संनीति
भाषा शांति का उपकरण और पहचान का आधार भी है
संयुक्त राष्ट ने ’देशज भाषाओं का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष’ के लिए जो थीम निर्धारित की , वह अब तक की भाषायी समझ को सिर के बल खड़ी कर सकती है। थीम के अनुसार ’देशज भाषाएं विकास, शांति-ंनिर्माण, सुलह का उपकरण हैं
संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2019 को ’देशज भाषाओं का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष’ घोषित किया। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसकी घोषणा 19 दिसम्बर 2016 को ही कर दी थी। संयुक्त राष्ट्र प्रत्येक वर्ष को किसी चयनित मुद्दे के ’अंतर्राष्ट्रीय वर्ष’ के रूप में मनाता है। इस संस्था के लिए ’अंतराष्ट्रीय वर्ष’ घोषित करना अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता को बताने और उसकी तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करने का एक तरीका है।
संयुक्त राष्ट्र की इस परम्परा के लिहाज से देखें तो वर्ष 2019 को ’देशज भाषाओं का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष’ के रूप में मनाने में कोई अनूठापन नहीं दिखता। सामान्य समझ तो यही बनती है कि संयुक्त राष्ट्र ने इस वर्ष देशज भाषाओं के संरक्षण-ंसंवर्द्धन के लिए विशेष प्रयास किया होगा। वैश्विक स्तर पर कार्य कर रहे भाषायी-ंसम्मोहनों और दबावों के बीच संयुक्त राष्ट्र की ऐसी पहल साहसी मानी गई। लेकिन बात केवल साहस की नहीं है। संयुक्त राष्ट्र ने जिस भाषायी समझ के अनुसार इस वर्ष को मनाया, वह उसके निर्णय को अनूठा और क्रंातिकारी दोनों बना देते हैं।
संयुक्त राष्ट ने ’देशज भाषाओं का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष’ के लिए जो थीम निर्धारित की , वह अब तक की भाषायी समझ को सिर के बल खड़ी कर सकती है। थीम के अनुसार ’देशज भाषाएं विकास, शांति-ंनिर्माण, सुलह का उपकरण हैं। इस थीम की जरूरत और आशय को अधिक स्पष्ट करते हुए संयुक्त राष्ट्र एक आकार लेती भाषायी समझ की तरफ संकेत करता है।
इस संस्था के ही शब्दों में कहें तो ’भाषाएं लोगों के रोजमर्रा के जीवन में संचार, शिक्षा, सामाजिक एकीकरण और विकास के उपकरण के रूप में ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि लोगों की विशिष्ट पहचान, सांस्कृतिक इतिहास, परम्परा और स्मृति का भण्डार भी हैं। इतना मूल्यवान होने के बावजूद विश्व भर में भाषाएं खतरनाक दर से विलुप्त हो रही हैं। इस बात को ध्यान में रखकर संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2019 को ’देशज भाषाओं का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष’ घोषित किया, ताकि इनके बारे में जागरूकता पैदा हो सके। इसका लक्ष्य इन भाषाओं को बोलने वाले लोगों को लाभ पहुंचाना तो था ही, उन अन्य लोगों को भी इस बात का अहसास दिलाना है कि देशज भाषी दुनिया की सांस्कृतिक विविधता में किस कदर योगदान कर रहे हैं।’
संयुक्त राष्ट्र ने देशज भाषाएं क्यों महत्वपूर्ण हैं, इसके लिए 6 कारण बताए। संस्था के अनुसार देशज भाषाएं ज्ञान और दुनिया को समझने की एक विशिष्ट प्रणाली से हमारा परिचय कराती है। देशज भाषाएं शांति का माध्यम है, यह टिकाउ विकास, निवेश, शांति-ंस्थापना और सुलह का के रास्ते खोलती हैं। भाषा मूलभूत मानवाधिकार और स्वतंत्रता है। यह सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देती है। और अंतिम यह कि यह विविधता की पोषक है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा देशज भाषाओं के पक्ष में दिए गए इन तर्कों की वजह से भाषा का कद और महत्ता यकायक बढ़ जाती है। इस बड़े़ फलक पर भाषा का जुडाव हर उदात्त आदर्श से हो जाता है, वह मानवीय मूल्यों तक पहुंचने का प्राथमिक उपकरण बन जाती है। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित ’मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स’ या ’सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स’ के संदर्भों में भाषाओं की अहमियत बढ़ जाती है। ऐसा लगता है कि भाषायी सामर्थ्य का निवेश किए बगैर किसी भी लक्ष्य तक नहीं पहुंचा जा सकता। भाषा मूलभूत अधोसंरचना के रूप में हमारे सामने उपस्थित होती है।
