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मंगलसंवाद का अमृतकलश
सत्यव्रतियों के लिए भारतीय संस्कृति का घोष वाक्य वादे वादे जायते तत्वबोध:है। संवाद से ही सत्य की उपलब्धि होती है। आप अध्यात्म के सूत्रों को पहचान करना चाहते हैं अथवा एक बेहतर व्यवस्था का निर्माण करना चाहते हैं,इसके लिए संवाद से बढ़कर कोई मानवीय और समग्र तरीका नहीं हो सकता। संवाद की अवधारणा के आधार पर ही लोकतांत्रिक मूल्य पनपते हैं और लोकतांत्रिक लोकमानस भी बनता है। किसी भी समस्या से जुड़े सभी पक्षों की पहचान और समाधान के लिए अधिकतम् सुझाव, संवाद की प्रक्रिया के द्वारा ही प्राप्त हो सकते हैं।
संवाद की अतिशय महत्ता को ध्यान में रखकर ही शायद इसे धार्मिक पवित्रता की परिधि में प्रस्तुत किया जाता है। किसी के मत को खत्म करने के लिए शस्त्र उठाने की परंपरा हमारे यहां कभी भी नहीं रही। संवाद के ही एक अपेक्षाकृत अधिक परिष्कृत रूप-शास्त्रार्थ के जरिए हमने असत्य धारणाओं का खंडन किया,मिथ्याचारी लोगों को जमींदोज किया। अद्वैत का परचम लहराने के लिए शंकराचार्य ने किसी विरोधी का सिर उसके धड़ से अलग नहीं किया था। सनातन परंपरा के सामने खड़ी तमाम चुनौतियों को ध्वस्त करने के लिए उन्होंने शास्त्रार्थ का सहारा लिया। शास्त्रार्थ के जरिए ही उन्होंने भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन को अमृत की कुछ बंूदे पिलाईं और सभी विजातीय तत्वों से लडऩे के योग्य बनाया।
अब यहां पर एक प्रश्र का उठना बहुत स्वाभाविक है,वह यह कि क्या भारत में संवाद की प्रक्रिया को सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में स्थापित करने के लिए कुछ प्रयास किए गए अथवा नहीं। दुनिया के अधिकांश हिस्सों में यह देखा गया है कि बौद्धिक जगत और आमजगत के मूल्यों में काफी भिन्नता होती है। यह भिन्नता राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों के अलावा सांस्कृतिक संदर्भों में भी देखने को मिलती है। एक ही समाज के इन दो घटकों में मूल्यों और मान्यताओं का एक स्पष्ट विभाजन सर्वत्र स्वयमेव दिखाई पड़ जाता है।
संवाद की प्रक्रिया के प्रति भारतीय आस्था की पड़ताल के लिए बौद्धिक परिवेश और आम समाज के बीच उपस्थित संवादसेतु की पहचान आवश्यक है। संवाद के विचार के संस्थानीकरण के लिए किए गए प्रयासों को चिंहित करना होगा। संवाद के ऐसे वृहदतर प्लेटफार्म के मूल स्वरूप को पहचानना होगा जहां पर व्यवस्था के सभी घटक एकत्रित होकर संवाद करते रहे हैं।
वैश्वीकरण की प्रक्रिया के बाद व्यवस्थागत घटकों के एकत्रीकरण का प्रश्र और महत्वपूर्ण हो गया है। इस प्रक्रिया के कारण राज और समाज के बीच की खाईं अधिक चौड़ी हो गई है। समाज आज भी परंपराओं की गठरी को लादे सहज और स्वाभाविक दिशा में चलने के प्रति आस्थावान है और सांस्कृतिक दृष्टि से निरक्षर नीति-नियंता उसे स्ट्रक्चरल एडजस्टमेंट प्रोग्राम के तहत आयातित होने वाली नीतियों के खांचे में फिट करना चाहते हैं। दुर्भाग्य यह है कि इन दोनों पक्षों के बीच संवाद स्थापित करने के परंपरागत