संनीति
आयरन कर्टेन की महामारी
आयरन कर्टेन सूचना-प्रवाह को अपने हितों के अनुसार नियंत्रित और बाधित करने वाली साम्यवादी देशों की नीति रही है। इस आयरन कर्टेन के कारण कोविड-19 की सूचनाएं दुनिया तक सही समय पर नहीं पहुंची और महामारी ने पूरी दुनिया को अपने शिकंजे में ले लिया। आगे ऐसा न हो इसलिए साम्यवादी आयरन कर्टेन का वैश्विक मंच से गायब होना आवश्यक है।
एक सूचना छिपाने की कीमत कितनी बड़ी हो सकती है, इसका अंदाजा कोराना संकट से लगाया जा सकता है। साथ ही, सही समय पर सम्पूर्ण सूचना मिलनी क्यों जरूरी है, इसके बार में भी कोराना संकट ही हमें सचेत करता है। कोरोना ने दुनिया को एक अभूतपूर्व संकट में खडा़ कर दिया है, तो इसका एक बड़ा कारण सूचना के मोर्चे पर बरती गई लापरवाही है। कोरोना चीन में कैसा फैला, इसके बारे में संशय का लाभ चीन को दिया जा सकता है। लेकिन कोरोना दुनिया में कैसे फैला, इसके बारे में चीन की भूमिका को लेकर कोई संदेह नही है। चीन में यह चमगादड़ से मानव में आया वुहान की चर्चित हुआनान सीफूड बाजार से या फिर वुहान इंस्टीट्यूट आॅफ वायरोलाॅजी की लैब से, इसके बारे में स्पष्ट रूप से अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन लगभग सभी देश इस पर एकमत है कि कोविड-19 एक वैश्विक महामारी इसलिए बन गई क्योंकि चीन ने दुनिया को इसके बारे में सही-समय पर सूचित करने में आपराधिक लापरवाही बतरती। यदि इस वायरस और इसकी प्रकृति के बारे में दुनिया को शुरुआती दौर पर सचेत कर दिया गया होता तो सार्स की तरह कोविड-19 का प्रभाव भी एक सीमित दायरे में रह जाता।
सार्स के संक्रमण के दौरान इससे सम्बंधित सभी सूचनाएं वैश्विक स्तर पर पहुंच गई थी, और इसी कारण इसका प्रभावी रोकथाम संभव हो सका। कोरोना-19 के मामले में स्थिति एकदम उलट दिखती है। चीन में दिसंबर महीने के दूसरे सप्ताह से ही कोरोना के मामले सामने आना शुरु हो गए थे लेकिन चीन ने इसका आकलन बहुत कामचलाऊ तरीके से किया। संभवतः उसे आर्थिक-नुकसान या अपनी छवि की चिंता सता रही थी। दिसम्बर के अंतिम सप्ताह तक चीन में यह संकेत मिलने शुरू हो गए थे कि कोविड-19 का संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में हो सकता है। इसके बावजूद उसने इस सूचना को छिपाया। स्थिति तब और खराब हो गई, जब तमाम आशंकाओं के बीच चीन की साम्यवादी सरकार ने वुहान से अपने नागरिकों को दुनिया भर की यात्रा करने में कोई रोक नहीं लगायी। वुहान से दुनिया भर में जाने वाले लोग जैव-आत्मघाती दस्ते में तब्दील हो गए और जल्द ही कोविड-19 के संक्रमण ने वैश्विक-महामारी का रूप ले लिया।
चीन ने वस्तुस्थिति को छिपाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी सहयोग लिया। चीन की तरफ विश्व स्वास्थ्य संगठन को कोविड-19 की सूचना देने में बहुत विलम्ब किया गया और शुरूआती रिपोर्ट में चीन ने इस बात की जानकारी नहीं दी कि इसका संक्रमण एक इंसान से दूसरे इंसान में हो सकता है। इसीलिए 14 जनवरी को इस संगठन ने ट्वीट कर दुनिया भर को यह जानकारी दी कि चीन की शुरुआती जांच में इस बात के संकेत नहीं मिले हैं कि कोरोना वायरस इंसानों से इंसानों में फैलता है। लेकिन जब सभी देशों में कोरोना फैलने की खबरें आने लगीं तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक सप्ताह बाद ही 22 जनवरी को एक ट्वीट में यह जानकारी दी कि वुहान में कोरोना वायरस के इंसानों से इंसानों में फैलने के मामले सामने आए हैं। और फिर एक सप्ताह बाद इसी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे वैश्विक महामारी घोषित कर दिया।