संयुक्त राष्ट्र ने भाषायी सामर्थ्य के अनछुए लेकिन प्रभावी पहुलओं की अपनी स्वीकृति दे दी है। इसी के साथ बदलाव और टकराव की भूमिका भी तैयार कर दी है। भाषा अब जिस नए कलेवर में हमारे सामने आ रही है, उसका सामर्थ्य यदि अपने सम्पूर्ण कलाओं के साथ अवतार ले रहा है, तो इससे भविष्य में व्यापक बदलाव दिख सकते हैं। लेकिन इसके साथ टकराव के नए मोर्चे भी तैयार होंगे।
अभी तक भाषा को पहनने वाले कपड़े के तरह परोसा जाता था। जब चाहे बदल लो। वह तो अभिव्यक्त का उपकरण भर है, इसे संस्कृति, पहचान से जोड़ना मूर्खता है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र तो स्पष्ट कह रहा है कि भाषा पहचान को गढ़ती है और यह सांस्कृतिक स्मृतियों का सामूहिक कोश है। चुनौती इस तर्क को भी मिलेगी कि परम्परा को किसी भी भाषा में आगे बढ़या जा सकता है, इसलिए परम्परा के आग्रही व्यक्तियों को भाषा के बारे में आग्रह नहीं रखना चाहिए।
प्रश्न उस लोकप्रिय तर्क पर भी उठेंगे, जो कहता है कि विकास की खास भाषा होती है। भाषा-ंविविधता को कलह का कारण मानने वाले भी संयुक्त राष्ट्र की नई भाषायी लाइन से निराश होंगे। भाषायी मानवाधिकार और भाषायी स्वतंत्रता की संकल्पनाएं, किस कदर उठापटक पैदा कर सकती हैं, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल नहीं है। अभी तक मानवाधिकार की एक खास वैश्विक भाषा है और उसी खास भाषा में दक्षता प्राप्त कर स्वतंत्र होने की घोषणा की जा सकती है।
देशज भाषाओं के बहाने ही सही, संयुक्त राष्ट्र जिस भाषायी समझ को गढ़ने और फैलाने की कोशिश कर रहा है, उसके असर से कोई भी देश अछूता नहीं रहेगा। देश के भीतर भी विभिन्न मोर्चों पर इसके अलग-ंअलग तीव्रता के प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। और इसमें सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा का क्षेत्र है। मातृभाषा और राष्ट्रीय सुरक्षा के अंतर्सम्बंधों को अभी तक अधिक चर्चा नहीं हुई है, लेकिन मातृभाषा या देशज भाषाएं सुरक्षा का नया कवच बन सकती हैं।
भाषा किसी भी व्यक्ति के हृदय की कुंजी होती है। भाषा वह शक्ति है, जो किसी व्यक्ति के विश्व-बोध को निर्धारित करती है। भाषा की सीमा, सामर्थ्य और संरचना उसके उपयोगकर्ता के विचार और चिंतन को निर्धारित करते हैं। भाषा विश्व-बोध को ही नहीं बल्कि व्यक्ति के समय और स्थान-बोध को निर्धारित करने की क्षमता रखती है। इस संकल्पना का भाषायी-नियतिवाद के नाम से भी जाना जाता है।
यह भाषा की ही क्षमता है जिसके कारण अंग्रेजी भाषी समय को क्षैतिज रूप में लेते हैं और मंदारिन भाषी चीनी लोग इसे उर्ध्वाधर रूप में लेते हैं। इसी कारण समय की पश्चिमी अवधारणा निरंतर एकपक्षीय ढंग से आगे बढ़ने पर विश्वास करती है और चीन ़ऊपर से नीचे के क्रम में घटनाओं का विश्लेषण करता है। किसी समूह विशेष को उसके भाषायी-मानवाधिकार से वंचित करना संघर्षोें और अशांति को जन्म देता है। परिवेश की भाषा में सम्प्रेषित संदेश लोगों के सहज ही समझ में आता है, यह एक पक्ष है। इसके साथ महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि परिवेश की भाषा जुड़ाव भी पैदा करती है। बचपन में परिवेश की भाषा का महत्व जहां विषय को समझने के लिहाज से अधिक होता है, वहीं बढ़ती उम्र में इसका महत्व व्यक्ति में पैदा होने वाली अतीत के प्रति ललक के कारण बढ़ जाता है।
