संवादक्षेत्र
नए ‘कुरुक्षेत्र’ का परिचय
सूचनात्मक-संकल्पनात्मक स्तर पर लड़े जा रहे वर्तमान सभ्यतागत-संघर्ष में मीडिया-अकादमिक जगत केंद्रीय भूमिका में हैं। मीडिया और अकादमिक का गठजोड़ सबसे घातक हथियार है और संघर्ष का बड़ा मोर्चा भी।
वास्तविक शत्रु, शस्त्र और मोर्चे की पहचान पर ही किसी संघर्ष का परिणाम सबसे अधिक निर्भर करता है। संघर्षों के दौरान बहुत से अन्य कारक भी परिणाम को प्रभावित करते हैं, लेकिन यदि कोई पक्ष शत्रु में मित्र और मित्र में शत्रु देखने के भ्रम का शिकार हो जाए या शत्रुता को लेकर ऊहापोह की स्थिति में आ जाए तो उस पक्ष का पराजित होना तय है। यह मनोदशा आत्मघात सरीखी स्थिति को जन्म देती है। इसी तरह संघर्ष के दौरान शत्रु पक्ष की रणनीति को मूर्त रूप देने वाले मोर्चों और प्रभावी हथियारों की पहचान भी अहम रणनीतिक जिम्मेदारी होती है। मोर्चे के महत्व के अनुरूप शक्ति के समानुपातिक सदुपयोग की कला सजगता से ही आती है।

दुर्भाग्यवश, सभ्यतागत-संघर्ष की वर्तमान विश्वव्यवस्था में हिंदू-धर्म शत्रु, शस्त्र और मोर्चों को लेकर भ्रम की स्थिति में है। अंतिम पैगंबर की अवधारणा पर आधारित पंथों की एकमात्र सत्य होने के दुराग्रह के कारण हिंदू धर्म की समावेशी प्रकृति को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है। एक तरफ यह कट्टरता है कि जो हमसे इतर है, वह झूठ है और उसे रहने का अधिकार नहीं है। दूसरी तरफ सभी पंथों को एक ही पलडे़ पर तोलने की अतिशय उदारता। यह विरोधाभासी स्थिति हिंदू-धर्म के समक्ष पिछले हजार सालों से चुनौतियां पैदा कर रही है और यह दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही है।
सूचनात्मक-संकल्पनात्मक स्तर पर लड़े जा रहे वर्तमान सभ्यतागत-संघर्ष में मीडिया-अकादमिक जगत केंद्रीय भूमिका में हैं। मीडिया और अकादमिक का गठजोड़ सबसे घातक हथियार है और संघर्ष का बड़ा मोर्चा भी। इस मोर्चे पर हिन्दू धर्म की दयनीय उपस्थिति उसे कुव्याख्याओं के लिए सुभेद्य बना देती है। मीडिया और अकादमिक जगत में हिंदू धर्म की कुव्याख्याओं की पीड़ा से उपजी किताब है रीआर्मिंग-हिंदुइज्म। नाम से ऐसा प्रतीत होता है कि यह कोई उत्तेजक और आक्रामक किताब है, लेकिन इसकी अंतर्वस्तु बताती है कि सबसे प्रभावी हथियार से लैस होने और सबसे निर्णायक मोर्चे पर डटने की भारतीयों से की गई अपील है।
लेखक इस मूल मान्यता को लेकर आगे बढ़ता है कि शोध, सूचना और संवाद कभी हिंदू धर्म की मूल शक्ति रहे हैं, पिछली कुछ शताब्दियों में यह परम्परा क्षीण हुई है। किताब के पहले हिस्से में उन सभी अकादमिक मिथकों की पहचान की गई है, जिनके जरिए हिंदू धर्म पर हमला किया जाता है मसलन-आर्य-आक्रमण का मिथक, वैदिक-हिंसा का मिथक, वैकल्पिक इतिहास का मिथक। दूसरे हिस्से में सनातन दर्शन के विविध आयामों को स्पर्श किया गया है और निष्कर्ष भारत की नियति, जगत गुरु के रूप में उसकी भूमिका को रेखांकित किया गया है।