चीन और विश्व-स्वास्थ्य संगठन के गठजोड़ द्वारा सूचना छिपाने के आरोपों को इसलिए भी बल मिला क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ताईवान द्वारा दी गई सूचना पर कोइ ध्यान नहीं दिया था। ताईवान के आईलैंड्स सेंटर्स फाॅर डिजीज कंट्रोल के मुखिया चांउ जीहा ने प्रेस कान्फ्रेंस कर बताया कि ताइवान ने 31 दिसंबर को ही डब्ल्यूएचओ को इस नए वायरस इंसान से इंसान में फैलने के बारे में सचेत किया था। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस महत्वपूर्ण सूचना पर कोई सटीक प्रतिक्रिया नहीं दी। इसके बाद अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने भी चीन और विश्व-स्वास्थ्य संगठन की भूमिका पर सवाल उठाया। मंत्रालय के अनुसार कोविड-19 को रोकने के लिए जब राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन से आने वाले यात्रियों पर रोक लगाने का फैसला लिया था तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे गलत फैसला करार दिया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन और अमेरिका इसके बाद किस तरह आमने-सामने आए, यह अलग कहानी है।
चीन का आंतरिक घटनाक्रम भी इसी बात की तरफ संकेत करता है कि चीन ने कोविड-19 से सम्बंधित सूचनाओं को छिपाने के लिए जानबूझकर प्रयास किए। चीन के वुहान केन्द्रीय अस्पताल में कार्यरत नेत्र-विशेषज्ञ डॉ. ली वेनलियांग ने 30 दिसंबर को ही अपने साथी डाॅक्टरों को सूचित किया था कि उन्होंने कुछ मरीजों में सार्स जैसे लक्षण दिखे हैं। चीन की साम्यवादी सरकार ने इस सूचना को गम्भीरता से लेने के बजाय डॉ. वेनलियांग को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का रास्ता चुना। चार दिन बाद चीनी प्रशासन के पब्लिक सिक्यूरिटी ब्यूरो ने उन्हें आॅफिस बुलाया और उन्हें एक पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया। उस पत्र में उन गलत टिप्पणी करने और सामाजिक व्यवस्था को बुरी तरह से अस्तव्यस्त करने के आरोप लगाए गए थे। वह उन आठ लोगों में से एक थे, जिन पर अफवाह फैलाने के आरोप लगाकर जांच की गई। सही सूचना देने, खतरे के बारे में बताने के लिए डाॅ. वेनलियांग से जिस तरह से व्यवहार किया गया, वह साबित करता है कि चीन ने कोविड-19 सम्बंधी सूचनाओ को लेकर किस तरह का अपारदर्शी रुख अपनाया हुआ था।
चीन का सूचनाओं से खेलने का दृष्टिकोण तब भी दुनिया के सामने आया जब उसने वुहान में कोविड-19 से मरने वाले व्यक्तियों की संख्या में यकायक परिवर्तन कर दिया। 17 अप्रैल को चीन ने वुहान में मरने वाले व्यक्तियों की संख्या में 1,290 की बढ़ोतरी कर दी, इसके कारण मौतों का आंकड़ा कुल 3,869 हो गया। आंकडों में इस परिवर्तन ने दुनिया भर का ध्यान अपनी तरफ खींचा। इससे यह घारणा भी मजबूत हुई कि चीन सही आंकड़ों और सूचनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस प्रकरण को लेकर चीन पर निशाना साधते हुए ट्वीट किया कि ’’ इस अज्ञात शत्रु से होने वाली मौतों का आंकड़ा चीन अचानक बढ़ा कर दोगुना कर दिया है। लेकिन ये इससे कहीं अधिक है। ये अमरीका में हो रही मौतों के आंकड़े से भी कहीं अधिक है।’’