मतृभाषा व्यक्ति को सहज ही भाषायी मानवाधिकार प्रदान करती है। उसके व्यक्तित्व को गरिमा प्रदान करती है और चिंतन को अभिव्यक्ति और पहचान देती है। लोक-संचार के कारण व्यक्ति अपनी समस्याओं को सटीक तरीके से दूसरों तक पहुंचा पाने में सक्षम होता है और समस्या का समाधान खोजने में भी अपनी भूमिका तय करने की स्थिति हासिल करता है। लोक-संचार और परिवेश की भाषा का सम्बंध उसे शांति-निर्माण और संघर्ष-समाधान का एक महत्वपूर्ण उपकरण बना देता है।
मातृभाषा या देशज भाषाओं के कारण संचार की प्रक्रिया में स्थानीयता का तत्व आ जाता है। स्थानीयता का तत्व ही लोक संचार की सबसे बडी विशेषता है। स्थानीयता का तत्व लोक-संचार को बहुत सहज, सरस, समावेशी और सामर्थ्यपूर्ण बना देता है। स्थानीयता के तत्व के कारण ही लोकसंचार को एक ऐसा श्रोता वर्ग उपलब्ध होता है, जो संदेश को ग्रहण करने के लिए तत्पर होता है। इस कारण आधुनिक संचार माध्यमों की तरह लोक संचार को निष्क्रिय श्रोता नहीं मिलता, बल्कि एक ऐसा सक्रिय श्रोता मिलता है, जो स्वयं तो संदेशों को गहराई से ग्रहण करता ही है, दूसरों तक संदेशों को सहज ही पहुंचाता है।
मातृभाषा में ऐसे शब्दों का भण्डार निहित होता है, जिसमें परिवेश के भौगौलिक और ऐतिहासिक यथार्थ का समोवश रहता है। इसलिए मातृभाषा से परिचित व्यक्ति बाहर से थोपी जा रहे बनावटी प्रोपेगैंडा के प्रभाव में नहीं आता। मातृभाषा अपनी पहचान और यथार्थ से जुड़े रहने का सशक्त माध्यम है। और अपने यथार्थ और पहचान से परिचित व्यक्ति हायब्रिड वारफेयर या प्रोपेगैंडा अभियानों से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहता है। इसलिए मातृभाषा से परिचय और भाषायी सामर्थ्य के प्रति सजग होना और शब्दों का सम्यक उपयोग हायब्रिड वारफेयर जीतने के लिए एक आवश्यक पूर्वशर्त बन जाती है।
परिवेश की भाषा में संचालित लोक-संचार भी हायब्रिड वारफेयर को निष्प्रभावी बनाने में सहायक साबित हो सकता है। लोक-संचार की प्रक्रिया में ऐतिहासिक सच, सामाजिक यथार्थ और राजनीतिक गतिशीलता सहज रूप से समाई होती है, इसलिए प्रोपैगैंडा जनित किसी भी अभियान को रोकन मे यह सफल होता है। परम्परागत युद्ध की क्षमता और मनोबल में भारत से बहुत पीछे छूट जाने के बाद पाकिस्तान लम्बे अरसे से जम्मू-कश्मीर में हायब्रिड वारफेयर का खेल-खेल रहा है। पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में किसी भी तरह अस्थिरता और अराजकता का बनाए रखना चाहता है और इसके लिए उसका प्रमुख हथियार प्रोपेगैंडा है।
लोक-माध्यम एक सामाजिक-अंतःक्रिया का ऐसा मंच और माध्यम उपलब्ध कराते हैं, जिससे एकजुटता बनी रहती है, सर्वसम्मति पर पहुंचा जाता है और सांस्कृतिक-मूल्यों को मजबूती मिलती है। अंतरर्वैयक्तिक, अंतरसामूहिक, बहुपक्षीय और अंतरराष्टीय स्तर तक के संघर्षों में संचार की भूमिका केन्द्रीय होती है। किसी विषय के संदर्भ में हम सोचने और बातचीत करने का तरीके का प्रभाव उस विषय के सदंर्भ मंे हमारे कार्यों को प्रभावित करते हैं। इसलिए जम्मू-कश्मीर की सम्पूर्ण विरासत को स्वयं में समेटने वाले भाण्ड-पॅथर का उपयोग पाकिस्तान द्वारा चलाए जा रहे हायब्रिड वारफेयर का उत्तर देने के लिए किया जा सकता है।
संनीति
भारतीय-मीडिया के आकलन का अवसर भी है कारगिल विजय दिवस
लाइव कवरेज के कारण कारगिल युद्ध को ‘भारत का प्रथम टेलीविजन युद्ध’ भी कहा जाता है। रियल टाइम कवरेज ने पूरे देश को इस युद्ध और उसके घटनाक्रमों से भावनात्मक रूप से जोड़ दिया था। वहीं दूसरी तरफ, इस युद्ध के दौरान भारतीय मीडिया के एक हिस्से ने इसे मीडिया-इवेंट में तब्दील करने की कोशिश की और भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच की तर्ज पर प्रसारण किया। राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संचार के प्रति इस तरह की अनभिज्ञता के कारण तब भारतीय मीडिया को लेकर कई गंभीर प्रश्न उठ खड़े हुए थे।