लेखक इस तथ्य को मजबूती से स्थापित करता है कि हिंदू-धर्म के खिलाफ प्रतिस्पर्धी पक्ष आपस में हाथ मिलाकर आक्रमण करते हैं। इस्लाम और ईसाइयत एकजुट होकर हमला करते हैं, यूरोप और अमेरिका में वाम और दक्षिण मिलकर हिन्दू धर्म को निशाना बनाते हैं। रीआर्मिंग हिंदुइज्म इस बात से हमें सचेत करती है कि भारतीय सभ्यता पर हमलों को व्यक्तिगत पूर्वाग्रह मानने के प्रति सचेत करती है।‘ सबसे पहले हमें इस सच को स्वीकार करना चाहिए कि हिंदूफोबिया व्यक्तिगत पूर्वाग्रह नहीं है। यह एक बड़ी और गहरी राजनीतिक सच्चाई से उपजी अकादमिक रचना है। ( पृष्ठ 31)
पुस्तक की एक प्रमुख खूबी इसका संस्कृतिमय और संस्कृतमय होना है। किताब का पहले भाग का नाम देश-काल दोष है। पहले अध्याय का नाम अकादमिक माया सभा है। अंग्रेजी किताब में संस्कृत शब्दों और भारतीय संकल्पनाओं का विनियोग किताब को अलहदा बनाता है। इससे भी बड़ी बात भारतीय मानस पर किताब में स्थान-स्थान पर की गई अंतःदृष्टिपूर्ण की गई टिप्पणियां हैं। रामायण, महाभारत और पुराण हमारे लिए भूतकाल से संबंधित किताबें नहीं हैं, बल्कि शाश्वत, जीवंत सांस्कृतिक संसाधन हैं। ( पृष्ठ 144) अवतारों के जीवन में घटित त्याग-तपस्या को रेखांकित करने की शैली बहुत अनूठी है-राम और कृष्ण, महानतम, सर्वाधिक लोकप्रिय अवतार हैं। दोनों को वनवास झेलना पड़ा। एक को राज्याभिषेक से ठीक पहले और दूसरे को जन्म लेते ही। ( पृष्ठ 156)। इसी तरह भारतीयों की देव-विविधता संबंधी संकल्पना की लेखक अलग ही धरातल पर आकर्षक किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मीडिया के अध्यापन से जुड़े एक प्रोफेसर ने भारतीय मीडिया की सभ्यतागत संघर्ष में भूमिका को इस किताब के जरिए रेखांकित किया है। साथ ही भारतीय दृष्टि से वैश्विक अकादमिक-मीडिया के गठजोड़ का मूल्यांकन किया है। अन्यथा अभी तक तो पश्चिमी मीडिया को आदर्श मानकर उसकी शब्दावली और नैरेटिव्स के अनुकरण का ही चलन रहा है। हां, कहीं-कहीं पर यह जरूर लगता है कि नई संकल्पनाओं को गढ़ने के बाद उनका उतनी गहराई से विश्लेषण नहीं किया गया है, जितना अपेक्षित है।
पुस्तक एक नया भारतीय परिप्रेक्ष्य रचने और समझने में सहायक है। पुस्तक का हिंदी संस्करण किताब को उसके लक्षित समूह तक पहुंचाने में सहायक होगा ही, भारत में चल रहे विमर्शों में कुछ नए सकारात्मक आयाम जोड़ने के लिए भी आवश्यक है।
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कश्मीरी हिंदुओं के विस्थापन पर मीडिया की चुप्पी उस पर सबसे बड़ा प्रश्न भी है
जनवरी 1990 में हुए हिंदू जनसंहार को लेकर मीडिया की चुप्पी पर पहले भी प्रश्न उठते रहे हैं। ‘द कश्मीर फाइल्स’ ने मीडिया की भूमिका को लेकर बेबाक टिप्पणियां की गई है, जिससे मीडिया की चयनित चुप्पी का प्रश्न फिर से केन्द्र में आ गया है। लाखों लोगों पर हुए अमानवीय अत्याचार के नगण्य मीडिया कवरेज से विश्वसनीयता का संकट तो पैदा ही हुआ है, सामाजिक-विक्षोभ की भी स्थिति भी पैदा हुई है।
उस दौर के घटनाक्रम पर नजर डालने से यह स्पष्ट होता है कि मीडिया कवरेज न होने पीछे पांथिक और वैचारिक पूर्वाग्रह तो कार्य कर ही रहे थे। ऐसे भी कई उदाहरण मिलते हैं, जिससे यह स्थापित है कि स्थानीय मीडिया आतंकवादियों का सहयोग कर रहा था।