प्लेटफार्म समाप्त हो गए है और ऐसे नए प्लेटफार्म का सृजन नहीं हो पा रहा है जहां राज और समाज एक दूसरे से संवाद स्थापित कर सकें। किसी रामकथा, किसी धार्मिक आयोजन अथवा पारंपरिक आयोजनों में ये दोनों पक्ष सहभागी तो होते हैं लेकिन उनका समागम नहीं हो पाता। दरी और कुर्सी का फर्क साफ देखा जा सकता है। कुर्सी और दरी के भाव अलग होते हैं,भाषाएं अलग होती है और इसी कारण दोनों के बीच संवाद की संभावनाओं का सृजन नहीं हो पाता। इसके कारण व्यवस्था के घटकों के बीच एक कम्युनिकेशन गैप की स्थिति बन गई है।
संवादहीनता की इस स्थिति में कुंभ जैसे आयोजनों के मूलभाव को पुनरूज्जीवित किया जाना बहुत आवश्यक हो जाता है क्योंकि कुंभ व्यवस्थागत घटकों के बीच संवाद का एक वृहद पारंपरिक प्लेटफार्म रहा है। इस बिंदु पर कुंभ के मूलस्वरूप को लेकर प्रश्र उठना स्वाभाविक है। साथ ही इस बिंदु पर विचार किया जाना आवश्यक हो जाता है कि क्या कुभ के मूलस्वरूप को आज भी ज्यों का त्यों अपनाया जा सकता है या नहीं। यदि नहीं तो कुंभ मूलभाव का अक्षत बनाए रखते हुए उसके स्वरूप को समसामयिक कैसे किया जा सकता है?पौराणिक कहानियों के अनुसार कुंभ के आयोजन का समुद्र मंथन की प्रक्रिया से उत्पन्न अमृतकलश से है। समुद्र मंथन के कारण जिन चौदह रत्नों की समुद्र से उत्पत्ति होती है,उसमें अमृतकलश भी शामिल था। अमृतकलश पर आधिपत्य जमाने के लिए जो भागदौड़ और एक दूसरे को छकाने को खेल शुरू हुआ,उसके कारण कुछ बूंदे जमीन पर छलक पड़ी थीं। जहां-जहां पर ये अमृत बूंदे छलकी थीं वहां-वहां पर कुंभ के आयोजनहोने लगे। समुद्र मंथन की प्रक्रिया में अपने परंपरागत मतभेदों को भुलाकर देव और दानवों ने सहभागिता की थी और इनसे उपजे रत्नों में हलाहल विष भी शामिल था। यदि समुद्र मंथन की प्रक्रिया को एक मिथक मानकर,संवाद और व्यवस्था के संदर्भों में हम इसकी व्याख्या करें तो इसके कई पुरातन और सनातन अर्थ निक ल सकते हैं। समुद्र मंथन की प्रक्रिया हमारे सामने दो असुविधाजन तथ्यों को उजागर करती है। पहला यह कि संवाद एकरस नहीं होता। एक ही मान्यताओं को मानने वाले लोगों के बीच संवाद से अधिक समर्थन होता है। संवाद की प्रक्रिया अधिक कष्टसाध्य होती है। यह अपने अहं और मूढ़ता को दरकिनार करते हुए दूसरे को समझने और सहने की प्रक्रिया है। दूसरा यह कि एकरसीय संवाद प्रक्रिया के परिणाम भी बहुत सीमित दायरे में रहते हैं। विरोधाभास व्यक्ति को एक व्यापक फलक पर आरूढ़ करते हैं और विरोधाभासों की उपस्थिति संवाद के जरिए सत्य के वृहत्तर आयामों को साधने की कोशिश की जाती है। इन वृहत्तर आयामों के साधने की प्रक्रिया में कई बार बहुत कुछ अशुभ भी घटित होता है। समुद्र मंथन की प्रक्रिया में देव-दानव दोनों का शामिल होना और अमृत के साथ हलाहल की उत्पत्ति संवाद के इसी मूलचरित्र की तरफ संकेत करती है।