इसी कारण कारगिल युद्ध के समाप्त होने के बाद जब इस युद्ध का विश्लेषण करने के लिए 29 जुलाई, 1999 को के.सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में चार सदस्यीय ’कारगिल समीक्षा समिति’ बनी तो उसने विस्तृत रूप से इस युद्ध में न केवल मीडिया की भूमिका का आकलन किया बल्कि आवश्यक सुझाव भी दिए।
समिति ने अपने विश्लेषण में पाया कि कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकांश मीडियाकर्मियों को सैन्य-मामलों और युद्ध-रिपोर्टिंग का कोई अनुभव नहीं था। समिति ने इस बात का भी रेखांकित किया कि भारतीय सेना के ’कमांड-स्ट्रक्चर’ की समझ नहीं होने के कारण मीडिया अपने रिपोर्टिंग अभियान में सूचनाओं को उनके महत्व के अनुसार उचित स्थान निर्धारण करने में कठिनाई महसूस कर रही थी।
इसके कारण बहुत सारी ऐसी गलत खबरों ने जन्म लिया, जो भारतीय सेना के साथ राष्ट्रीय मनोबल को प्रभावित करने वाली थीं। ऐसी ही गलत खबर थी कि दुश्मन ने भारतीय सेना के कई बंकरों पर कब्जा कर लिया था, जबकि सच्चाई यह थी कि दुश्मन ने केवल एक ऐसे स्थायी पेट्रोल पोस्ट पर आधिपत्य जमाया था, जिसे भारतीय सेना मौसम सम्बंधी दुश्वारियों के कारण पहले ही छोड चुकी थी। एक अन्य खबर यह सामने आई कि घुसपैठियों ने टेलीविजन सेट से लैस तीन मंजिले बंकर बना रखे हैं। यह खबर पूरी तरह गलत और निराधार थी। इसी तरह भारतीय सेना के मई 1999 के पोलैंड के दौरे को लेकर भी तथ्यहीन एवं त्रुटिपूर्ण खबरें सामने आईं थी।
कारगिल समीक्षा समिति ने इस बात की तरफ संकेत किया था कि युद्ध अथवा छद्म-युद्ध से नागरिक-समाज भी अछूता नहीं रह सकता। ऐसे समय में मानवाधिकार, मौतें, संपत्ति का नुकसान और शरणार्थी समस्याएं पैदा होती हैं। इसलिए युद्ध के दौरान ऐसे नागरिक और सैन्य प्रशासन को इन मुद्दों को मिलकर अधिक तत्परता और संवेदनशीलता के साथ निपटाना चाहिए। इस संकेत में अप्रत्यक्ष रूप से मीडिया को भी यह संदेश देने की कोशिश की गई थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा और युद्ध को अधिक संवेदनशीलता के साथ कवर किया जाना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कारगिल सुरक्षा समिति ने यह सुझाव दिया है कि मीडिया को महू स्थित कॉलेज ऑफ कम्बैट (आर्मी वार कॉलेज) के ’वार कॉरेसपांडेट कोर्स’ का लाभ उठाना चाहिए, ताकि प्रशिक्षित युद्ध संवाददाता उपलब्ध हो सकें।
2001 में भारतीय संसद पर हुए हमले और 2008 में हुए मुम्बई में हुए हमलों का मीडिया-कवरेज यह स्पष्ट करता है कि भारतीय मीडिया ऐसे निर्णायक मौकों पर न तो राष्ट्रीय सुरक्षा को अपनी प्राथमिकता बना सका है और न ही युद्धकाल की मीडिया-नैतिकता के नए मापदंडों को गढ़ सका है। सामान्य स्थितियों में सूचना का स्वतंत्र प्रवाह एक मीडिया नैतिकता है, लेकिन रियल टाइम सूचना का लाभ उठाकर आतंकवादी निर्दोष नागरिकों की हत्या कर रह हों, तो किसी घटनाक्रम की कवरेज में रणनीतिक-मूल्यों का समावेश आवश्यक हो जाता है।
कारिगल युद्ध के बाद युद्ध में सूचना और संचार की महत्ता और भी अधिक बढ़ी है। बल्कि अब तो हायब्रिड वारफेयर जैसी पूरी तरह सूचना और संचार केन्द्रित युद्धशैलियां अस्तित्व में आ गई हैं। यू़क्रेन युद्ध ने इस बात को लगभग स्थापित कर दिया है कि युद्ध अब एक अनवरत प्रक्रिया में परिवर्तित हो गया है और यह रणभूमि में कभी-कभी होने वाले संघर्षों के साथ मनोभूमि भी निरंतर लड़ा जा रहा है।
भारत की विशिष्ट स्थिति इसे सूचना-संचार युद्ध के लिए अधिक सुभेद्य बना देती है। लोकतांत्रिक शासन प्रणाली, वैश्विक स्तर पर निरंतर मजबूत होती स्थिति, परम्परागत सैन्य मोर्चे पर भारतीय सेना की बढ़ती ताकत के कारण प्रतिस्पर्धी राष्ट्र सूचना-संचार के माध्यम से भारत को अस्थिर करने की कोशिशों को और भी अधिक गति प्रदान करेंगे।