4 जनवरी 1990 को कश्मीर के स्थानीय उर्दू समाचार पत्र आफताब में हिज्बुल मुजाहिदीन की एक प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित की, जिसमें स्थानीय पंडितों से घाटी खाली करने की छोडने का निर्देश दिया गया था। इस प्रेस विज्ञप्ति में कश्मीरियों से वह भारत के खिलाफ जिहाद करने की अपील भी की गई थी । दो महीने बाद में स्थानीय उर्दू अखबार अलसफा में भी ऐसी चेतावनी प्रकाशित की गई। इसके कारण घाटी में भय की स्थिति पैदा हुई और हिंदुओं ने पलायन करना शुरू कर दिया।
एकतरफ आतंकवादी मीडिया का उपयोग अपने हितों के लिए कर रहे थे तो दूसरी तरफ इस बात के लिए सुनियोजित तरीके से प्रयास कर रहे थे कि इस अमानवीय अत्याचार की खबरें घाटी से बाहर न जाएं। इसके लिए चुन-चुनकर पत्रकारों को निशाना बनाया गया। पत्रकार-हत्याओं की जरिए उस समय ऐसा माहौल बना दिया गया था कि स्थानीय पत्रकारों ने चुप्पी साध ली।
19 जनवरी 1990 से लगभग दो साल पहले 27 दिसम्बर 1987 को प्रसिद्ध पत्रकार और वकील प्रेमनाथ भट््ट की आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी। इसे आतंकवादियों द्वारा पत्रकारों में भय पैदा करने की पहली बडी कोशिश के रूप में देखा गया। 13 फरवरी 1990 को दूरदर्शन के कश्मीर केन्द्र के निदेशक लास्सा कौल की आतंकवादियों ने उनके घर के सामने गोली मारकर हत्या कर दी। लास्सा कौल के नेतृृत्व में दूरदर्शन द्वारा जा रही कवरेज आतंकवादियों को नागवार गुजर रही थी। इसके कारण कश्मीर में दूरदर्शन का प्रसारण अगले कुछ सालों तक प्रभावित रहा। 01 मार्च 1990 को जम्मू-कश्मीर सरकार में सहायक निदेशक, सूचना पी.एन.हंडू की आतंकवादियों ने उस समय हत्या कर दी थी, जब वह अपने घर से कार्यालय जाने की तैयारी कर रहे थे।
इन हत्याओं के कारण निष्पक्ष स्थानीय मीडिया और पत्रकारों में भय का माहौल पैदा हो गया। मुख्यधारा की मीडिया भी जिन पत्रकारों पर निर्भर थी, वे मुख्यतः घाटी से ही थे। भयभीत स्थानीय पत्रकारों द्वारा इस जनसंहार की कवरेज न होने से यह परिघटना राष्ट्रीय स्तर पर विमर्श का विषय नहीं बन सकी।
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राधेश्याम खेमका: जिन्होंने बताया कि संपादन सबसे बड़ा सांस्कृतिक कर्म है
वह जानते थे कि गीता प्रेस गोरखपुर में किसी एक अशुद्धि का जाने का आशय क्या है? करोड़ों घरों में गीता-प्रेस की पुस्तकों से ही नित्य पूजा पाठ होता है। मठ-मंदिरों में स्वाध्याय का आधार गीताप्रेस गोरखपुर ही है। कथा-सत्संग में भी व्यासपीठ पर गीता-प्रेस की पुस्तक ही विराजमान होती है।
वह निरंतर 60 वर्षों से प्रयागराज में कल्पवास कर रहे थे। पिछले कई दशकों से गंगाजल ही पीते थे। दिन में केवल दो बार अन्न ग्रहण करते थे। यह जीवनशैली किसी सम्पादन कार्य में लगे व्यक्ति की बिलकुल भी नहीं लगती। किसी साधु-संत की लगती है। राधेश्याम खेमका की सधुक्कडी जीवनशैली के साथ लगभग चार दशकों से कल्याण का सम्पादन कार्य कर रहे थे। इस मनोदशा और जीवनशैली के कारण ही सम्पादन में शुद्धता और संकल्पना को वह स्तर प्राप्त कर सके, जो भारतीय परम्परा पर भाष्य करने के लिए आवश्यक होती है।