अमृत और अमरता का भी कुंभ से गहरा संबंध है। साधारणतया अमृत से एक ऐसे पदार्थ का आशय निकाला जाता है,जिसको ग्रहण करने के बाद हम कालवाह्य हो जाते हैं,कालातीत हो जाते हैं,काल के गुणधर्म से परे हो जाते हैं। अस्तित्व का विस्तार त्रिकाल में हो जाता है। लेकिन यह अमृत और अमरत्व की बहुत रूढ़ व्याख्या है। रूपांतरण की प्रक्रिया के जरिए अपने अस्तित्व को बनाए रखना भी एक प्रकार का अमरत्व है। भारतीय संस्कृति का अमरत्व कुछ इसी प्रकार का है। सामयिक परिवर्तनों को आत्मसात करने की प्रक्रिया में भारतीय संस्कृति का कलेवर बदल जाता है,लेकिन उसके मूलाधार नहीं बदलते। वह नितनवीन होने के साथ भी चिरपुरातन भी बनी रहती है। नितनवीन और चिरपुरातन के बीच संतुलन बिंदुओं की खोज और उनको साधने की प्रक्रिया में कुंभ जैसे आयोजनों का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। आज जब हम परिवर्तनों के अंधड़ में जी रहे हैं तब इस संतुलन के नवीन सूत्रों की खोज अपेक्षाकृत अधिक आवश्यक हो गई है। यदि हम कुंभ को व्यवस्थागत संवाद के प्लेटफार्म के मूलस्वरूप में स्थापित करने में सफल हो जाते हैं तो निश्चित रूप से संतुलन के नवीन सूत्रों की खोज भी कर लेंगे। ऐसा करना अपनी सांस्कृतिक धारा को अक्षय बनाए रखने के लिए जरूरी है।
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कश्मीरी हिंदुओं के विस्थापन पर मीडिया की चुप्पी उस पर सबसे बड़ा प्रश्न भी है
जनवरी 1990 में हुए हिंदू जनसंहार को लेकर मीडिया की चुप्पी पर पहले भी प्रश्न उठते रहे हैं। ‘द कश्मीर फाइल्स’ ने मीडिया की भूमिका को लेकर बेबाक टिप्पणियां की गई है, जिससे मीडिया की चयनित चुप्पी का प्रश्न फिर से केन्द्र में आ गया है। लाखों लोगों पर हुए अमानवीय अत्याचार के नगण्य मीडिया कवरेज से विश्वसनीयता का संकट तो पैदा ही हुआ है, सामाजिक-विक्षोभ की भी स्थिति भी पैदा हुई है।
उस दौर के घटनाक्रम पर नजर डालने से यह स्पष्ट होता है कि मीडिया कवरेज न होने पीछे पांथिक और वैचारिक पूर्वाग्रह तो कार्य कर ही रहे थे। ऐसे भी कई उदाहरण मिलते हैं, जिससे यह स्थापित है कि स्थानीय मीडिया आतंकवादियों का सहयोग कर रहा था।
4 जनवरी 1990 को कश्मीर के स्थानीय उर्दू समाचार पत्र आफताब में हिज्बुल मुजाहिदीन की एक प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित की, जिसमें स्थानीय पंडितों से घाटी खाली करने की छोडने का निर्देश दिया गया था। इस प्रेस विज्ञप्ति में कश्मीरियों से वह भारत के खिलाफ जिहाद करने की अपील भी की गई थी । दो महीने बाद में स्थानीय उर्दू अखबार अलसफा में भी ऐसी चेतावनी प्रकाशित की गई। इसके कारण घाटी में भय की स्थिति पैदा हुई और हिंदुओं ने पलायन करना शुरू कर दिया।
एकतरफ आतंकवादी मीडिया का उपयोग अपने हितों के लिए कर रहे थे तो दूसरी तरफ इस बात के लिए सुनियोजित तरीके से प्रयास कर रहे थे कि इस अमानवीय अत्याचार की खबरें घाटी से बाहर न जाएं। इसके लिए चुन-चुनकर पत्रकारों को निशाना बनाया गया। पत्रकार-हत्याओं की जरिए उस समय ऐसा माहौल बना दिया गया था कि स्थानीय पत्रकारों ने चुप्पी साध ली।