चीन द्वारा कोविड-19 के सम्बंध में सूचना दबाने का एक अन्य प्रकरण को ’ सिक्स डे डिले’ के नाम से जाना जाता है। इसके अनुसार चायनीज प्रशासन ने कोविड-19 के खतरे के बारे में सभी औपचपारिक सूचनाएं 14 जनवरी को दे दी थीं लेकिन चीनी राष्ट्रपति ने इसे 20 जनवरी को सार्वजनिक किया। तब तक इसके कारण 3000 हजार से अधिक लोग सक्रमित हो गए थे।
कोरोना संक्रमण के समय चीन में उत्तरदायित्वपूर्ण शासन और पारदर्शी सूचना प्रणाली का घोर अभाव दिखा है। इस समय एक एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के बजाय चीन का व्यवहार टिपिकल साम्यवादी देश की तरह है। प्रायः प्रत्येक साम्यवादी देश में वैचारिकी के नाम पर उत्तरदायित्व और पारदर्शिता की बलि चढ़ा दी जाती है। शासक तानाशाह बन जाते हैं और सूचनाएं आयरन कर्टेन में कैद हो जाती है। आयरन कर्टेन सूचना-प्रवाह को अपने हितों के अनुसार नियंत्रित और बाधित करने वाली साम्यवादी देशों की नीति रही है। इस आयरन कर्टेन के कारण कोविड-19 की सूचनाएं दुनिया तक सही समय पर नहीं पहुंची और महामारी ने पूरी दुनिया को अपने शिकंजे में ले लिया। आगे ऐसा न हो इसलिए साम्यवादी आयरन कर्टेन का वैश्विक मंच से गायब होना आवश्यक है।
संनीति
भारतीय-मीडिया के आकलन का अवसर भी है कारगिल विजय दिवस
लाइव कवरेज के कारण कारगिल युद्ध को ‘भारत का प्रथम टेलीविजन युद्ध’ भी कहा जाता है। रियल टाइम कवरेज ने पूरे देश को इस युद्ध और उसके घटनाक्रमों से भावनात्मक रूप से जोड़ दिया था। वहीं दूसरी तरफ, इस युद्ध के दौरान भारतीय मीडिया के एक हिस्से ने इसे मीडिया-इवेंट में तब्दील करने की कोशिश की और भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच की तर्ज पर प्रसारण किया। राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संचार के प्रति इस तरह की अनभिज्ञता के कारण तब भारतीय मीडिया को लेकर कई गंभीर प्रश्न उठ खड़े हुए थे।
इसी कारण कारगिल युद्ध के समाप्त होने के बाद जब इस युद्ध का विश्लेषण करने के लिए 29 जुलाई, 1999 को के.सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में चार सदस्यीय ’कारगिल समीक्षा समिति’ बनी तो उसने विस्तृत रूप से इस युद्ध में न केवल मीडिया की भूमिका का आकलन किया बल्कि आवश्यक सुझाव भी दिए।
समिति ने अपने विश्लेषण में पाया कि कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकांश मीडियाकर्मियों को सैन्य-मामलों और युद्ध-रिपोर्टिंग का कोई अनुभव नहीं था। समिति ने इस बात का भी रेखांकित किया कि भारतीय सेना के ’कमांड-स्ट्रक्चर’ की समझ नहीं होने के कारण मीडिया अपने रिपोर्टिंग अभियान में सूचनाओं को उनके महत्व के अनुसार उचित स्थान निर्धारण करने में कठिनाई महसूस कर रही थी।
इसके कारण बहुत सारी ऐसी गलत खबरों ने जन्म लिया, जो भारतीय सेना के साथ राष्ट्रीय मनोबल को प्रभावित करने वाली थीं। ऐसी ही गलत खबर थी कि दुश्मन ने भारतीय सेना के कई बंकरों पर कब्जा कर लिया था, जबकि सच्चाई यह थी कि दुश्मन ने केवल एक ऐसे स्थायी पेट्रोल पोस्ट पर आधिपत्य जमाया था, जिसे भारतीय सेना मौसम सम्बंधी दुश्वारियों के कारण पहले ही छोड चुकी थी। एक अन्य खबर यह सामने आई कि घुसपैठियों ने टेलीविजन सेट से लैस तीन मंजिले बंकर बना रखे हैं। यह खबर पूरी तरह गलत और निराधार थी। इसी तरह भारतीय सेना के मई 1999 के पोलैंड के दौरे को लेकर भी तथ्यहीन एवं त्रुटिपूर्ण खबरें सामने आईं थी।