भारत की इस विशिष्ट स्थिति और युद्ध की प्रकृति में आए बदलावों को सही अभिव्यक्ति देते हुए वायु सेना अध्यक्ष विवेक राम चौधरी ने 12 अप्रैल 2022 को यह कहा कि नए तरह के युद्ध में दुश्मन को क्षति पहुंचाने के लिए सूचना-क्षेत्र में गढ़े गए सुनियोजित आख्यान का विध्वंशकारी प्रभाव हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि नए तरह के युद्ध में पहली गोली चलने और पहले लड़ाकू को सीमा पार करने से पहले बहुत सारे मोर्चों पर युद्ध लड़ा जा चुका होगा।
ऐसी स्थिति में कारगिल विजय दिवस हमें यह अवसर प्रदान करता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, हायब्रिड वारफेयर, सूचना-संचार युद्ध के परिप्रेक्ष्य में भारतीय मीडिया की स्थिति का अनवरत आकलन करते रहे। यहां यह ध्यान रखने योग्य बात है कि मीडिया के आकलन में मीडिया-शिक्षा भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष उत्पन्न हो रही नई चुनौतियों का सामना मीडिया-शिक्षा में बदलाव किए बगैर नहीं किया जा सकता।
संनीति
डिरेडिकलाइजेशन का सभ्यतागत एजेंडा
शिक्षा क्षेत्र को केंद्र में रखकर बच्चों को मजहबी कट्टरपंथ से बचाने के प्रयास निरंतर करने होंगे। यह पीढ़ियों तक होने वाला कार्य है, इसलिए इस कार्य में निरंतरता की आवश्यकता रहेगी। आवश्यकता ‘डिरेडिकलाइजेशन’ के छिट-पुट प्रयासों को नीतिगत रूप देने की है।
जम्मू-कश्मीर में हाल ही में सम्पन्न हुए चुनावों में 63.88 प्रतिशत मतदाताओं ने चुनाव प्रक्रिया में सहभागिता कर भारतीय लोकतंत्र के प्रति अपनी मजबूत आस्था तो दिखाई ही है, सुशासन और पारदर्शिता के बारे में अपनी तीव्र आकांक्षा को भी अभिव्यक्त किया है। नई राज्य सरकार को जनादेश की व्याख्या करते समय यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि इससे लोगों की सुशासन की गहरी इच्छाएं जुड़ी हुई हैं। अनुच्छेद 370 और 35A के कारण जम्मू-कश्मीर में सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही कभी भी राजनीतिक प्रक्रिया के केंद्र में नहीं आ पाए थे। अब जब पारदर्शिता और सुशासन के रास्ते से ये अवरोध हटाए जा चुके हैं, और वहाँ पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया अब तक के अपने सफलतम रूप में दस्तक दे चुकी है तो यह देखना रोचक होगा कि नई सरकार कितने पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से कार्य करती है।
सरकार गठन के बाद विधानसभा में जिस तरह से सत्तापक्ष और कुछ अन्य विधायकों ने व्यवहार किया और कुछ मुद्दे उठाए, उससे तो यही लग रहा है कि सरकार पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन की मांग करने वाले जनादेश की व्याख्या किन्हीं अन्य अर्थों में करने की कोशिश कर रही है। यहां पर इस तथ्य को याद रखना चाहिए की लोगों ने पीडीपी और जमात-ए-इस्लामी के कट्टरपंथी एजेंडे को इन चुनावों में पूरी तरह नकार दिया है। जमात-ए-इस्लामी समर्थित सभी 10 उम्मीदवार बुरी तरह चुनाव हार गए और कईयों की तो जमानत तक जब्त हो गई। इसी तरह पीडीपी का चुनावी प्रदर्शन भी बहुत बुरा रहा। वह मात्र 3 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी। पीडीपी का गढ़ माने जाने वाले दक्षिणी कश्मीर की अधिकांश सीटों पर भी पार्टी को पराजय का मुंह देखना पड़ा।