आज जब आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है और डिकोलोनाइजेशन पर बड़े जोरो-शोरों से चर्चा चल रही है, तब राधेश्याम खेमका का स्मरण और भी जरूरी हो जाता है। राधेश्याम खेमका इस तथ्य की तरफ संकेत कर जाते हैं कि भारतीय जीवनशैली अपनाए बिना डिकोलोनाइजेशन का कार्य आगे नहीं बढ़ सकता। एक विशिष्ट जीवनशैली को अपनाने के बाद ही भारतीय परम्पराओं और मान्यताओं को ठीक ढंग से समझा जा सकता है।
राधेश्याम खेमका उस परम्परागत भारतीय मानस के भी प्रतिनिधि थे, जो कार्यसिद्धि के लिए साधन से अधिक साधना को महत्व देता है। यह मानस इस बात में विश्वास करता है कि कार्य की सिद्धि के लिए एक विशिष्ट मनोदशा की आवश्यकता होती है। यदि साधना के जरिए वह मनोदशा सध जाए तो कार्य के लिए आवश्यक संसाधन और संयोग अपने आप बन जाते है। एक ऐसे दौर में जब जब संसाधन, तकनीक, उपकरण कार्यसिद्धि के पर्याय लिए गए हों, तब राधेश्याम खेमका साधना की भारतीय परम्परा और उसकी सफलता के प्रतीक के रूप में हमारे सामने आते हैं।
वह लगभग चार दशकों तक कल्याण पत्रिका के अवैतनिक सम्पादक रहे। आध्यात्मिक जगत में कल्याण के विशेषांकों का संग्रहणीय साहित्य के रूप में प्रतिष्ठित स्थान है। प्रतिवर्ष जनवरी माह में साधकों के लिये उपयोगी किसी आध्यात्मिक विषय पर केंद्रित विशेषांक प्रकाशित होता है। शेष ग्यारह महीनों में प्रतिमाह पत्रिका प्रकाशित होती है। खेमका जी के संपादकत्व में गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा कल्याण के 460 सामान्य अंकों और 40 विशेषांकों का सम्पादन हुआ।
उनके सम्पादकत्व में निकले कल्याण के विशेषांकों पर दृष्टि डालें तो विषयों की विस्तार की अनुभूति स्वयं ही हो जाती है। श्रीवामन पुराण अंक, चरित्रनिर्माण अंक, श्रीमत्स्य पुराण अंक (पूर्वार्ध), श्रीमत्स्य पुराण अंक (उत्तरार्ध), संकीर्तन अंक, शक्ति उपासना अंक, शिक्षा अंक, पुराणकथा अंक, देवता अंक, योगतत्वांक, संक्षिप्त भविष्य पुराण अंक, श्रीराम भक्ति अंक, गो सेवा अंक, धर्मशास्त्र अंक, कूर्मपुराण अंक, भगलल्लीला अंक, वेद कथांक, संक्षिप्त गरुड़ पुराण अंक, आरोग्य अंक, नितिसार अंक, भगवत प्रेम अंक, व्रतपर्वाेत्सव अंक, देवीपुराण (शक्तिपीठांक), अवतार कथा अंक, संस्कार अंक, श्रीमद्देवी भागवत अंक (पूर्वार्ध), श्रीमद्देवी भागवत अंक (उत्तरार्ध), जीवनचर्या अंक, दानमहिमा अंक, श्रीलिंग महापुराण अंक, भक्तमाल अंक, ज्योतितत्वांक, सेवा अंक, गङ्गा अंक, शिव महापुराण अंक (पूर्वार्ध), शिव महापुराण (उत्तरार्ध), श्रीराधा माधव अंक, बोधकथा अंक, श्री गणेश पुराण अंक का प्रकाशन उनके सम्पादकत्व में हुआ। उन्होंने अपने सम्पादकत्व में कल्याण के विशेषांक के लिए एक तरफ ऐसे ग्रथों का प्रकाशन किया जो अप्राप्य और दुर्लभ माने जाते थे। दूसरी तरफ भारतीय संस्कृति की आधारभूत मान्यताओं और मानदंडों पर कल्याण के विशेषांकों का प्रकाशन कर सांस्कृतिक सातत्य को बनाए रखने में अभूतपूर्व योगदान दिया।
