोकसत्ता की अपेक्षा अधिक उदात्त और आदर्शवादी होता है। इस परिप्रेक्ष्य में यह आवश्यक हो जाता है कि धर्मसत्ता और लोकसत्ता एकदशकीय संगम हो। ताकि यथार्थ और आदर्श का सम्मिलन हो सके। अपरिष्कृत विचारों को सुघड़ अभिव्यक्ति मिल सके। लोकसत्ता ,धर्मसत्ता के आकाश में उड़ान भर सके और धर्मसत्ता,लोकसत्ता की खुरदुरी जमीन पर चलने के कटु अनुभव से वाकिफ हो सके । एक संतुलित और समग्र विधायन के लिए धर्मसत्ता और लोकसत्ता का संगम आवश्यक है। कुंभ को एक ऐसा ही संगम माना जा सकता है।कुंभ की इस तरह की व्यवस्थागत व्याख्या परंपरा के आग्रही और आधुनिकता के दुराग्रही,दोनों को अजीब लग सकती है। यह तर्क दिया जा सकता है कि कुंभ का सम्बंध तो समुद्र मंथन और उससे उपजे अमृतकलश से है। यह भी कहा जा सकता है कि कुंभ का आयोजन ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित है। आधुनिकतावादी यह तर्क दे सकते हैं कि इतनी बारीक व्यवस्थागत समझ और उसके संस्थानीकरण की क्षमता भारत के पास कभी भी नहीं रही। कुंभ तो अंधविश्वास का महामेला है। इन प्रश्रों के बीच पूरी विनम्रता से यह प्रश्र भी पूछा जाना चाहिए कि क्या सैकड़ों सालों के प्रयास के बिना इस तरह के आयोजन अस्तित्व में आ सकते है? एक ऐसा आयोजन जिसकी पहुंच निरक्षर,गरीब और दुर्गम इलाकों तक है। कुंभ जैसे जटिल और वृहद आयोजन को किसी एक खांचे में रखकर व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। फिर भी,एक ऐसे दौर में जब युवा पीढ़ी अपनी पहचान को नए सिरे से खोजने का प्रयास कर रही है,कुंभ पर भी नई चर्चा शुरू होनी चाहिए।

अमृतकलश के अस्तित्व की खोज तभी सार्थक होगी जब यह भारतीय परिप्रेक्ष्य में,भारतीय दृष्टि से और भारतीय शब्दावली में की जाए। पश्चिम अगर कुंभ की जड़ों को खोजने चलेगा तो परिणाम अनर्थकारी होंगे। उसके पास वह दृष्टि ही नहीं है जो इसकी व्याख्या कर सके। वह तो कुंभ को आर्थिक परिप्रेक्ष्य में ही व्याख्यायित करने की कुशलता रखता है। यही उसकी सीमा भी है। कितने लोग आए,कितने लोग गए,कितने का सामान बिका,सरकार ने कितना खर्च किया,पुलिस-प्रशासन की व्यवस्था कैसी रही,इस नजरिए से कुंभ की व्याख्या पश्चिम कर सकता है और कर भी रहा है। दुर्भाग्य से मीडिया भी अपनी व्याख्याएं इसी तर्ज पर कर रहा है। कुंभ की व्याख्या व्यवस्थागत और सांस्कृतिक नजरिए से कोई कोशिश हो रही हो ,ऐसा नहीं दिखाई देता।भारतीय दृष्टि से होने वाली व्याख्या हिसाब-किताब से आगे की व्याख्या होगी। हमारी व्याख्या के केंद्र में यह होना चाहिए कि कैसे बिना-बुलावे के लाखों-करोड़ों लोग आते हैं? कैसे भारतीय समाज में गहरे तक जड़ जमा चुकी जातिवादी व्यवस्था संगमतट और अन्यकुंभों में पहुंचकर दम तोड़ देती है। वह क्या कारण है जिसके कारण लाखों लोग कंपकंपाती ढंठ में अपनी छोटी गठरी लेकर साधुओं का सान्निध्य के जरिए पुण्य कमाने पहुंच जाते हैं? क्या कुंभ भारतीय समाज को एकसूत्र में बांधे रखने में अहम भूमिका निभाता है अथवा निभा रहा है? और क्या कुंभ के जरिए उन प्रतीकों और मान्यताओं को पुनर्जीवन मिलता है,जिन्हें हम भारतीय संस्कृति का आधार कहते हैं। पिछले दो दशकों से भारतीय लोकअनुभवों के जरिए जलसंरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय राजेंद्र सिंह कुंभ के आयोजन को एक नए परिप्रेक्ष्य से जोड़ते हैं। उनका मानना है कि कुंभ समाज को नदियों के प्रति संवेदनशील बनाता है,आस्थावान बनाता है। यह लोकसंवेदना नदियों को सदानीरा और स्वच्छ बनाए रखती है। कुंभ के जरिए भारतीय समाज जल संपदा के प्रति संवेदनशील बना रहता है। राजेंद्र सिंह की अवधारणा में सत्य का कितना पुट है,इसको लेकर बहस की जा सकती है। लेकिन यह हमको कुंभ की व्याख्या का एक नया और मौलिक भारतीय परिप्रेक्ष्य जरूर उपलब्ध कराता है।