कारगिल समीक्षा समिति ने इस बात की तरफ संकेत किया था कि युद्ध अथवा छद्म-युद्ध से नागरिक-समाज भी अछूता नहीं रह सकता। ऐसे समय में मानवाधिकार, मौतें, संपत्ति का नुकसान और शरणार्थी समस्याएं पैदा होती हैं। इसलिए युद्ध के दौरान ऐसे नागरिक और सैन्य प्रशासन को इन मुद्दों को मिलकर अधिक तत्परता और संवेदनशीलता के साथ निपटाना चाहिए। इस संकेत में अप्रत्यक्ष रूप से मीडिया को भी यह संदेश देने की कोशिश की गई थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा और युद्ध को अधिक संवेदनशीलता के साथ कवर किया जाना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कारगिल सुरक्षा समिति ने यह सुझाव दिया है कि मीडिया को महू स्थित कॉलेज ऑफ कम्बैट (आर्मी वार कॉलेज) के ’वार कॉरेसपांडेट कोर्स’ का लाभ उठाना चाहिए, ताकि प्रशिक्षित युद्ध संवाददाता उपलब्ध हो सकें।
2001 में भारतीय संसद पर हुए हमले और 2008 में हुए मुम्बई में हुए हमलों का मीडिया-कवरेज यह स्पष्ट करता है कि भारतीय मीडिया ऐसे निर्णायक मौकों पर न तो राष्ट्रीय सुरक्षा को अपनी प्राथमिकता बना सका है और न ही युद्धकाल की मीडिया-नैतिकता के नए मापदंडों को गढ़ सका है। सामान्य स्थितियों में सूचना का स्वतंत्र प्रवाह एक मीडिया नैतिकता है, लेकिन रियल टाइम सूचना का लाभ उठाकर आतंकवादी निर्दोष नागरिकों की हत्या कर रह हों, तो किसी घटनाक्रम की कवरेज में रणनीतिक-मूल्यों का समावेश आवश्यक हो जाता है।
कारिगल युद्ध के बाद युद्ध में सूचना और संचार की महत्ता और भी अधिक बढ़ी है। बल्कि अब तो हायब्रिड वारफेयर जैसी पूरी तरह सूचना और संचार केन्द्रित युद्धशैलियां अस्तित्व में आ गई हैं। यू़क्रेन युद्ध ने इस बात को लगभग स्थापित कर दिया है कि युद्ध अब एक अनवरत प्रक्रिया में परिवर्तित हो गया है और यह रणभूमि में कभी-कभी होने वाले संघर्षों के साथ मनोभूमि भी निरंतर लड़ा जा रहा है।
भारत की विशिष्ट स्थिति इसे सूचना-संचार युद्ध के लिए अधिक सुभेद्य बना देती है। लोकतांत्रिक शासन प्रणाली, वैश्विक स्तर पर निरंतर मजबूत होती स्थिति, परम्परागत सैन्य मोर्चे पर भारतीय सेना की बढ़ती ताकत के कारण प्रतिस्पर्धी राष्ट्र सूचना-संचार के माध्यम से भारत को अस्थिर करने की कोशिशों को और भी अधिक गति प्रदान करेंगे।
भारत की इस विशिष्ट स्थिति और युद्ध की प्रकृति में आए बदलावों को सही अभिव्यक्ति देते हुए वायु सेना अध्यक्ष विवेक राम चौधरी ने 12 अप्रैल 2022 को यह कहा कि नए तरह के युद्ध में दुश्मन को क्षति पहुंचाने के लिए सूचना-क्षेत्र में गढ़े गए सुनियोजित आख्यान का विध्वंशकारी प्रभाव हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि नए तरह के युद्ध में पहली गोली चलने और पहले लड़ाकू को सीमा पार करने से पहले बहुत सारे मोर्चों पर युद्ध लड़ा जा चुका होगा।
ऐसी स्थिति में कारगिल विजय दिवस हमें यह अवसर प्रदान करता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, हायब्रिड वारफेयर, सूचना-संचार युद्ध के परिप्रेक्ष्य में भारतीय मीडिया की स्थिति का अनवरत आकलन करते रहे। यहां यह ध्यान रखने योग्य बात है कि मीडिया के आकलन में मीडिया-शिक्षा भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष उत्पन्न हो रही नई चुनौतियों का सामना मीडिया-शिक्षा में बदलाव किए बगैर नहीं किया जा सकता।
संनीति
डिरेडिकलाइजेशन का सभ्यतागत एजेंडा
शिक्षा क्षेत्र को केंद्र में रखकर बच्चों को मजहबी कट्टरपंथ से बचाने के प्रयास निरंतर करने होंगे। यह पीढ़ियों तक होने वाला कार्य है, इसलिए इस कार्य में निरंतरता की आवश्यकता रहेगी। आवश्यकता ‘डिरेडिकलाइजेशन’ के छिट-पुट प्रयासों को नीतिगत रूप देने की है।