हनुमानप्रसाद पोद्दार ने अपने संपादकत्व में गीता-प्रेस में व्याकरणीय शुद्धता और संकल्पनात्मक श्रेष्ठता के जो उच्च मानदंड स्थापित किए थे, राधेश्याम खेमका ने न केवल उन्हें बनाए रखा, बल्कि आगे भी बढ़ाया। वह यह कार्य इसीलिए कर सके क्योंकि उन्होंने सम्पादन को प्रूफ संसोधन या नई संकल्पनाओं पर कार्य भर नहीं माना, उनके लिए सम्पादन इक धार्मिक और सांस्कृतिक कार्य था।
वह जानते थे कि गीता प्रेस गोरखपुर में किसी एक अशुद्धि का जाने का आशय क्या है? करोड़ों घरों में गीता-प्रेस की पुस्तकों से ही नित्य पूजा पाठ होता है। मठ-मंदिरों में स्वाध्याय का आधार गीताप्रेस गोरखपुर ही है। कथा-सत्संग में भी व्यासपीठ पर गीता-प्रेस की पुस्तक ही विराजमान होती है। अकादमिक स्तर पर भारत आर भारतीयता को लेकर जो नया उल्लास पैदा हुआ है, उसके लिए भी प्राथमिक और सुलभ संदर्भग्रंथ गीता-प्रेस से प्रकाशित पुस्तके और कल्याण के विशेषांक ही हैं। और इन सभी स्थानों पर गीता-प्रेस की पुस्तकों का पाठ इसी भावना के साथ किया जाता है कि इस पुस्तक में अशुद्धि नहीं हो सकती।
ऐसे में एक त्रुटि एक अशुद्धि का अर्थ लाखों अनुष्ठानों का भंग करना और करोड़ों व्रतों को खंडित करना था। राधेश्याम खेमका ने लगभग चार दशकों तक इस वृहत्तर भार को अपने उठाए रखा। उन्होंने यह समझ लिया था कि सम्पादन को यदि धार्मिक और सांस्कृतिक कर्म के रूप में किया जाए तो अशुद्धता के लिए स्थान कम हो जाता है। और सम्पादन धार्मिक और सांस्कृतिक कर्म तभी बन सकता है, जब जीवनशैली को भी धार्मिक और सांस्कृतिक बनाया जाए।
गीता-प्रेस गोरखपुर और कल्याण पत्रिका का संचालन एक धार्मिक अनुष्ठान की तरह हुआ है। राधेश्याम खेमका को पद्म विभूषण सस्कृति संरक्षण और संवर्द्धन के मूक महाअभियान को प्रारंभिक स्वीकृति देने जैसा है। व्यापक आकलन तक आने वाली पीढ़ियां ही कर सकेंगी।
देश-काल
मातृभाषा से सशक्त होगी मातृशक्ति
सहज और मौलिक चिंतन की सर्वाधिक संभावनाएं परिवेश की भाषा में निहित होती हैं। कोई भी ऐसा समूह अथवा वर्ग जो हासिए पर हो और जिसको सशक्त बनाए जाने के प्रयास चल रहें हों,
सहज और मौलिक चिंतन की सर्वाधिक संभावनाएं परिवेश की भाषा में निहित होती हैं। कोई भी ऐसा समूह अथवा वर्ग जो हासिए पर हो और जिसको सशक्त बनाए जाने के प्रयास चल रहें हों, उसे मूलभूत सुविधाएं परिवेश की भाषा में, मातृभाषा में, उपलब्ध कराना व्यवस्था का मूलकर्म बन जाता है।
सशक्तीकरण के कई पहलू होते है। भाषा उन सभी पहलुओं से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सम्बंधित होती है। यह शैक्षणिक दृष्टि से यह अधिक सस्ती, सुलभ और समावेशी शिक्षा का आधार तैयार करती है, स्वास्थ्य सम्बंधी जटिलताओं को सुबोध बनाकर सजगता को बढ़ाती है, आर्थिक परिदृश्य को अधिक विस्तृत और समावेशी बनाती है। भाषा का सबसे महत्वपूर्ण अवदान तो सांस्कृतिक होता है। मातृभाषा न केवल व्यक्तियों को सांस्कृतिक प्रवाह से जोड़े रखती है बल्कि यह आत्मबल को बनाए रखने का भी महत्वपूर्ण साधन है।