भारत को भारतीय दृष्टि से समझना और समझाना समय की सबसे बड़ी मांग है। यदि एक राष्ट्र के रूप में हम अपने अस्तित्व को अपनी दृष्टि और अपनी भाषा में समझने में सफल हो जाते हैं तो सदियों की गुलामी से हमारे भीतर पनपी आत्महीनता की ग्रंथि का अपने आप उच्छेदन हो जाएगा। कुंभ जैसे वृहत्तर आयोजन के जरिए हम स्वयं को नए सिरे से समझने की प्रक्रिया की शुरूआत कर सकते हैं। यह शुरूआत राष्ट्र और समाज जीवन के अन्य तत्वों को भी मौलिक भारतीय दृष्टि से समझने के लिए प्रेरित करेगी। इसके जरिए हमारे सनातन पुण्यप्रवाह को अमृत की कुछ नई बूंदे मिल सकेंगी।

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कश्मीरी हिंदुओं के विस्थापन पर मीडिया की चुप्पी उस पर सबसे बड़ा प्रश्न भी है

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जनवरी 1990 में हुए हिंदू जनसंहार को लेकर मीडिया की चुप्पी पर पहले भी प्रश्न उठते रहे हैं। ‘द कश्मीर फाइल्स’ ने मीडिया की भूमिका को लेकर बेबाक टिप्पणियां की गई है, जिससे मीडिया की चयनित चुप्पी का प्रश्न फिर से केन्द्र में आ गया है। लाखों लोगों पर हुए अमानवीय अत्याचार के नगण्य मीडिया कवरेज से विश्वसनीयता का संकट तो पैदा ही हुआ है, सामाजिक-विक्षोभ की भी स्थिति भी पैदा हुई है।
उस दौर के घटनाक्रम पर नजर डालने से यह स्पष्ट होता है कि मीडिया कवरेज न होने पीछे पांथिक और वैचारिक पूर्वाग्रह तो कार्य कर ही रहे थे। ऐसे भी कई उदाहरण मिलते हैं, जिससे यह स्थापित है कि स्थानीय मीडिया आतंकवादियों का सहयोग कर रहा था।
4 जनवरी 1990 को कश्मीर के स्थानीय उर्दू समाचार पत्र आफताब में हिज्बुल मुजाहिदीन की एक प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित की, जिसमें स्थानीय पंडितों से घाटी खाली करने की छोडने का निर्देश दिया गया था। इस प्रेस विज्ञप्ति में कश्मीरियों से वह भारत के खिलाफ जिहाद करने की अपील भी की गई थी । दो महीने बाद में स्थानीय उर्दू अखबार अलसफा में भी ऐसी चेतावनी प्रकाशित की गई। इसके कारण घाटी में भय की स्थिति पैदा हुई और हिंदुओं ने पलायन करना शुरू कर दिया।
एकतरफ आतंकवादी मीडिया का उपयोग अपने हितों के लिए कर रहे थे तो दूसरी तरफ इस बात के लिए सुनियोजित तरीके से प्रयास कर रहे थे कि इस अमानवीय अत्याचार की खबरें घाटी से बाहर न जाएं। इसके लिए चुन-चुनकर पत्रकारों को निशाना बनाया गया। पत्रकार-हत्याओं की जरिए उस समय ऐसा माहौल बना दिया गया था कि स्थानीय पत्रकारों ने चुप्पी साध ली।
19 जनवरी 1990 से लगभग दो साल पहले 27 दिसम्बर 1987 को प्रसिद्ध पत्रकार और वकील प्रेमनाथ भट््ट की आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी। इसे आतंकवादियों द्वारा पत्रकारों में भय पैदा करने की पहली बडी कोशिश के रूप में देखा गया। 13 फरवरी 1990 को दूरदर्शन के कश्मीर केन्द्र के निदेशक लास्सा कौल की आतंकवादियों ने उनके घर के सामने गोली मारकर हत्या कर दी। लास्सा कौल के नेतृृत्व में दूरदर्शन द्वारा जा रही कवरेज आतंकवादियों को नागवार गुजर रही थी। इसके कारण कश्मीर में दूरदर्शन का प्रसारण अगले कुछ सालों तक प्रभावित रहा। 01 मार्च 1990 को  जम्मू-कश्मीर सरकार में सहायक निदेशक, सूचना पी.एन.हंडू की आतंकवादियों ने उस समय हत्या कर दी थी, जब वह अपने घर से कार्यालय जाने की तैयारी कर रहे थे।
इन हत्याओं के कारण निष्पक्ष स्थानीय मीडिया और पत्रकारों में भय का माहौल पैदा हो गया। मुख्यधारा की मीडिया भी जिन पत्रकारों पर निर्भर थी, वे मुख्यतः घाटी से ही थे।  भयभीत स्थानीय पत्रकारों द्वारा इस जनसंहार की कवरेज न होने से यह परिघटना राष्ट्रीय स्तर पर विमर्श का विषय नहीं बन सकी।