नैशनल कॉन्फ्रेन्स इन चुनावों में बहुत सारे लोक-लुभावन वायदों के साथ लोगों के पास गई थी। पार्टी ने अपने 12 सूत्रीय मैनिफेस्टो में 200 यूनिट तक फ्री बिजली, कमजोर वर्गों के परिवारों की महिला मुखिया को 5 हजार रुपए और प्रतिवर्ष फ्री 12 एलपीजी सीलिंडर और 6 महीने के भीतर एक लाख लोगों को रोजगार जैसे वायदे किए थे। लोगों ने कश्मीर के कट्टरपंथी दलों को पूरी तरह से नकार कर विकास और शांति के लिए मतदान किया। इसी कारण नैशनल कॉन्फ्रेन्स और भाजपा को सबसे अधिक मत मिले। यहाँ पर इस तथ्य का उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि इस विधानसभा चुनाव में वोट शेयर के हिसाब से भाजपा जम्मू-कश्मीर में सबसे बड़ी पार्टी है। उसे लगभग 26 प्रतिशत मत मिले हैं, जो कि नैशनल कॉन्फ्रेन्स से लगभग 2 प्रतिशत अधिक हैं। लेकिन सरकार गठन के बाद ऐसा लगता है कि सरकार जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के बजाय किसी पुराने खेल को फिर से खेलने की कोशिश कर रही है। सरकार को जनादेश की मनमानी व्याख्या से पहला चुनावी प्रक्रिया में सुशासन की चाहत, जमीनी नेतृत्व और बढ़ती सहभागिता को लेकर जो नए तथ्य उभरे हैं, उनका बारीकी से जरूर विश्लेषण कर लेना चाहिए।
विधानसभा चुनाव 2024 ने जम्मू-कश्मीर और वहां की राजनीतिक प्रक्रिया के बारे में बहुत सकारात्मक संदेश दिया है। इसके कारण वैश्विक स्तर पर दशकों से भारतीय लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को संदिग्ध साबित करने का अभियान तो औंधेमुंह गिरा है। आंतरिक स्तर पर एक अधिक समावेशी लोकतंत्र की नींव भी पड़ी है । हाशिए पर स्थित समुदायों और वर्गों की ने इन चुनावों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
आँकड़े चुनावी प्रक्रिया में सहभागिता में आए सकारात्मक बदलावों की गवाही दे रहे है। उदाहरण के लिए 2014 के मुकाबले इसबार 7 प्रतिशत अधिक उम्मीदवारों ने चुनावों प्रक्रिया में भाग लिया है। इसी तरह महिला उम्मीदवारों की संख्या 28 से बढ़ाकर 43 हो गई। सबसे रोचक बात यह है की जम्मू कश्मीर में निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या में 26 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है। इसके अतिरिक्त परिसीमन के बाद जम्मू-कश्मीर के चुनाव में जनजातीय समाज के लिए 9 सीट आरक्षित किया जाना भी समावेशी लोकतंत्र की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण कदम रहा। जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की जड़े किस हद तक गहरी हुई है, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि ‘रजिस्टर्ड अनरेकगनाइज पोलिटिकल पार्टीज(RUPPs)’ की संख्या में इसबार 71 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2014 में ऐसे दलों की संख्या 138 थी, जो अब बढ़कर 236 हो गई है।
जम्मू-कश्मीर में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में जिस तरह से लोगों सहभागिता बढ़ी और पूरी चुनावी प्रक्रिया जितनी शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुई, उससे मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार की वह बात सच साबित हुई जो उन्होंने 16 अगस्त 2024 को चुनावों की घोषणा करते हुए कही थी। तब उन्होंने कहा था कि ‘जम्मू-कश्मीर में इस बार विश्व कुटिल और शत्रु शक्तियों के हित पराजित होंगे और लोकतंत्र की विजय होगी।’
सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ. स्वदेश सिंह यह मानते हैं कि जम्मू-कश्मीर में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की सफलता ने एक उम्मीद तो जगाई है, लेकिन वह लोकतंत्र को चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं मानते। उनके अनुसार शेख अब्दुल्ला के समय से वहाँ की राजनीति व्यक्तिगत सनक और प्राथमिकताओं से संचालित होती रही है, इसके कारण वहाँ पर लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत नहीं हो सकीं। अब लोकतान्त्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाकर ही शांति और विकास के दूरगामी लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है। इसके साथ वह वहाँ के समाज को ‘डिरेडिकलाइज’ करने के लिए भी लगातार कदम उठाए जाने की बात करते हैं।