19 जनवरी 1990 से लगभग दो साल पहले 27 दिसम्बर 1987 को प्रसिद्ध पत्रकार और वकील प्रेमनाथ भट््ट की आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी। इसे आतंकवादियों द्वारा पत्रकारों में भय पैदा करने की पहली बडी कोशिश के रूप में देखा गया। 13 फरवरी 1990 को दूरदर्शन के कश्मीर केन्द्र के निदेशक लास्सा कौल की आतंकवादियों ने उनके घर के सामने गोली मारकर हत्या कर दी। लास्सा कौल के नेतृृत्व में दूरदर्शन द्वारा जा रही कवरेज आतंकवादियों को नागवार गुजर रही थी। इसके कारण कश्मीर में दूरदर्शन का प्रसारण अगले कुछ सालों तक प्रभावित रहा। 01 मार्च 1990 को जम्मू-कश्मीर सरकार में सहायक निदेशक, सूचना पी.एन.हंडू की आतंकवादियों ने उस समय हत्या कर दी थी, जब वह अपने घर से कार्यालय जाने की तैयारी कर रहे थे।
इन हत्याओं के कारण निष्पक्ष स्थानीय मीडिया और पत्रकारों में भय का माहौल पैदा हो गया। मुख्यधारा की मीडिया भी जिन पत्रकारों पर निर्भर थी, वे मुख्यतः घाटी से ही थे। भयभीत स्थानीय पत्रकारों द्वारा इस जनसंहार की कवरेज न होने से यह परिघटना राष्ट्रीय स्तर पर विमर्श का विषय नहीं बन सकी।
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राधेश्याम खेमका: जिन्होंने बताया कि संपादन सबसे बड़ा सांस्कृतिक कर्म है
वह जानते थे कि गीता प्रेस गोरखपुर में किसी एक अशुद्धि का जाने का आशय क्या है? करोड़ों घरों में गीता-प्रेस की पुस्तकों से ही नित्य पूजा पाठ होता है। मठ-मंदिरों में स्वाध्याय का आधार गीताप्रेस गोरखपुर ही है। कथा-सत्संग में भी व्यासपीठ पर गीता-प्रेस की पुस्तक ही विराजमान होती है।
वह निरंतर 60 वर्षों से प्रयागराज में कल्पवास कर रहे थे। पिछले कई दशकों से गंगाजल ही पीते थे। दिन में केवल दो बार अन्न ग्रहण करते थे। यह जीवनशैली किसी सम्पादन कार्य में लगे व्यक्ति की बिलकुल भी नहीं लगती। किसी साधु-संत की लगती है। राधेश्याम खेमका की सधुक्कडी जीवनशैली के साथ लगभग चार दशकों से कल्याण का सम्पादन कार्य कर रहे थे। इस मनोदशा और जीवनशैली के कारण ही सम्पादन में शुद्धता और संकल्पना को वह स्तर प्राप्त कर सके, जो भारतीय परम्परा पर भाष्य करने के लिए आवश्यक होती है।
आज जब आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है और डिकोलोनाइजेशन पर बड़े जोरो-शोरों से चर्चा चल रही है, तब राधेश्याम खेमका का स्मरण और भी जरूरी हो जाता है। राधेश्याम खेमका इस तथ्य की तरफ संकेत कर जाते हैं कि भारतीय जीवनशैली अपनाए बिना डिकोलोनाइजेशन का कार्य आगे नहीं बढ़ सकता। एक विशिष्ट जीवनशैली को अपनाने के बाद ही भारतीय परम्पराओं और मान्यताओं को ठीक ढंग से समझा जा सकता है।
राधेश्याम खेमका उस परम्परागत भारतीय मानस के भी प्रतिनिधि थे, जो कार्यसिद्धि के लिए साधन से अधिक साधना को महत्व देता है। यह मानस इस बात में विश्वास करता है कि कार्य की सिद्धि के लिए एक विशिष्ट मनोदशा की आवश्यकता होती है। यदि साधना के जरिए वह मनोदशा सध जाए तो कार्य के लिए आवश्यक संसाधन और संयोग अपने आप बन जाते है। एक ऐसे दौर में जब जब संसाधन, तकनीक, उपकरण कार्यसिद्धि के पर्याय लिए गए हों, तब राधेश्याम खेमका साधना की भारतीय परम्परा और उसकी सफलता के प्रतीक के रूप में हमारे सामने आते हैं।