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राधेश्याम खेमका: जिन्होंने बताया कि संपादन सबसे बड़ा सांस्कृतिक कर्म है

वह जानते थे कि गीता प्रेस गोरखपुर में किसी एक अशुद्धि का जाने का आशय क्या है? करोड़ों घरों में गीता-प्रेस की पुस्तकों से ही नित्य पूजा पाठ होता है। मठ-मंदिरों में स्वाध्याय का आधार गीताप्रेस गोरखपुर ही है। कथा-सत्संग में भी व्यासपीठ पर गीता-प्रेस की पुस्तक ही विराजमान होती है।

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वह निरंतर 60 वर्षों से प्रयागराज में कल्पवास कर रहे थे। पिछले कई दशकों से गंगाजल ही पीते थे। दिन में केवल दो बार अन्न ग्रहण करते थे। यह जीवनशैली किसी सम्पादन कार्य में लगे व्यक्ति की बिलकुल भी नहीं लगती। किसी साधु-संत की लगती है। राधेश्याम खेमका की सधुक्कडी जीवनशैली के साथ लगभग चार दशकों से कल्याण का सम्पादन कार्य कर रहे थे। इस मनोदशा और जीवनशैली के कारण ही सम्पादन में शुद्धता और संकल्पना को वह स्तर प्राप्त कर सके, जो भारतीय परम्परा पर भाष्य करने के लिए आवश्यक होती है।
आज जब आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है और डिकोलोनाइजेशन पर बड़े जोरो-शोरों से चर्चा चल रही है, तब राधेश्याम खेमका का स्मरण और भी जरूरी हो जाता है। राधेश्याम खेमका इस तथ्य की तरफ संकेत कर जाते हैं कि भारतीय जीवनशैली अपनाए बिना डिकोलोनाइजेशन का कार्य आगे नहीं बढ़ सकता। एक विशिष्ट जीवनशैली को अपनाने के बाद  ही भारतीय परम्पराओं और मान्यताओं को ठीक ढंग से समझा जा सकता है।
राधेश्याम खेमका उस परम्परागत भारतीय मानस के भी प्रतिनिधि थे, जो कार्यसिद्धि के लिए साधन से अधिक साधना को महत्व देता है। यह मानस इस बात में विश्वास करता है कि कार्य की सिद्धि के लिए एक विशिष्ट मनोदशा की आवश्यकता होती है। यदि साधना के जरिए वह मनोदशा सध जाए तो कार्य के लिए आवश्यक संसाधन और संयोग अपने आप बन जाते है। एक ऐसे दौर में जब जब संसाधन, तकनीक, उपकरण कार्यसिद्धि के पर्याय लिए गए हों, तब राधेश्याम खेमका साधना की भारतीय परम्परा और उसकी सफलता के प्रतीक के रूप में हमारे सामने आते हैं।
वह लगभग चार दशकों तक कल्याण पत्रिका के अवैतनिक सम्पादक रहे। आध्यात्मिक जगत में कल्याण के विशेषांकों का संग्रहणीय साहित्य के रूप में प्रतिष्ठित स्थान है। प्रतिवर्ष जनवरी माह में साधकों के लिये उपयोगी किसी आध्यात्मिक विषय पर केंद्रित विशेषांक प्रकाशित होता है। शेष ग्यारह महीनों में प्रतिमाह पत्रिका प्रकाशित होती है। खेमका जी  के संपादकत्व में गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा कल्याण के 460 सामान्य अंकों और 40 विशेषांकों का सम्पादन हुआ।