जम्मू-कश्मीर में हाल ही में सम्पन्न हुए चुनावों में 63.88 प्रतिशत मतदाताओं ने चुनाव प्रक्रिया में सहभागिता कर भारतीय लोकतंत्र के प्रति अपनी मजबूत आस्था तो दिखाई ही है, सुशासन और पारदर्शिता के बारे में अपनी तीव्र आकांक्षा को भी अभिव्यक्त किया है। नई राज्य सरकार को जनादेश की व्याख्या करते समय यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि इससे लोगों की सुशासन की गहरी इच्छाएं जुड़ी हुई हैं। अनुच्छेद 370 और 35A के कारण जम्मू-कश्मीर में सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही कभी भी राजनीतिक प्रक्रिया के केंद्र में नहीं आ पाए थे। अब जब पारदर्शिता और सुशासन के रास्ते से ये अवरोध हटाए जा चुके हैं, और वहाँ पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया अब तक के अपने सफलतम रूप में दस्तक दे चुकी है तो यह देखना रोचक होगा कि नई सरकार कितने पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से कार्य करती है।
सरकार गठन के बाद विधानसभा में जिस तरह से सत्तापक्ष और कुछ अन्य विधायकों ने व्यवहार किया और कुछ मुद्दे उठाए, उससे तो यही लग रहा है कि सरकार पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन की मांग करने वाले जनादेश की व्याख्या किन्हीं अन्य अर्थों में करने की कोशिश कर रही है। यहां पर इस तथ्य को याद रखना चाहिए की लोगों ने पीडीपी और जमात-ए-इस्लामी के कट्टरपंथी एजेंडे को इन चुनावों में पूरी तरह नकार दिया है। जमात-ए-इस्लामी समर्थित सभी 10 उम्मीदवार बुरी तरह चुनाव हार गए और कईयों की तो जमानत तक जब्त हो गई। इसी तरह पीडीपी का चुनावी प्रदर्शन भी बहुत बुरा रहा। वह मात्र 3 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी। पीडीपी का गढ़ माने जाने वाले दक्षिणी कश्मीर की अधिकांश सीटों पर भी पार्टी को पराजय का मुंह देखना पड़ा।
नैशनल कॉन्फ्रेन्स इन चुनावों में बहुत सारे लोक-लुभावन वायदों के साथ लोगों के पास गई थी। पार्टी ने अपने 12 सूत्रीय मैनिफेस्टो में 200 यूनिट तक फ्री बिजली, कमजोर वर्गों के परिवारों की महिला मुखिया को 5 हजार रुपए और प्रतिवर्ष फ्री 12 एलपीजी सीलिंडर और 6 महीने के भीतर एक लाख लोगों को रोजगार जैसे वायदे किए थे। लोगों ने कश्मीर के कट्टरपंथी दलों को पूरी तरह से नकार कर विकास और शांति के लिए मतदान किया। इसी कारण नैशनल कॉन्फ्रेन्स और भाजपा को सबसे अधिक मत मिले। यहाँ पर इस तथ्य का उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि इस विधानसभा चुनाव में वोट शेयर के हिसाब से भाजपा जम्मू-कश्मीर में सबसे बड़ी पार्टी है। उसे लगभग 26 प्रतिशत मत मिले हैं, जो कि नैशनल कॉन्फ्रेन्स से लगभग 2 प्रतिशत अधिक हैं। लेकिन सरकार गठन के बाद ऐसा लगता है कि सरकार जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के बजाय किसी पुराने खेल को फिर से खेलने की कोशिश कर रही है। सरकार को जनादेश की मनमानी व्याख्या से पहला चुनावी प्रक्रिया में सुशासन की चाहत, जमीनी नेतृत्व और बढ़ती सहभागिता को लेकर जो नए तथ्य उभरे हैं, उनका बारीकी से जरूर विश्लेषण कर लेना चाहिए।
विधानसभा चुनाव 2024 ने जम्मू-कश्मीर और वहां की राजनीतिक प्रक्रिया के बारे में बहुत सकारात्मक संदेश दिया है। इसके कारण वैश्विक स्तर पर दशकों से भारतीय लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को संदिग्ध साबित करने का अभियान तो औंधेमुंह गिरा है। आंतरिक स्तर पर एक अधिक समावेशी लोकतंत्र की नींव भी पड़ी है । हाशिए पर स्थित समुदायों और वर्गों की ने इन चुनावों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