वह लगभग चार दशकों तक कल्याण पत्रिका के अवैतनिक सम्पादक रहे। आध्यात्मिक जगत में कल्याण के विशेषांकों का संग्रहणीय साहित्य के रूप में प्रतिष्ठित स्थान है। प्रतिवर्ष जनवरी माह में साधकों के लिये उपयोगी किसी आध्यात्मिक विषय पर केंद्रित विशेषांक प्रकाशित होता है। शेष ग्यारह महीनों में प्रतिमाह पत्रिका प्रकाशित होती है। खेमका जी के संपादकत्व में गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा कल्याण के 460 सामान्य अंकों और 40 विशेषांकों का सम्पादन हुआ।
उनके सम्पादकत्व में निकले कल्याण के विशेषांकों पर दृष्टि डालें तो विषयों की विस्तार की अनुभूति स्वयं ही हो जाती है। श्रीवामन पुराण अंक, चरित्रनिर्माण अंक, श्रीमत्स्य पुराण अंक (पूर्वार्ध), श्रीमत्स्य पुराण अंक (उत्तरार्ध), संकीर्तन अंक, शक्ति उपासना अंक, शिक्षा अंक, पुराणकथा अंक, देवता अंक, योगतत्वांक, संक्षिप्त भविष्य पुराण अंक, श्रीराम भक्ति अंक, गो सेवा अंक, धर्मशास्त्र अंक, कूर्मपुराण अंक, भगलल्लीला अंक, वेद कथांक, संक्षिप्त गरुड़ पुराण अंक, आरोग्य अंक, नितिसार अंक, भगवत प्रेम अंक, व्रतपर्वाेत्सव अंक, देवीपुराण (शक्तिपीठांक), अवतार कथा अंक, संस्कार अंक, श्रीमद्देवी भागवत अंक (पूर्वार्ध), श्रीमद्देवी भागवत अंक (उत्तरार्ध), जीवनचर्या अंक, दानमहिमा अंक, श्रीलिंग महापुराण अंक, भक्तमाल अंक, ज्योतितत्वांक, सेवा अंक, गङ्गा अंक, शिव महापुराण अंक (पूर्वार्ध), शिव महापुराण (उत्तरार्ध), श्रीराधा माधव अंक, बोधकथा अंक, श्री गणेश पुराण अंक का प्रकाशन उनके सम्पादकत्व में हुआ। उन्होंने अपने सम्पादकत्व में कल्याण के विशेषांक के लिए एक तरफ ऐसे ग्रथों का प्रकाशन किया जो अप्राप्य और दुर्लभ माने जाते थे। दूसरी तरफ भारतीय संस्कृति की आधारभूत मान्यताओं और मानदंडों पर कल्याण के विशेषांकों का प्रकाशन कर सांस्कृतिक सातत्य को बनाए रखने में अभूतपूर्व योगदान दिया।
हनुमानप्रसाद पोद्दार ने अपने संपादकत्व में गीता-प्रेस में व्याकरणीय शुद्धता और संकल्पनात्मक श्रेष्ठता के जो उच्च मानदंड स्थापित किए थे, राधेश्याम खेमका ने न केवल उन्हें बनाए रखा, बल्कि आगे भी बढ़ाया। वह यह कार्य इसीलिए कर सके क्योंकि उन्होंने सम्पादन को प्रूफ संसोधन या नई संकल्पनाओं पर कार्य भर नहीं माना, उनके लिए सम्पादन इक धार्मिक और सांस्कृतिक कार्य था।
वह जानते थे कि गीता प्रेस गोरखपुर में किसी एक अशुद्धि का जाने का आशय क्या है? करोड़ों घरों में गीता-प्रेस की पुस्तकों से ही नित्य पूजा पाठ होता है। मठ-मंदिरों में स्वाध्याय का आधार गीताप्रेस गोरखपुर ही है। कथा-सत्संग में भी व्यासपीठ पर गीता-प्रेस की पुस्तक ही विराजमान होती है। अकादमिक स्तर पर भारत आर भारतीयता को लेकर जो नया उल्लास पैदा हुआ है, उसके लिए भी प्राथमिक और सुलभ संदर्भग्रंथ गीता-प्रेस से प्रकाशित पुस्तके और कल्याण के विशेषांक ही हैं। और इन सभी स्थानों पर गीता-प्रेस की पुस्तकों का पाठ इसी भावना के साथ किया जाता है कि इस पुस्तक में अशुद्धि नहीं हो सकती।