उनके सम्पादकत्व में निकले कल्याण के विशेषांकों पर दृष्टि डालें तो विषयों की विस्तार की अनुभूति स्वयं ही हो जाती है।  श्रीवामन पुराण अंक, चरित्रनिर्माण अंक, श्रीमत्स्य पुराण अंक (पूर्वार्ध), श्रीमत्स्य पुराण अंक (उत्तरार्ध), संकीर्तन अंक, शक्ति उपासना अंक, शिक्षा अंक, पुराणकथा अंक, देवता अंक, योगतत्वांक, संक्षिप्त भविष्य पुराण अंक, श्रीराम भक्ति अंक, गो सेवा अंक, धर्मशास्त्र अंक, कूर्मपुराण अंक, भगलल्लीला अंक, वेद कथांक, संक्षिप्त गरुड़ पुराण अंक, आरोग्य अंक, नितिसार अंक, भगवत प्रेम अंक, व्रतपर्वाेत्सव अंक, देवीपुराण (शक्तिपीठांक), अवतार कथा अंक, संस्कार अंक, श्रीमद्देवी भागवत अंक (पूर्वार्ध), श्रीमद्देवी भागवत अंक (उत्तरार्ध), जीवनचर्या अंक, दानमहिमा अंक, श्रीलिंग महापुराण अंक, भक्तमाल अंक, ज्योतितत्वांक, सेवा अंक, गङ्गा अंक, शिव महापुराण अंक (पूर्वार्ध), शिव महापुराण (उत्तरार्ध), श्रीराधा माधव अंक, बोधकथा अंक, श्री गणेश पुराण अंक का प्रकाशन उनके सम्पादकत्व में हुआ। उन्होंने अपने सम्पादकत्व में कल्याण के विशेषांक के लिए एक तरफ ऐसे ग्रथों का  प्रकाशन किया जो अप्राप्य और दुर्लभ माने जाते थे। दूसरी तरफ भारतीय संस्कृति की आधारभूत मान्यताओं और मानदंडों पर कल्याण के विशेषांकों का प्रकाशन कर सांस्कृतिक सातत्य को बनाए रखने में अभूतपूर्व योगदान दिया।
हनुमानप्रसाद पोद्दार ने अपने संपादकत्व में गीता-प्रेस में व्याकरणीय शुद्धता और संकल्पनात्मक श्रेष्ठता के जो उच्च मानदंड स्थापित किए थे, राधेश्याम खेमका ने न केवल उन्हें बनाए रखा, बल्कि आगे भी बढ़ाया। वह यह कार्य इसीलिए कर सके क्योंकि उन्होंने सम्पादन को प्रूफ संसोधन या नई संकल्पनाओं पर कार्य भर नहीं माना, उनके लिए सम्पादन इक धार्मिक और सांस्कृतिक कार्य था।
वह जानते थे कि गीता प्रेस गोरखपुर में किसी एक अशुद्धि का जाने का आशय क्या है? करोड़ों घरों में गीता-प्रेस की पुस्तकों से ही नित्य पूजा पाठ होता है। मठ-मंदिरों में स्वाध्याय का आधार गीताप्रेस गोरखपुर ही है। कथा-सत्संग में भी व्यासपीठ पर गीता-प्रेस की पुस्तक ही विराजमान होती है। अकादमिक स्तर पर भारत आर भारतीयता को लेकर जो नया उल्लास पैदा हुआ है, उसके लिए भी प्राथमिक और सुलभ संदर्भग्रंथ गीता-प्रेस से प्रकाशित पुस्तके और कल्याण के विशेषांक ही हैं। और इन सभी स्थानों पर गीता-प्रेस की पुस्तकों का पाठ इसी भावना के साथ किया जाता है कि इस पुस्तक में अशुद्धि नहीं हो सकती।
ऐसे में एक त्रुटि एक अशुद्धि का अर्थ लाखों अनुष्ठानों का भंग करना और करोड़ों व्रतों को खंडित करना था। राधेश्याम खेमका ने लगभग चार दशकों तक इस वृहत्तर भार को अपने उठाए रखा। उन्होंने यह समझ लिया था कि सम्पादन को यदि धार्मिक और सांस्कृतिक कर्म के रूप में किया जाए तो अशुद्धता के लिए स्थान कम हो जाता है। और सम्पादन धार्मिक और सांस्कृतिक कर्म तभी बन सकता है, जब जीवनशैली को भी धार्मिक और सांस्कृतिक बनाया जाए।
गीता-प्रेस गोरखपुर और कल्याण पत्रिका का संचालन एक धार्मिक अनुष्ठान की तरह हुआ है। राधेश्याम खेमका को पद्म विभूषण सस्कृति संरक्षण और संवर्द्धन के मूक महाअभियान को प्रारंभिक स्वीकृति देने जैसा है। व्यापक आकलन तक आने वाली पीढ़ियां ही कर सकेंगी।