मातृभाषा महिला सशक्तीकरण के लक्ष्य को प्राप्त करने में कैसे सहायक हो सकती है इस बात को कुछ उदारण के जरिए समझा जा सकता है। हाल ही में स्वास्थ्य मंत्रालय ने गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने के लिए मोबाइल पर मैसेज भेजने शुरू किए हैं। यह संदेश एनीमिया की स्थिती खान-पान की सावधानियां और दिनचर्या को लेकर होते हैं। यह जानकारी वास्तव दूर-दराज में रहने वाली महिलाओं के बहुत उपयोगी है। लेकिन दुर्भाग्य से ये सभी मैसेज अंग्रेजी में भेजे जाते है। जो महिलाएं पर्याप्त पढ़ी लिखी हैं, अंग्रेजी ज्ञान रखती हैं, उनके लिए इन संदेशों का कोई खास मतलब नहीं रह जाता क्योंकि वह इन सभी सूचनाओं को प्रायः जानती ही है। यह उन महिलाओं के लिए भी किसी काम के नही होती जिनको यह संदेश भेजे जाते है अथवा लिनके लिए यह जानकारी बहुत उपयोगी साबित हो सकती है क्योकि वह अंगे्रजी भाषा में लिखे संदेशो को ठीक ढंग से समझ नही पाती। इस तरह से दोनो स्थितियों में अंग्रेजी में लिखे स्वास्थ्य के प्रति सजगता पैदा करने वाले ये संदेश सफेद हाथी बन जाते है।
यदि यहि संदेश हिन्दी भाषा अथवा अन्य भारतीय भाषाओं में संप्रेषित किए जाएं तो जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य को ठीक रखने और कुपोषण से छुटकारा पाने सफलता प्राप्त की जा सकती है। और यह सफलता स्त्री सशक्तीकरण का ही एक रूप और महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसी तरह शिक्षा के क्षेत्र में भी मातृभाषा महिला सशक्तीकरण को ऊंचे मुकाम तक पहुंचा सकती है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि पिछले दो दशको में बालिका नामांकन दर में काफी सुधार हुआ है। लेकिन दो कारण ऐसे है जो शिक्षा क्षेत्र में महिला सशक्तीकरण के लिहाज से मातृभाषा को बहुत महत्वपूर्ण बना देते है।
पहला लड़कियों की ड्राप आउट की दर का अधिक होना और उनकी दूरस्थ शिक्षा पर अनकी अधिक निभर््ारता तथा दूसरा लड़कियों की शिक्षा केा लेकर लापरवाही और कम खर्च करने की मानसिकता। आर्थिक स्थिती तथा शादी विवाह जैसे अन्य कारणांे की वजह से लड़कियों के बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। पहले तो डाप आउट होेने के बाद लड़कियों के पास शिक्षा के विकल्प समाप्त हो जाते थे। लेकिन दूरस्थ शिक्षा प्रारम्भ होने के बाद अपनी शिक्षा केा आगे जारी रखने की नया तरीका लड़कियों को मिला। दुर्भाग्यवश भाषायी बाधाओं के कारण दूरस्थ शिक्षा में निहित संभावनाओ का संपूर्ण लाभ लड़कियों को नही मिल पा रहा है। दूरस्थ शिक्षा में व्यक्ति को स्वयं की प्रतिभा के बल पर आगे बढ़ना होता है और उन्हें नाममात्र की औपचारिक सहायता से ही विषयों को समझना होता है। मातृभाषा की बजाय किसी अन्य भाषा में विषय सामग्री के होने से समझने की प्रक्रिया बाधित होती है।