आँकड़े चुनावी प्रक्रिया में सहभागिता में आए सकारात्मक बदलावों की गवाही दे रहे है। उदाहरण के लिए 2014 के मुकाबले इसबार 7 प्रतिशत अधिक उम्मीदवारों ने चुनावों प्रक्रिया में भाग लिया है। इसी तरह महिला उम्मीदवारों की संख्या 28 से बढ़ाकर 43 हो गई। सबसे रोचक बात यह है की जम्मू कश्मीर में निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या में 26 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है। इसके अतिरिक्त परिसीमन के बाद जम्मू-कश्मीर के चुनाव में जनजातीय समाज के लिए 9 सीट आरक्षित किया जाना भी समावेशी लोकतंत्र की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण कदम रहा। जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की जड़े किस हद तक गहरी हुई है, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि ‘रजिस्टर्ड अनरेकगनाइज पोलिटिकल पार्टीज(RUPPs)’ की संख्या में इसबार 71 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2014 में ऐसे दलों की संख्या 138 थी, जो अब बढ़कर 236 हो गई है।
जम्मू-कश्मीर में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में जिस तरह से लोगों सहभागिता बढ़ी और पूरी चुनावी प्रक्रिया जितनी शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुई, उससे मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार की वह बात सच साबित हुई जो उन्होंने 16 अगस्त 2024 को चुनावों की घोषणा करते हुए कही थी। तब उन्होंने कहा था कि ‘जम्मू-कश्मीर में इस बार विश्व कुटिल और शत्रु शक्तियों के हित पराजित होंगे और लोकतंत्र की विजय होगी।’
सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ. स्वदेश सिंह यह मानते हैं कि जम्मू-कश्मीर में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की सफलता ने एक उम्मीद तो जगाई है, लेकिन वह लोकतंत्र को चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं मानते। उनके अनुसार शेख अब्दुल्ला के समय से वहाँ की राजनीति व्यक्तिगत सनक और प्राथमिकताओं से संचालित होती रही है, इसके कारण वहाँ पर लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत नहीं हो सकीं। अब लोकतान्त्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाकर ही शांति और विकास के दूरगामी लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है। इसके साथ वह वहाँ के समाज को ‘डिरेडिकलाइज’ करने के लिए भी लगातार कदम उठाए जाने की बात करते हैं।
नई सरकार के शपथ ग्रहण के तुरंत बाद वहाँ पर जम्मू-कश्मीर में लक्षित हिंसा का जो नया दौर शुरू हुआ है, उससे ‘डिरेडिकलाइजेशन’ की आवश्यकता को फिर से रेखांकित किया है। ये हिंसा इसी तथ्य की तरफ संकेत करता है कि लोकतान्त्रिक प्रक्रिया हो अथवा विकास और शांति के लक्ष्य, इनको प्राप्त करने के लिए वहाँ पर संस्थागत रूप ले हो चुकी विद्वेष और सांप्रदायिकता की मानसिकता पर लगातार कुठाराघात करने की आवश्यकता है। ‘डिरेडिकलाइजेशन’ के कार्य में दशकों लग सकते हैं, लेकिन इस कार्य को टाला नहीं जा सकता। 