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नए ‘कुरुक्षेत्र’ का परिचय

सूचनात्मक-संकल्पनात्मक स्तर पर लड़े जा रहे वर्तमान सभ्यतागत-संघर्ष में मीडिया-अकादमिक जगत केंद्रीय भूमिका में हैं। मीडिया और अकादमिक का गठजोड़ सबसे घातक हथियार है और संघर्ष का बड़ा मोर्चा भी।

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वास्तविक शत्रु, शस्त्र और मोर्चे की पहचान पर ही किसी संघर्ष का परिणाम सबसे अधिक निर्भर करता है। संघर्षों के दौरान बहुत से अन्य कारक भी परिणाम को प्रभावित करते हैं, लेकिन यदि कोई पक्ष शत्रु में मित्र और मित्र में शत्रु देखने के भ्रम का शिकार हो जाए या शत्रुता को लेकर ऊहापोह की स्थिति में आ जाए तो उस पक्ष का पराजित होना तय है। यह मनोदशा आत्मघात सरीखी स्थिति को जन्म देती है। इसी तरह संघर्ष के दौरान शत्रु पक्ष की रणनीति को मूर्त रूप देने वाले मोर्चों और प्रभावी हथियारों की पहचान भी अहम रणनीतिक जिम्मेदारी होती है। मोर्चे के महत्व के अनुरूप शक्ति के समानुपातिक सदुपयोग की कला सजगता से ही आती है।

दुर्भाग्यवश, सभ्यतागत-संघर्ष की वर्तमान विश्वव्यवस्था में हिंदू-धर्म शत्रु, शस्त्र और मोर्चों को लेकर भ्रम की स्थिति में है। अंतिम पैगंबर की अवधारणा पर आधारित पंथों की एकमात्र सत्य होने के दुराग्रह के कारण हिंदू धर्म की समावेशी प्रकृति को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है। एक तरफ यह कट्टरता है कि जो हमसे इतर है, वह झूठ है और उसे रहने का अधिकार नहीं है। दूसरी तरफ सभी पंथों को एक ही पलडे़ पर तोलने की अतिशय उदारता। यह विरोधाभासी स्थिति हिंदू-धर्म के समक्ष पिछले हजार सालों से चुनौतियां पैदा कर रही है और यह दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही है।

सूचनात्मक-संकल्पनात्मक स्तर पर लड़े जा रहे वर्तमान सभ्यतागत-संघर्ष में मीडिया-अकादमिक जगत केंद्रीय भूमिका में हैं। मीडिया और अकादमिक का गठजोड़ सबसे घातक हथियार है और संघर्ष का बड़ा मोर्चा भी। इस मोर्चे पर हिन्दू धर्म की दयनीय उपस्थिति उसे कुव्याख्याओं के लिए सुभेद्य बना देती है। मीडिया और अकादमिक जगत में हिंदू धर्म की कुव्याख्याओं की पीड़ा से उपजी किताब है रीआर्मिंग-हिंदुइज्म। नाम से ऐसा प्रतीत होता है कि यह कोई उत्तेजक और आक्रामक किताब है, लेकिन इसकी अंतर्वस्तु बताती है कि सबसे प्रभावी हथियार से लैस होने और सबसे निर्णायक मोर्चे पर डटने की भारतीयों से की गई अपील है।