नई सरकार के शपथ ग्रहण के तुरंत बाद वहाँ पर जम्मू-कश्मीर में लक्षित हिंसा का जो नया दौर शुरू हुआ है, उससे ‘डिरेडिकलाइजेशन’ की आवश्यकता को फिर से रेखांकित किया है। ये हिंसा इसी तथ्य की तरफ संकेत करता है कि लोकतान्त्रिक प्रक्रिया हो अथवा विकास और शांति के लक्ष्य, इनको प्राप्त करने के लिए वहाँ पर संस्थागत रूप ले हो चुकी विद्वेष और सांप्रदायिकता की मानसिकता पर लगातार कुठाराघात करने की आवश्यकता है। ‘डिरेडिकलाइजेशन’ के कार्य में दशकों लग सकते हैं, लेकिन इस कार्य को टाला नहीं जा सकता। 2022 में एक विशेष जांच एजेंसी (SIA) ने सैकड़ों शिक्षण संस्थानों को बच्चों को ‘रेडिकलाइज’ करने का दोषी पाया था। तब उसकी अनुशंसा पर मजहबी शिक्षा देने वाले उन शिक्षण संस्थानों को प्रतिबंधित कर दिया गया था। जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा भी आतंकी पारिस्थिकी को ध्वस्त करने की वकालत करते रहे हैं। विशेषकर शिक्षा क्षेत्र को केंद्र में रखकर बच्चों को मजहबी कट्टरपंथ से बचाने के प्रयास निरंतर करने होंगे। यह पीढ़ियों तक होने वाला कार्य है, इसलिए इस कार्य में निरंतरता की आवश्यकता रहेगी। आवश्यकता ‘डिरेडिकलाइजेशन’ के छिट-पुट प्रयासों को नीतिगत रूप देने की है।
संनीति
हायब्रिड सुरक्षा तंत्र की जरूरत
हायब्रिड आतंक को रोकने के लिए ऐसे विधिक उपायों का उपयोग आवश्यक है, जो उन समूहों की जवाबदेही तय कर सकें, जो हायब्रिड आतंक को पोषित करते है।
जम्मू-कश्मीर की जनसांख्यिकी हमेशा से ही पाकिस्तान के निशाने पर रही है। जनसांख्यिकी में बदलाव के जरिए पाकिस्तान एकतरफ अपने नागरिकों की पांथिक भावनाओं को संतुष्ट करने की कोशिश करता है, तो वहीं दूसरी तरफ भारत में पांथिक विद्वेष को बढ़ाकर अराजकता की स्थिति पैदा करने की कोशिश करता है। इसके लिए वह समय-समय पर अलग-अलग रणनीतियां अपनाता रहा है। 1990 के प्रारंभिक महीनों में सामूहिक और संस्थागत रूप से कश्मीर की जनसांख्यिकी को बदलने की कोशिश की गई थी और अब हायब्रिड आतंकियों द्वारा की जा रही चयनित हत्याओं को जरिए जम्मू-कश्मीर की जनसांख्यिकी को निशाना बनाया जा रहा है।
पिछले पन्द्रह महीनों में हुए जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकी हमलों के नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि पाकिस्तान चयनित हत्याओं को एक नीति के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। हाल के दिनों में उसने अपनी इस नीति को गति दी है। जम्मू-कश्मीर में इस वर्ष 3 जून तक 16 चयनित हत्याएं की हैं, जबकि मई के पहले सप्ताह से लेकर जून के पहले सप्ताह के बीच 9 चयनित हत्याएं हुईं। इन हत्याओं में धार्मिक पहचान और क्षेत्रीय अस्मिताओं को ध्यान में रखकर लोगों को निशाना बनाया। चयनित हत्याओं के केन्द्र में पांथिक पहचान है, हालांकि सुरक्षा प्रतिष्ठान से सम्बंधित कुछ ऐसे स्थानीय लोगों को भी निशाना बनाया गया, जो आतंकी प्रभाव को चुनौती दे रहे थे।
जम्मू-कश्मीर में चयनित हत्याओं की शुरुआत 17 फरवरी 2021 से मानी जाती है। जब श्रीनगर स्थित कृष्णा ढाबा पर आतंकियों द्वारा हमला किया गया। इस हमले में कृष्णा ढाबा के मालिक रमेश कुमार के बेटे की मौत हो गई थी। हालांकि, अभूतपुर्व साहस का परिचय देते हुए रमेश कुमार ने अपना कृष्णा ढाबा अप्रैल 2021 में फिर ग्राहकों के लिए खोल दिया था।
5 अक्टूबर 2021 को प्रसिद्ध दवा विक्रेता एमएल बिंद्रू की हत्या आतंकियों द्वारा कर दी गई। अक्टूबर में ही एक स्कूल-प्रिंसिपल सुपिंदर कौर और अध्यापक दीपक चंद की पहचान पत्र देखने के बाद हत्या कर दी गई। इसके बाद कुछ पुलिसकर्मियों और बाहरी मजदूरों को आतंकियों ने निशाना बनाया गया। हाल ही में आतंकियों ने साम्बा में कार्यरत अध्यापिका रजनी बाला की हत्या कर दी थी।