ऐसे में एक त्रुटि एक अशुद्धि का अर्थ लाखों अनुष्ठानों का भंग करना और करोड़ों व्रतों को खंडित करना था। राधेश्याम खेमका ने लगभग चार दशकों तक इस वृहत्तर भार को अपने उठाए रखा। उन्होंने यह समझ लिया था कि सम्पादन को यदि धार्मिक और सांस्कृतिक कर्म के रूप में किया जाए तो अशुद्धता के लिए स्थान कम हो जाता है। और सम्पादन धार्मिक और सांस्कृतिक कर्म तभी बन सकता है, जब जीवनशैली को भी धार्मिक और सांस्कृतिक बनाया जाए।
गीता-प्रेस गोरखपुर और कल्याण पत्रिका का संचालन एक धार्मिक अनुष्ठान की तरह हुआ है। राधेश्याम खेमका को पद्म विभूषण सस्कृति संरक्षण और संवर्द्धन के मूक महाअभियान को प्रारंभिक स्वीकृति देने जैसा है। व्यापक आकलन तक आने वाली पीढ़ियां ही कर सकेंगी।
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नए ‘कुरुक्षेत्र’ का परिचय
सूचनात्मक-संकल्पनात्मक स्तर पर लड़े जा रहे वर्तमान सभ्यतागत-संघर्ष में मीडिया-अकादमिक जगत केंद्रीय भूमिका में हैं। मीडिया और अकादमिक का गठजोड़ सबसे घातक हथियार है और संघर्ष का बड़ा मोर्चा भी।
वास्तविक शत्रु, शस्त्र और मोर्चे की पहचान पर ही किसी संघर्ष का परिणाम सबसे अधिक निर्भर करता है। संघर्षों के दौरान बहुत से अन्य कारक भी परिणाम को प्रभावित करते हैं, लेकिन यदि कोई पक्ष शत्रु में मित्र और मित्र में शत्रु देखने के भ्रम का शिकार हो जाए या शत्रुता को लेकर ऊहापोह की स्थिति में आ जाए तो उस पक्ष का पराजित होना तय है। यह मनोदशा आत्मघात सरीखी स्थिति को जन्म देती है। इसी तरह संघर्ष के दौरान शत्रु पक्ष की रणनीति को मूर्त रूप देने वाले मोर्चों और प्रभावी हथियारों की पहचान भी अहम रणनीतिक जिम्मेदारी होती है। मोर्चे के महत्व के अनुरूप शक्ति के समानुपातिक सदुपयोग की कला सजगता से ही आती है।

दुर्भाग्यवश, सभ्यतागत-संघर्ष की वर्तमान विश्वव्यवस्था में हिंदू-धर्म शत्रु, शस्त्र और मोर्चों को लेकर भ्रम की स्थिति में है। अंतिम पैगंबर की अवधारणा पर आधारित पंथों की एकमात्र सत्य होने के दुराग्रह के कारण हिंदू धर्म की समावेशी प्रकृति को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है। एक तरफ यह कट्टरता है कि जो हमसे इतर है, वह झूठ है और उसे रहने का अधिकार नहीं है। दूसरी तरफ सभी पंथों को एक ही पलडे़ पर तोलने की अतिशय उदारता। यह विरोधाभासी स्थिति हिंदू-धर्म के समक्ष पिछले हजार सालों से चुनौतियां पैदा कर रही है और यह दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही है।
सूचनात्मक-संकल्पनात्मक स्तर पर लड़े जा रहे वर्तमान सभ्यतागत-संघर्ष में मीडिया-अकादमिक जगत केंद्रीय भूमिका में हैं। मीडिया और अकादमिक का गठजोड़ सबसे घातक हथियार है और संघर्ष का बड़ा मोर्चा भी। इस मोर्चे पर हिन्दू धर्म की दयनीय उपस्थिति उसे कुव्याख्याओं के लिए सुभेद्य बना देती है। मीडिया और अकादमिक जगत में हिंदू धर्म की कुव्याख्याओं की पीड़ा से उपजी किताब है रीआर्मिंग-हिंदुइज्म। नाम से ऐसा प्रतीत होता है कि यह कोई उत्तेजक और आक्रामक किताब है, लेकिन इसकी अंतर्वस्तु बताती है कि सबसे प्रभावी हथियार से लैस होने और सबसे निर्णायक मोर्चे पर डटने की भारतीयों से की गई अपील है।