लेखक इस मूल मान्यता को लेकर आगे बढ़ता है कि शोध, सूचना और संवाद कभी हिंदू धर्म की मूल शक्ति रहे हैं, पिछली कुछ शताब्दियों में यह परम्परा क्षीण हुई है। किताब के पहले हिस्से में उन सभी अकादमिक मिथकों की पहचान की गई है, जिनके जरिए हिंदू धर्म पर हमला किया जाता है मसलन-आर्य-आक्रमण का मिथक, वैदिक-हिंसा का मिथक, वैकल्पिक इतिहास का मिथक। दूसरे हिस्से में सनातन दर्शन के विविध आयामों को स्पर्श किया गया है और निष्कर्ष भारत की नियति, जगत गुरु के रूप में उसकी भूमिका को रेखांकित किया गया है।
लेखक इस तथ्य को मजबूती से स्थापित करता है कि हिंदू-धर्म के खिलाफ प्रतिस्पर्धी पक्ष आपस में हाथ मिलाकर आक्रमण करते हैं। इस्लाम और ईसाइयत एकजुट होकर हमला करते हैं, यूरोप और अमेरिका में वाम और दक्षिण मिलकर हिन्दू धर्म को निशाना बनाते हैं। रीआर्मिंग हिंदुइज्म इस बात से हमें सचेत करती है कि भारतीय सभ्यता पर हमलों को व्यक्तिगत पूर्वाग्रह मानने के प्रति सचेत करती है।‘ सबसे पहले हमें इस सच को स्वीकार करना चाहिए कि हिंदूफोबिया व्यक्तिगत पूर्वाग्रह नहीं है। यह एक बड़ी और गहरी राजनीतिक सच्चाई से उपजी अकादमिक रचना है। ( पृष्ठ 31)
पुस्तक की एक प्रमुख खूबी इसका संस्कृतिमय और संस्कृतमय होना है। किताब का पहले भाग का नाम देश-काल दोष है। पहले अध्याय का नाम अकादमिक माया सभा है। अंग्रेजी किताब में संस्कृत शब्दों और भारतीय संकल्पनाओं का विनियोग किताब को अलहदा बनाता है। इससे भी बड़ी बात भारतीय मानस पर किताब में स्थान-स्थान पर की गई अंतःदृष्टिपूर्ण की गई टिप्पणियां हैं। रामायण, महाभारत और पुराण हमारे लिए भूतकाल से संबंधित किताबें नहीं हैं, बल्कि शाश्वत, जीवंत सांस्कृतिक संसाधन हैं। ( पृष्ठ 144) अवतारों के जीवन में घटित त्याग-तपस्या को रेखांकित करने की शैली बहुत अनूठी है-राम और कृष्ण, महानतम, सर्वाधिक लोकप्रिय अवतार हैं। दोनों को वनवास झेलना पड़ा। एक को राज्याभिषेक से ठीक पहले और दूसरे को जन्म लेते ही। ( पृष्ठ 156)। इसी तरह भारतीयों की देव-विविधता संबंधी संकल्पना की लेखक अलग ही धरातल पर आकर्षक किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मीडिया के अध्यापन से जुड़े एक प्रोफेसर ने भारतीय मीडिया की सभ्यतागत संघर्ष में भूमिका को इस किताब के जरिए रेखांकित किया है। साथ ही भारतीय दृष्टि से वैश्विक अकादमिक-मीडिया के गठजोड़ का मूल्यांकन किया है। अन्यथा अभी तक तो पश्चिमी मीडिया को आदर्श मानकर उसकी शब्दावली और नैरेटिव्स के अनुकरण का ही चलन रहा है। हां, कहीं-कहीं पर यह जरूर लगता है कि नई संकल्पनाओं को गढ़ने के बाद उनका उतनी गहराई से विश्लेषण नहीं किया गया है, जितना अपेक्षित है।
पुस्तक एक नया भारतीय परिप्रेक्ष्य रचने और समझने में सहायक है। पुस्तक का हिंदी संस्करण किताब को उसके लक्षित समूह तक पहुंचाने में सहायक होगा ही, भारत में चल रहे विमर्शों में कुछ नए सकारात्मक आयाम जोड़ने के लिए भी आवश्यक है।

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