अपनी भाषा में समग्री उपलब्ध होने पर सारा जोर विषय को समझने पर लगता है जबकि अन्य भाषा में सामग्री उपलब्ध होने पर विद्यार्थी की उर्जा और मेधा का बड़ा भाग भाषा को समझने में ही खर्च हो जाता है। इसके कारण विषय पर आवश्यक पकड़ नहीं बन पाती और विद्यार्थी इसके कारण कठिन प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाता है। यह हैरत की बात है कि दूरस्थ शिक्षा कि इस सीमा से परिचित होने के बावजूद इग्नू द्वारा संचालित पाठयक्रमों में से साहित्य और कुछ गिने चुने विषयों को छोड़कर अधिकांश विषयों की पाठय सामग्री अंग्रेजी में उपलब्ध कराई जाती है। और अंग्रेजी में ही परीक्षा की अनिवार्यता विद्यार्थी के सामने रख दी जाती है इनकी सबसे अधिक मार शिक्षा ग्रहण करने की इच्छुक लड़कियों पर पड़ती है।
इन दोनों विवशताओं के कारण या तो वे आगे पढ़ाई जारी रखने का विचार ही छोड़ देती हैं अथवा गलाकाट प्रतस्पर्धा में पीछे रह जाने को अभिशप्त हो जाती हैं। यदि दूरस्थ शिक्षा के पाठ्यक्रम को हिंदी में मुहैया कराया जाए और अंग्रेजी में ही परीक्षा देने की अनिवार्यता को हटा लिया जाए तो इस सबसे अधिक लाभ लड़कियों को प्राप्त होगा। इन कारणों से आधी दुनिया के सामने संभावनाओं का संसार खुल सकेगा और शिक्षा जगत में उनके समक्ष आने वाली दुश्वारियां कुछ कम हो सकेंगी। यह महिला सशक्तीकरण को भी मजबूती प्रदान करेगा।
एक अन्य कारण से भी मातृभाषा में शिक्षा, महिला सशक्तीकरण के लिहाज से उपयोगी है। यह दुर्भाग्यजनक किंतु कटु सत्य है कि अब भी अभिभावकों की तरफ से लड़का-लड़की को दी जाने वाली शिक्षा में विभेद देखने को मिलता है। यह विभेद अंग्रेजी-हिंदी माध्यम के विद्यालयों के चयन के रूप में सामने आता है। लड़के को इंग्लिश मीडियम और लड़की को हिंदी माध्यम के स्कूल में पढ़ाने की प्रवृत्ति समाज में दिखायी पडती है। इसके कारण उच्च -शिक्षा में जहां पर अब भी अंग्रेजी का बोलबाला है, लड़कियों को पीछे रह जाना पड़ता है। यदि उच्च शिक्षा के समस्त द्वार हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं के लिए खोल दिए जाएं तो इससे सबसे अधिक लाभी लड़कियों को ही मिलेगा।
भारत में लंबे समय तक इनसाइड वोमनःआउटसाइड मैन की धारणा का गहरा प्रभाव रहा है। अब यह धारणा टूट रही है। महिलाएं बाहर निकल रही हैं और घुल-मिल रही हैं। लेकिन उनकी स्वस्थ सामाजीकरण में एक प्रमुख बाधा अंग्रेजी के कारण पैदा हो रही है। सामान्य, मेहनती, प्रतिभावान महिला भी अंग्रेजी के आतंक से प्रतिदिन आतंकित होती हैं। लंबे समय तक घर से बाहर न निकलने के अभ्यस्त आधी दुनिया पर अंग्रेजी प्रतिदिन हीनता का भाव रचती है और उसे गाढ़ा करती है।
इस तरह मातृभाषा, मातृशक्ति के सशक्तीकरण का एक सशक्त माध्यम है। लेकिन निहित स्वार्थ, अंग्रेजी के मोह तथा अभिजन वर्ग के दुराग्रह के कारण व्यवस्था आज तक मातृभाषा को महिला सशक्तीकरण के उपकरण के रूप में रेखांकित नहीं कर सकी है। हैरत तो यह है कि जो भारतीय परिप्रेक्ष्य से परिचित हैं वे भी मातृभाषा और मातृशक्ति के आपसी संबंधों को रेखांकित नहीं कर पा रहे हैं। इस अपरिचय के कारण महिलाओं को भाषायी मानवाधिकार प्रदान करने के लिए कोई समुचित पहल नहीं दिख रही है।