लेखक इस मूल मान्यता को लेकर आगे बढ़ता है कि शोध, सूचना और संवाद कभी हिंदू धर्म की मूल शक्ति रहे हैं, पिछली कुछ शताब्दियों में यह परम्परा क्षीण हुई है। किताब के पहले हिस्से में उन सभी अकादमिक मिथकों की पहचान की गई है, जिनके जरिए हिंदू धर्म पर हमला किया जाता है मसलन-आर्य-आक्रमण का मिथक, वैदिक-हिंसा का मिथक, वैकल्पिक इतिहास का मिथक। दूसरे हिस्से में सनातन दर्शन के विविध आयामों को स्पर्श किया गया है और निष्कर्ष भारत की नियति, जगत गुरु के रूप में उसकी भूमिका को रेखांकित किया गया है।
लेखक इस तथ्य को मजबूती से स्थापित करता है कि हिंदू-धर्म के खिलाफ प्रतिस्पर्धी पक्ष आपस में हाथ मिलाकर आक्रमण करते हैं। इस्लाम और ईसाइयत एकजुट होकर हमला करते हैं, यूरोप और अमेरिका में वाम और दक्षिण मिलकर हिन्दू धर्म को निशाना बनाते हैं। रीआर्मिंग हिंदुइज्म इस बात से हमें सचेत करती है कि भारतीय सभ्यता पर हमलों को व्यक्तिगत पूर्वाग्रह मानने के प्रति सचेत करती है।‘ सबसे पहले हमें इस सच को स्वीकार करना चाहिए कि हिंदूफोबिया व्यक्तिगत पूर्वाग्रह नहीं है। यह एक बड़ी और गहरी राजनीतिक सच्चाई से उपजी अकादमिक रचना है। ( पृष्ठ 31)
पुस्तक की एक प्रमुख खूबी इसका संस्कृतिमय और संस्कृतमय होना है। किताब का पहले भाग का नाम देश-काल दोष है। पहले अध्याय का नाम अकादमिक माया सभा है। अंग्रेजी किताब में संस्कृत शब्दों और भारतीय संकल्पनाओं का विनियोग किताब को अलहदा बनाता है। इससे भी बड़ी बात भारतीय मानस पर किताब में स्थान-स्थान पर की गई अंतःदृष्टिपूर्ण की गई टिप्पणियां हैं। रामायण, महाभारत और पुराण हमारे लिए भूतकाल से संबंधित किताबें नहीं हैं, बल्कि शाश्वत, जीवंत सांस्कृतिक संसाधन हैं। ( पृष्ठ 144) अवतारों के जीवन में घटित त्याग-तपस्या को रेखांकित करने की शैली बहुत अनूठी है-राम और कृष्ण, महानतम, सर्वाधिक लोकप्रिय अवतार हैं। दोनों को वनवास झेलना पड़ा। एक को राज्याभिषेक से ठीक पहले और दूसरे को जन्म लेते ही। ( पृष्ठ 156)। इसी तरह भारतीयों की देव-विविधता संबंधी संकल्पना की लेखक अलग ही धरातल पर आकर्षक किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मीडिया के अध्यापन से जुड़े एक प्रोफेसर ने भारतीय मीडिया की सभ्यतागत संघर्ष में भूमिका को इस किताब के जरिए रेखांकित किया है। साथ ही भारतीय दृष्टि से वैश्विक अकादमिक-मीडिया के गठजोड़ का मूल्यांकन किया है। अन्यथा अभी तक तो पश्चिमी मीडिया को आदर्श मानकर उसकी शब्दावली और नैरेटिव्स के अनुकरण का ही चलन रहा है। हां, कहीं-कहीं पर यह जरूर लगता है कि नई संकल्पनाओं को गढ़ने के बाद उनका उतनी गहराई से विश्लेषण नहीं किया गया है, जितना अपेक्षित है।
पुस्तक एक नया भारतीय परिप्रेक्ष्य रचने और समझने में सहायक है। पुस्तक का हिंदी संस्करण किताब को उसके लक्षित समूह तक पहुंचाने में सहायक होगा ही, भारत में चल रहे विमर्शों में कुछ नए सकारात्मक आयाम जोड़ने के लिए भी आवश्यक है।