चयनित हत्याओं की रणनीति का एक सर्वाधित महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इनको अंजाम देने के लिए हायब्रिड आतंकियों का उपयोग किया जा रहा है। हायब्रिड आतंकी आंतकवाद को आजीवन और निरंतर चलने वाली गतिविधि के रूप में नहीं अपनाता, बल्कि आकाओं द्वारा दिए गए कुछ लक्ष्यों को पूरा करने के बाद अगले वह अगले आदेश तक सामान्य नागरिकों की भांति जीवन जीने लगता है। इसके कारण सुरक्षा बलों को ऐसे आतंकियों की पहचान करना मुश्किल साबित होता है।
इसके अतिरिक्त हायब्रिड आतंकी पिस्टल जैसे अपेक्षाकृत हल्के हथियारों का उपयोग करते है और ऐसे लोगों को निशाना बनाते है, जो इर्द-गिर्द प्रायः कोई सुरक्षा नहीं रहती। ये प्रायः सरकारी कर्मचारी या ड्यूटी से घर लौटे पुलिसकर्मी जैसे आसान लक्ष्यों को अपना निशाना बनाते हैं। हायब्रिड आतंकी पेशेवर अपराधी की तरह हत्याएं करता है और फिर सामान्य जीवन जीने लगता है। इसमें जिसकी हत्या की जा रही है, उसका महत्वपूर्ण व्यक्ति होना जरूरी नहीं है। बल्कि इसमें संख्या और पहचान का अधिक महत्व होता है और इन हत्याओं का उपयोग आतंकी कुछ निश्चित संदेशों को देने के लिए करते हैं।
अभी तक सुरक्षा प्रतिष्ठान और विशेषज्ञ हायब्रिड आतंकियों और चयनित हत्याओं को अपनी उपस्थिति दर्ज कराए रखने के अंतिम प्रयास के रूप में देखते हैं। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार लोगों में घटते प्रभाव के कारण आंतकी भय पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ कुछ विशेषज्ञ इसे पाकिस्तान के बिगड़ते हालात से जोड़कर देखते हैं। ऐसे विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था की डांवाडोल स्थिति, बढ़ती महंगाई और सेना के प्रति बढ़ते अविश्वास से जनता का ध्यान हटाने के लिए कश्मीर में इस तरह के हमलों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
यह एक हद तक सही भी है कि 5 अगस्त 2019 के बाद आतंकियों और उनके आकाओं का प्रभाव जम्मू-कश्मीर में बहुत कम हो गया है और वह किसी भी कीमत पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं। परन्तु यदि हायब्रिड आतंकियों और चयनित हत्याओं को प्रारंभिक दौर में ही नहीं रोका गया तो वे सामूहिक विस्थापन का कारण बन सकते हैं और पाकिस्तान की जनसांख्यिकी बदलने की दीर्घकालीन योजना को नया बल मिल सकता है। चयनित हत्याओं के बाद सामूहिक धरना-प्रदर्शन इस बात की तस्दीक करते हैं।
इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि हायब्रिड आतंक और चयनित हत्याओं का प्रभावी प्रत्युत्तर दिया जाए। ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि परम्परागत रणनीतियों के जरिए हायब्रिड आतंकियों को रोका जा सकता है? हायब्रिड आतंक की मुख्य ताकत उसका समूह के बीच सामान्य नागरिक की तरह रहना है। इसलिए उसकी पहचान सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि उन समूहों और संस्थाओं की पहचान की जाए जो हायब्रिड आतंकियों को गढ़ते हैं और सामान्य व्यक्ति के रूप में समाज में उनकी पहचाना बनाए रखने में सहयोग प्रदान करते हैं। हायब्रिड आतंकियों को मानसिक और भावनात्मक तौर पर तैयार करने वाली समूहों और संस्थाओं की पहचान हायब्रिड आतंकियों को पहचानने का सबसे अच्छा तरीका है। और इन समूहों और संस्थाओं पर नकेल कसना हायब्रिड आतंकियों पर नकेल कसने का सबसे प्रभावी तरीका है। हायब्रिड आतंकियों को निष्क्रिय करने की रणनीति में सैन्य-पुलिस ऑपरेशन्स के साथ कुछ अन्य उपायों को भी शामिल करने की आवश्यकता होगी। हायब्रिड आतंक को रोकने के लिए ऐसे विधिक उपायों का उपयोग आवश्यक है, जो उन समूहों की जवाबदेही तय कर सकें, जो हायब्रिड आतंक को पोषित करते है। हायब्रिड आतंकियों पर नकेल उन्हे गढ़ने वाली पारिस्थतिकी और उनका समर्थन करने वाली आर्थिकी को चोट पहुंचा कर ही कसी जा सकती है।