2022 में एक विशेष जांच एजेंसी (SIA) ने सैकड़ों शिक्षण संस्थानों को बच्चों को ‘रेडिकलाइज’ करने का दोषी पाया था। तब उसकी अनुशंसा पर मजहबी शिक्षा देने वाले उन शिक्षण संस्थानों को प्रतिबंधित कर दिया गया था। जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा भी आतंकी पारिस्थिकी को ध्वस्त करने की वकालत करते रहे हैं। विशेषकर शिक्षा क्षेत्र को केंद्र में रखकर बच्चों को मजहबी कट्टरपंथ से बचाने के प्रयास निरंतर करने होंगे। यह पीढ़ियों तक होने वाला कार्य है, इसलिए इस कार्य में निरंतरता की आवश्यकता रहेगी। आवश्यकता ‘डिरेडिकलाइजेशन’ के छिट-पुट प्रयासों को नीतिगत रूप देने की है।
संनीति
हायब्रिड सुरक्षा तंत्र की जरूरत
हायब्रिड आतंक को रोकने के लिए ऐसे विधिक उपायों का उपयोग आवश्यक है, जो उन समूहों की जवाबदेही तय कर सकें, जो हायब्रिड आतंक को पोषित करते है।
जम्मू-कश्मीर की जनसांख्यिकी हमेशा से ही पाकिस्तान के निशाने पर रही है। जनसांख्यिकी में बदलाव के जरिए पाकिस्तान एकतरफ अपने नागरिकों की पांथिक भावनाओं को संतुष्ट करने की कोशिश करता है, तो वहीं दूसरी तरफ भारत में पांथिक विद्वेष को बढ़ाकर अराजकता की स्थिति पैदा करने की कोशिश करता है। इसके लिए वह समय-समय पर अलग-अलग रणनीतियां अपनाता रहा है। 1990 के प्रारंभिक महीनों में सामूहिक और संस्थागत रूप से कश्मीर की जनसांख्यिकी को बदलने की कोशिश की गई थी और अब हायब्रिड आतंकियों द्वारा की जा रही चयनित हत्याओं को जरिए जम्मू-कश्मीर की जनसांख्यिकी को निशाना बनाया जा रहा है।
पिछले पन्द्रह महीनों में हुए जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकी हमलों के नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि पाकिस्तान चयनित हत्याओं को एक नीति के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। हाल के दिनों में उसने अपनी इस नीति को गति दी है। जम्मू-कश्मीर में इस वर्ष 3 जून तक 16 चयनित हत्याएं की हैं, जबकि मई के पहले सप्ताह से लेकर जून के पहले सप्ताह के बीच 9 चयनित हत्याएं हुईं। इन हत्याओं में धार्मिक पहचान और क्षेत्रीय अस्मिताओं को ध्यान में रखकर लोगों को निशाना बनाया। चयनित हत्याओं के केन्द्र में पांथिक पहचान है, हालांकि सुरक्षा प्रतिष्ठान से सम्बंधित कुछ ऐसे स्थानीय लोगों को भी निशाना बनाया गया, जो आतंकी प्रभाव को चुनौती दे रहे थे।
जम्मू-कश्मीर में चयनित हत्याओं की शुरुआत 17 फरवरी 2021 से मानी जाती है। जब श्रीनगर स्थित कृष्णा ढाबा पर आतंकियों द्वारा हमला किया गया। इस हमले में कृष्णा ढाबा के मालिक रमेश कुमार के बेटे की मौत हो गई थी। हालांकि, अभूतपुर्व साहस का परिचय देते हुए रमेश कुमार ने अपना कृष्णा ढाबा अप्रैल 2021 में फिर ग्राहकों के लिए खोल दिया था।
5 अक्टूबर 2021 को प्रसिद्ध दवा विक्रेता एमएल बिंद्रू की हत्या आतंकियों द्वारा कर दी गई। अक्टूबर में ही एक स्कूल-प्रिंसिपल सुपिंदर कौर और अध्यापक दीपक चंद की पहचान पत्र देखने के बाद हत्या कर दी गई। इसके बाद कुछ पुलिसकर्मियों और बाहरी मजदूरों को आतंकियों ने निशाना बनाया गया। हाल ही में आतंकियों ने साम्बा में कार्यरत अध्यापिका रजनी बाला की हत्या कर दी थी।
चयनित हत्याओं की रणनीति का एक सर्वाधित महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इनको अंजाम देने के लिए हायब्रिड आतंकियों का उपयोग किया जा रहा है। हायब्रिड आतंकी आंतकवाद को आजीवन और निरंतर चलने वाली गतिविधि के रूप में नहीं अपनाता, बल्कि आकाओं द्वारा दिए गए कुछ लक्ष्यों को पूरा करने के बाद अगले वह अगले आदेश तक सामान्य नागरिकों की भांति जीवन जीने लगता है। इसके कारण सुरक्षा बलों को ऐसे आतंकियों की पहचान करना मुश्किल साबित होता है।
इसके अतिरिक्त हायब्रिड आतंकी पिस्टल जैसे अपेक्षाकृत हल्के हथियारों का उपयोग करते है और ऐसे लोगों को निशाना बनाते है, जो इर्द-गिर्द प्रायः कोई सुरक्षा नहीं रहती। ये प्रायः सरकारी कर्मचारी या ड्यूटी से घर लौटे पुलिसकर्मी जैसे आसान लक्ष्यों को अपना निशाना बनाते हैं। हायब्रिड आतंकी पेशेवर अपराधी की तरह हत्याएं करता है और फिर सामान्य जीवन जीने लगता है। इसमें जिसकी हत्या की जा रही है, उसका महत्वपूर्ण व्यक्ति होना जरूरी नहीं है। बल्कि इसमें संख्या और पहचान का अधिक महत्व होता है और इन हत्याओं का उपयोग आतंकी कुछ निश्चित संदेशों को देने के लिए करते हैं।
अभी तक सुरक्षा प्रतिष्ठान और विशेषज्ञ हायब्रिड आतंकियों और चयनित हत्याओं को अपनी उपस्थिति दर्ज कराए रखने के अंतिम प्रयास के रूप में देखते हैं। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार लोगों में घटते प्रभाव के कारण आंतकी भय पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ कुछ विशेषज्ञ इसे पाकिस्तान के बिगड़ते हालात से जोड़कर देखते हैं। ऐसे विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था की डांवाडोल स्थिति, बढ़ती महंगाई और सेना के प्रति बढ़ते अविश्वास से जनता का ध्यान हटाने के लिए कश्मीर में इस तरह के हमलों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
यह एक हद तक सही भी है कि 5 अगस्त 2019 के बाद आतंकियों और उनके आकाओं का प्रभाव जम्मू-कश्मीर में बहुत कम हो गया है और वह किसी भी कीमत पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं। परन्तु यदि हायब्रिड आतंकियों और चयनित हत्याओं को प्रारंभिक दौर में ही नहीं रोका गया तो वे सामूहिक विस्थापन का कारण बन सकते हैं और पाकिस्तान की जनसांख्यिकी बदलने की दीर्घकालीन योजना को नया बल मिल सकता है। चयनित हत्याओं के बाद सामूहिक धरना-प्रदर्शन इस बात की तस्दीक करते हैं।
इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि हायब्रिड आतंक और चयनित हत्याओं का प्रभावी प्रत्युत्तर दिया जाए। ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि परम्परागत रणनीतियों के जरिए हायब्रिड आतंकियों को रोका जा सकता है? हायब्रिड आतंक की मुख्य ताकत उसका समूह के बीच सामान्य नागरिक की तरह रहना है। इसलिए उसकी पहचान सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि उन समूहों और संस्थाओं की पहचान की जाए जो हायब्रिड आतंकियों को गढ़ते हैं और सामान्य व्यक्ति के रूप में समाज में उनकी पहचाना बनाए रखने में सहयोग प्रदान करते हैं। हायब्रिड आतंकियों को मानसिक और भावनात्मक तौर पर तैयार करने वाली समूहों और संस्थाओं की पहचान हायब्रिड आतंकियों को पहचानने का सबसे अच्छा तरीका है। और इन समूहों और संस्थाओं पर नकेल कसना हायब्रिड आतंकियों पर नकेल कसने का सबसे प्रभावी तरीका है। हायब्रिड आतंकियों को निष्क्रिय करने की रणनीति में सैन्य-पुलिस ऑपरेशन्स के साथ कुछ अन्य उपायों को भी शामिल करने की आवश्यकता होगी। हायब्रिड आतंक को रोकने के लिए ऐसे विधिक उपायों का उपयोग आवश्यक है, जो उन समूहों की जवाबदेही तय कर सकें, जो हायब्रिड आतंक को पोषित करते है। हायब्रिड आतंकियों पर नकेल उन्हे गढ़ने वाली पारिस्थतिकी और उनका समर्थन करने वाली आर्थिकी को चोट पहुंचा कर ही कसी जा सकती है।
